आई आई ऍम सी

by Ashish Kumar Anshu
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उन्होंने पहले खूब सारा विवाद खड़ा किया। वह ट्रायल था, उस संस्थान को कोई भी ठोस निर्णय लेने से पहले उलझाने का, जो आईआईएमसी के सालों से नियामक रहे। 2014 से पहले सत्ता किसी की रही हो, आईआईएमसी को उन्होंने ही चलाया।
उनको ओम थानवी के एक बेहद करीबी व्यक्ति की नियुक्ति से कोई आपत्ति नहीं, उन्हें एक समाजवादी प्रोफेसर की नियुक्ति पर कुछ नहीं कहना। उन्हें सवाल उठाना है हिमाचल विश्वविद्यालय से आए प्राध्यापक पर क्योंकि एक समय उन्होंने ‘आर्गनाइजर’ में नौकरी की थी। नियामक का मानना है कि आर्गनाइजर में नौकरी करने वाला व्यक्ति ‘योग्य’ नहीं हो सकता। योग्य होगा आईसा या एसएफआई से आया व्यक्ति।
नियामकों ने कभी आनंद प्रधान पर कोई टिप्पणी नहीं की क्योंकि वे उन्हें अपने साम्राज्य का हिस्सा मानते हैं। आनंदजी का वैचारिक खेमा तय है। उस खेमे में हर व्यक्ति सुरक्षित है। क्योंकि दूसरे खेमे में हर व्यक्ति इसी सोच में है कि मुझे सुरक्षित रहने के लिए ‘सबके साथ’ की आवश्यकता है लेकिन नियामक इस तरह की सहिष्णुता और सहअस्तित्व में विश्वास नहीं रखते।
जब कुछ समय के लिए मध्य प्रदेश में कमलनाथजी की सरकार आई थी। एक वीसी साहब का किस्सा खूब चला जो सरकार बदलते ही कमलनाथजी से मिलने चले गए और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे एक निष्पक्ष वीसी हैं। जो कांग्रेस और बीजेपी में फर्क नहीं करते। बताया जाता है कि कमलनाथजी ने साफ-साफ उन्हें कह दिया कि आप नहीं करते लेकिन हम तो करते हैं। और उनसे लगे हाथों इस्तीफा भी ले लिया।
आईआईएमसी में नियामकों के एक अन्य शिकार जो भोपाल अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर चलने वाले विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उनके इस परिचय की जगह उन्हें भाजपा के पूर्व प्रवक्ता के तौर पर प्रचारित किया गया। परिचय का खेल यदि सीखना हो तो नियामकों से अच्छा कोई नहीं सिखा सकता।
अब नया विवाद एक नियुक्ति को लेकर है। यहां भी जिसकी नियुक्ति हुई है, उसे एक नया परिचय दिया गया। डीजी का करीबी। बहरहाल समझने की बात यह है कि यह हमले चाहे आपको अलग-अलग लग रहे हों लेकिन यह सारे हमले एक ही जगह से हो रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आईआईएमसी में नियामक तत्व अपनी सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं है और उसकी जड़े संस्थान में इतनी गहरी हैं कि संस्थान की एक-एक गतिविधि की खबर उनको रिअल टाइम पर मिल जाती है।
अपने दबाव की सफल रणनीति की एक और पारी नियामक आईआईएमसी में खेल रहे हैं। इस खेल में सफलता का एक ही मतलब है। संस्थान पर नियंत्रण। कम ही लिखा है, अधिक समझिएगा कि ‘अलग—अलग लड़कर कोई लड़ाई नहीं जीती जाती।’

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