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अफगानिस्तान की बर्बादी का आधार स्तंभ सोवियत-संघ है

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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अफगानिस्तान की बर्बादी का आधार स्तंभ सोवियत-संघ है, न कि कोई और

 

जब अफगानिस्तान की बात होती है तो हम भारतीयों के दिमाग में एक कल्पना आती है कि 11 सितंबर 2001 को जब अल-कायदा ने अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को गिराया, तब अमेरिका ने 7 अक्टूबर 2001 को अफगानिस्तान पर जो हमला शुरू किया। उसके पहले अफगानिस्तान में बहुत बढ़िया था, लड़कियां स्कर्ट पहनतीं थीं (ऐसी फोटो भी देख चुके हैं हम लोग)। लेकिन अमेरिका ने सब तबाह कर दिया।
सबसे बड़ा गजब तो यह है कि भारत में शायद ही कोई मुस्लिम अपवाद हो, अन्यथा सभी मुस्लिम के दिलोदिमाग में यही मिथक ठूंसा हुआ है कि अफगानिस्तान की प्रगतिशीलता का कारण सोवियत-संघ का 1979 से 1989 तक चलने वाला सैनिक शासन रहा। मुस्लिमों के अंदर बैठे हुए इस मिथक का एक बाई-प्रोडक्ट यह भी है कि मुस्लिम समाज को खुद ही खुद पर विश्वास नहीं कि कोई मुस्लिम शासक भी प्रगतिशील हो सकता है। जबकि तथ्य यही है कि अफगानिस्तान का प्रगतिशीलता का जो भी चेहरा था वह अफगानिस्तान के शासक मोहम्मद जहीर शाह की देन थी, जिसने 1933 से लेकर 1973 तक अफगानिस्तान में शासन किया। प्रगतिशील अफगानिस्तान की जो फोटुवें हम लोग देखते हैं वह जहीर शाह के शासन की देन थी, न कि सोवियत-संघ के सैनिक शासन की।
अफगानिस्तान शासक मोहम्मद जहीर शाह एक लोकतांत्रिक व प्रगतिशील सोच के व्यक्ति थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका व सोवियत-संघ दोनो अफगानिस्तान को अपने-अपने पाले में करने के लिए आर्थिक सहयोग भी करते थे। इसका प्रयोग जहीर शाह अफगानिस्तान को प्रगतिशील बनाने में करते थे। जहीर शाह के जमाने में अफगानी संसद बन गई थी, उस संसद में महिलाएं भी थीं। जहीर शाह अफगानिस्तान को लोकतांत्रिक देश बनाने की ओर ले जा रहे थे। गरीब देश था लेकिन लोग खुश थे क्योंकि उनको अधिकार मिल रहे थे, अपराध नहीं होते थे, शांत व सुलझा हुआ समाज था।
विकास व प्रगतिशीलता अफगानिस्तान की राजधानी काबुल व कुछ अन्य बड़े शहरों तक ही सीमित थी। अधिकतर अफगानिस्तान तक नहीं पहुंच रहा था, यह वह असली अफगानिस्तान था जो धार्मिक कुरीतियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। अफगानिस्तान की ऐसी ठोस इकोनोमी भी नहीं थी जो नई दुनिया के साथ तालमेल बैठा सके, इसलिए जो लोग पढ़े लिखे हो रहे थे, धीरे-धीरे उनके लिए उपयुक्त जाब्स मिलना असंभव होता जा रहा था। यह सब समस्याएं भी धीरे-धीरे ठीक होने की ओर बढ़तीं ही।
अफगानिस्तान में सोवियत-संघ के सहयोग से साम्यवादी पार्टी भी बनी थी। इस अफगानी साम्यवादी पार्टी के आपसी झगड़ों के कारण फाड़ भी हुए। सोवियत-संघ की शह के दम पर, इन साम्यवादी समूहों ने सत्ता प्राप्ति के लिए ऊपरी तौर पर एक होकर सैन्य विद्रोह करके अफगानिस्तान के शहंशाह जहीर शाह का तख्ता-पलट करके खुद सत्ता ले ली। सत्ता प्राप्ति के बाद सत्ता में अधिक से अधिक नियंत्रण के लिए आपस में झगड़े शुरू हुए।
इस घटना का प्रभाव यह हुआ कि काबुल व कुछ अन्य बड़े शहरों के बाहर वाला जो बड़ा व असली अफगानिस्तान था, वहां के लोग भी अपने-अपने धार्मिक व क्षेत्रीय कल्टों के आधार पर समूह बनाने लगे थे। पहले यही लोग लोकतांत्रिक प्रकिया के द्वारा सत्ता की भागीदारी में धीरे-धीरे पहुंच रहे थे। लेकिन जब इन लोगों को लगा कि हथियार के दम पर सत्ता प्राप्त जल्दी मिलती है और मनमर्जी करने की छूट भी, तो इन लोगों ने भी अपने-अपने स्तर पर छोटे-बड़े सैन्य-समूह बनाने शुरू कर दिए। इनको मुजाहिदीन कहा गया।
अफगानिस्तान की साम्यवादी पार्टियों की सरकार अस्थिर होना शुरू हुई। इस अवसर का लाभ उठाते हुए सोवियत-संघ ने हस्तक्षेप करना शुरू किया, दुनिया के कई देशों ने विरोध किया, लेकिन सोवियत-संघ ने दिसंबर 1979 में अफगानिस्तान पर सीधा हमला करते हुए अपने टैंक व हजारों सैनिक उतार दिए। सैन्य ताकत के दम पर पूरे अफगानिस्तान पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
