Home हमारे लेखकनितिन त्रिपाठी कितनी मुस्लिम छात्राओं को हिजाब में स्कूल में देखा?

कितनी मुस्लिम छात्राओं को हिजाब में स्कूल में देखा?

by Nitin Tripathi
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आप में जो भी चालीस प्लस हैं दिल पर हाथ रख बताएँ पूरी पढ़ाई काल में उनके स्कूल / कालेज में उन्होंने कितनी मुस्लिम छात्राओं को हिजाब में स्कूल में देखा? ज़्यादातर उत्तर आएगा
शून्य, क्योंकि तब उनका प्रतिशत कम था.
मुद्दा केवल हिजाब नहीं है. यह उनकी टूल किट है.
जब तक दस प्रतिशत से कम हैं तो हमारा मज्जब अमन का मज्जब है, हमारे साथ सब जगह अन्याय होता है.
दस से पंद्रह हुवे तो फ़िर अलग हलाल मीट होना चाहिए, रहने की अलग कालोनी होनी चाहिए, कहीं भी मज़ार बनाने की आज़ादी चाहिए. ऐसा न होने पर फ़िर से विक्टिम कार्ड.
बीस के आस पास होते ही यह कि तुम भी हलाल ही खाओ. सारे रेस्टोरेंट हलाल ही सर्व करें. आपके खाने को मज्जबी करने के बाद अब आता है नम्बर कपड़ों का. हिजाब पहनना हमारा स्वतंत्रता का अधिकार है, choice है. विद्यालयों में, कार्यालय में, हवाई अड्डे में पाँच बार नमाज़ पढ़ना हमारा मज्जबी स्वतंत्रता का मामला है.
तीस प्रतिशत होते होते यह कि हमारे मज्जब के सब लोगों को दिन में पाँच बार नमाज़ छुट्टी मिलनी ही चाहिए. सारी मज्जबी महिलाएँ हिजाब पहनेंगी. संगीत फ़िल्म आदि से मज्जबी काम में बाधा पहुँचती है, इन्हें हमारे इलाक़े से हटाया जाए.
चालीस होते ही यह कि सभी लड़कियों को भले ही किसी भी धर्म की हों हिजाब पहनना पड़ेगा. रोज़ा आदि में कोई भी बाहर न निकले इससे हमारे मज्जब में बाधा पहुँचती है.
पचास होते ही – अब तुम्हारा कोई काम नहीं. हमारे मज्जब में आ जाओ, अपनी लड़कियाँ और सम्पत्ति हमारे हवाले कर दो, खुद अगर ज़िंदा रहना है तो मज्जब स्वीकारो.
पचास के बाद किसी और की गुंजायश नहीं होती, सीधे वह सौ होते हैं.
यह टूल किट है सदियों से. वर्तमान समय में भी कश्मीर, केरल और बंगाल में देखा ही है. कर्नाटक, UP आदि अब बीस प्रतिशत लेवेल पर हैं तो इधर तीसरा गियर लग गया है मज्जबी टूल किट का. तीस के बाद चौथा, चालीस पर पाँचवा और पचास के बाद हममे कोई न बचेगा यह सब लिखने कहने समझाने वाला.

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