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ऊ अंतव मावा ऊ ऊ अंतव मावा – #BasicEconomic

by राजीव मिश्रा
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एक तमिल फ़िल्म देख रहे थे, विजय और “ऊँ-अँटावा गर्ल” समान्था की. टिपिकल तमिल मसाला फ़िल्म जिसमें हीरो उड़ उड़ कर फ़ाइट करता है. साथ ही तमिल सेपेरेटिज्म और सुप्रेमेसी का मसाला.
पर ख़ास बात यह थी कि उसका हीरो एक डॉक्टर है जो वर्ल्ड का बेस्ट सर्जन है और ग़रीबों का इलाज 5 रुपए में करता है. वह कहता है कि देश के सबसे अमीर और सबसे गरीब व्यक्ति को एक जैसा मेडिकल ट्रीटमेंट मिलना चाहिए.
सुनकर इम्प्रेस होना चाहिए, पर मुझे इस बात की अर्थशास्त्रीय मूर्खता पर हँसी आ गयी.
आप यह बात कह सकते थे अगर मेडिकल ट्रीटमेंट का कोई कॉस्ट नहीं होता. लेकिन हर चीज की तरह मेडिकल ट्रीटमेंट का भी कॉस्ट है. और जिस चीज का कॉस्ट है वह कॉस्ट पे करना पड़ेगा. अगर वह चीज बिना उसका कीमत चुकाए किए दी जाएगी तो अधिक समय तक नहीं दी जा सकेगी. एक समय उसकी माँग उसकी पूर्ति से अधिक हो जाएगी और उसकी पूर्ति नहीं की जा सकेगी, क्योंकि उसकी माँग आर्बिट्रेरी है, वह मूल्य से निर्धारित नहीं हो रही. वहीं सप्लाई लिमिटेड है क्योंकि उसका एक कॉस्ट है और असीमित सप्लाई का कॉस्ट अनंत होगा जो नहीं चुकाया जा सकता.
इंग्लैंड का एनएचएस दुनिया का अनूठा फ्री मेडिकल केअर का प्रयोग है. इस फ्री मेडिकल केअर की दुविधाएँ सुनिए.
20 साल की एक अपंग लड़की थी. उसे सेरिब्रल पाल्सी था. अब वह इतनी कमजोर है कि खाना निगल नहीं सकती, तो कई दिनों से कुछ खाया नहीं है. प्लान किया गया कि उसे एक PEG, यानी ऊपर से छेद करके एक ट्यूब सीधा पेट में डाल दिया जाए और उसी से खाना दिया जाए. उसके लिए वह लड़की पिछले चार दिनों से इंतज़ार कर रही थी, लेकिन एंडोस्कोपी में कोई स्लॉट मिल ही नहीं रहा. इंडोस्कोपिस्ट ने उसे देखा तक नहीं है, क्योंकि यह इमरजेंसी नहीं गिनी जाती. जबतक वह अपने अपॉइंटमेंट का इंतज़ार कर रही है, उसके नाक से एक रायल्स ट्यूब डालकर उसे खाना दिया जा सकता है, लेकिन उसकी माँ इसके लिए नहीं तैयार है. वह कहती है, इससे उसे तकलीफ होगी, परेशान होगी. दो अलग अलग प्रोसीड्योर क्यों करना. एकबार ही सीधा PEG लगा दो.
बच्ची चार दिनों से भूखी है. बल्कि उसके भी पहले से. उसकी माँ का कहना है कि यह इमरजेंसी है, उसे पहले अपॉइंटमेंट दिया जाए. हॉस्पीटल का प्रोटोकॉल है कि PEG इमरजेंसी नहीं होता क्योंकि तबतक का एक अल्टरनेटिव मौजूद है. लेकिन माँ यह नहीं समझ रही.
यह नहीं कि बच्ची की समस्या अर्जेंट नहीं है. पर समस्या यह है कि दूसरों की समस्या अधिक अर्जेंट है. कहीं किसी के पेट में कोई अल्सर ब्लीड कर रहा होगा, वह अधिक अर्जेंट है.
वहीं अगले बेड पर एक दूसरी महिला है जिसके पेट में ब्लीड है. वह भी दो दिनों से इंतज़ार कर रही है. क्योंकि उसका ब्लड प्रेशर ठीक है, उसका हेमोग्लोबिन उतना नहीं गिरा है. किसी और की ब्लीडिंग अधिक खतरनाक, जानलेवा होगी. उसे प्रियॉरिटी मिलेगी.
मरीज मुझपर झल्ला रहे हैं. दिस इज रिडिक्यूलस…दिस इज अनएक्सेप्टेबल…आई एम वैटिंग फ़ॉर टू डेज…
मैं सॉरी बोलता हूँ, सिम्पथी दिखाता हूँ… क्या कहूँ… तुम्हारी अगली बेड पर कोई चार दिनों से इंतज़ार कर रहा है. कोई अपने घर पर चार सप्ताह से इंतज़ार कर रहा है. कोई घर पर चार महीने से इंतज़ार कर रहा है जिसकी पत्नी रोज हॉस्पिटल को कॉल कर रही है.
दुनिया में हर बात की माँग और आपूर्ति फ्लेक्सिबल है. कीमतों के हिसाब से माँग बढ़ती घटती है, और कीमतें बढ़ने से कोई एक व्यक्ति उस माँग को पूरा करने में लग जाता है. अगर इन सभी लोगों को अपने इलाज का खर्च खुद उठाना होता तो वे सभी अपने अपने इलाज का खर्च अपनी अपनी क्षमता से उठा रहे होते. फिर कोई एक अर्बिट्ररी डिमांड नहीं रखता और उसके पूरा ना होने पर फ्रस्ट्रेटेड नहीं होता. एंडोस्कोपी करने वाला भी खुशी खुशी चार घंटे देर तक रुकता और सबको निबटा कर ही घर जाता. दूसरे भी एंडोस्कोपी सीखते और उससे कंपीट कर रहे होते. पर मुफ्त होने से इंग्लैंड जैसा धनी और सुव्यवस्थित देश भी सबको जितना चाहिए उतना मेडिकल ट्रीटमेंट उपलब्ध कराने में असमर्थ है.
हर चीज का एक कॉस्ट होता है, और हर कॉस्ट चुकाना ही होता है. अब चाहे उसे आप खुद चुकाएँ, चाहे इन्शुरन्स के रास्ते, चाहे सरकार आपसे 40% टैक्स लेकर चुकाए, चाहे आप एक बीमार अर्थव्यवस्था में रहकर गरीबी में रहकर उसका कई गुना अधिक कॉस्ट चुकाएँ. पर अगर आप एक चीज मुफ्त में सबको देना चाहते हैं तो कभी नहीं दे सकते. मुफ्त में तो आप एक स्कूल के बाहर खड़े होकर सभी बच्चों को टॉफियाँ नहीं बाँट सकते, मेडिकल सुविधा तो बहुत महँगी चीज है.

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