सोवियत-संघ ने एक-लाख, जी हां एक-लाख से अधिक सोवियत-संघ के सैनिक अफगानिस्तान में उतार रखे थे। लेकिन विभिन्न धार्मिक व क्षेत्र कल्ट्स सोवियत-संघ की सेना के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध करते रहे। जल्द ही सोवियत-संघ ने हवाई जहाजों से पूरे अफगानिस्तान में बम गिराने शुरू कर दिए ताकि इन क्षेत्रीय क्षत्रपों को खतम किया जा सके। सोवियत-संघ ने जब हवाई हमले शुरू किए तब अमेरिका ने कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली छोटी मिसाइलें जो हवाई जहाज को उड़ा देती थीं, इन क्षत्रपों को देना शुरू किया। सोवियत-संघ की सेना को बहुत नुकसान हुआ।
सोवियत-संघ द्वारा हवाई हमले कई सालों तक चले। हजारों आम अफगानी मारे गए, लगभग 50 लाख आम अफगानी लोग पाकिस्तान व इरान देशों में शरणार्थी होने को मजबूर हुए, इनमें से लगभग 30 लाख लोग पाकिस्तान में शरणार्थी बने। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपनी कठपुतली सरकार देखने के लिए अफगानी लोगों को ट्रेनिंग देना शुरू किया, हथियार दिए। धर्मांधता व कट्टरपना कूट-कूट कर भर दिया। इसी को तालिबान कहा जाता है।
सोवियत-संघ हार मानकर 1989 में अफगानिस्तान में साम्यवादी पार्टी की सरकार के हाथों अफगानिस्तान को छोड़ देता है। दस सालों में सोवियत-संघ के 15 हजार से अधिक सैनिक मारे गए, एक लाख में से 15 हजार, मतलब 15% सैनिक मारे गए। जल्द ही मुजाहिदीन इस सरकार को उखाड़ फेंकते हैं और अपनी सत्ता स्थापित कर लेते हैं, इसके कुछ वर्षों बाद तालिबानी मुजाहिदीनों की सरकार को उखाड़ फेंकते हैं और अपनी सत्ता स्थापित करते हैं। मुजाहिदीन व तालिबान संघर्ष होता रहता है।
अब बात करते हैं नाटो के अफगानिस्तान के ऊपर सैन्य आपरेशन की, तो जैसा मैं लगातार कहता रहता हूं कि नाटो का मेकेनिज्म ही ऐसा है कि यह केवल तभी एक्टिवेट होता है जब कोई नाटो के किसी देश पर हमला करे, ऐसा होने पर यह माना जाता है कि नाटो के सभी देशों पर हमला हुआ है और नाटो का सैन्य-आपरेशन मोड एक्टिवेट हो जाता है।
चूंकि अल-कायदा ने अमेरिका की सीमा के अंदर जाकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला किया, इसलिए यह अमेरिका पर हमला करना हुआ। इस पर भी अमेरिका ने मांग की कि लादेन को अमेरिका को सौंप दिया जाए, अमेरिका की यह मांग ठुकरा दी गई। तब अमेरिका व नाटो अफगानिस्तान में हमला किए। यदि अमेरिका की सीमा के अंदर घुस कर अल-कायदा हमला नहीं करता तो अमेरिका भले ही अपने कुछ मित्र देशों का अलायंस बनाकर अफगानिस्तान पर हमला करता लेकिन नाटो एक्टिवेट नहीं होता। अमेरिका भी काहे हमला करता, जब 1989 में सोवियत-संघ की सेना के लौटने के बाद से 2001 तक नहीं किया, तो काहे करता, करना होता तो पहले ही करता, कौन रोक लेता, सोवियत-संघ तो 10 साल तक भद्द पिटाकर वैसे भी लौट चुका था जबकि सोवियत-संघ ने एक लाख से भी अधिक सैनिक अफगानिस्तान में उतार रखे थे।
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अल-कायदा द्वारा अमेरिका पर हमला किए जाने के बाद सन 2001 में नाटो के सैन्य आपरेशन में जिन देशों ने साथ दिया, उनमें से कुछ देश निम्न थे जो नाटो के सदस्य नहीं थे लेकिन नाटो के सैन्य आपरेशन में साथ दिया —
रूस,
भारत,
ताजिकिस्तान,
उजबेकिस्तान,
तुर्कमेनिस्तान,
इरान,
सऊदी अरब,
ऑस्ट्रेलिया।
ऑब्जेक्टिव-विश्लेषण हमारी अपकी पसंद नापसंद, पूर्वाग्रह, या नैरेटिव सेट करने के एजेंडे के तहत, या हमें चटपटा स्वाद मिले, या अपनी बात साबित करने के लिए कुछ भी कूड़ा-भूसा गढ़ लेने यहां वहां से कुछ भी टीप-टाप लेने इत्यादि-इत्यादि से नहीं होता है। जो जैसा है उसको वैसा ही देखने समझने व तथ्यों के आधार पर ऑब्जेक्टिव-विश्लेषण होता है। ऑब्जेक्टिव विश्लेषण यही बताता है कि अफगानिस्तान की बर्बादी का आधार स्तंभ सोवियत-संघ है, न कि कोई और। यदि आपने किसी मुद्दे पर चार किताबें पढ़ीं हो सकतीं है तो किसी ने मुद्दे का तियां-पांचा समझने के लिए चार-सौ किताबें पढ़ी हो सकतीं हैं। ऑब्जेक्टिव-विश्लेषण धुड़की या झूठ या बतोलेबाजी से नहीं, जो जैसा है वैसे तथ्यों के आधार पर ही संभव होता है।
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विवेक उमराव
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