Home लेखक और लेखअजीत सिंह घुमक्कड़ी वाली पोस्ट पे विमर्श चल रहा है

घुमक्कड़ी वाली पोस्ट पे विमर्श चल रहा है

by Ajit Singh
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घुमक्कड़ी वाली पोस्ट पे विमर्श चल रहा है

लोगबाग पूछ रहे हैं कि आदमी जिनगी भर घुमक्कड़ी फक्कड़मस्ती करेगा , साल के 40 Tour मारेगा तो परिवार कैसे पालेगा , खाये कमायेगा क्या ??????
देखो भैया , फक्कड़मस्ती एक सोच है ।
Thought Process है ।
जीवन शैली है ।
सबकी फक्कड़मस्ती अलग अलग किस्म की होती है ।
जैसे सोच वैसे फक्कड़मस्ती ।
वैसी जीवन शैली ।
लोगबाग गांव छोड़ नौकरी करने दिल्ली जाते हैं ।
हम दिल्ली छोड़ , सरकारी नौकरी छोड़ गांव आ गए ।
लोग संयुक्त परिवार छोड़ , गांव का एक बीघे में बना घर छोड़ शहर में 1 room set में रहने चले जाते हैं ।
उनके बच्चे उस 1 room के घर मे माँ बाप के अलावा तीसरे आदमी की शक्ल नही जानते ।
हम दिल्ली का 2 BHK छोड़ गांव आ गए जहां एक बीघे की चारदीवारी में बड़ा सा घर था और बच्चों के पास दादा दादी चाची ताई मिला के कुल जमा 7 – 8 parents Guardians थे । 10 साल की आयु तक तो बच्चे यही नही पहचान पाये की जिसे वो Mummy कहते हैं वो असल मे दादी हैं और जिसे मोनिका बुलाते हैं वो माँ है ।
जिस बच्चे के 8 – 10 parents Guardians हों उसके mummy papa हफ्ते में 3 दिन घूम आये , उसको पता चलेगा क्या कि Mummy papa 3 दिन से गायब हैं ?????
संयुक्त परिवार , एक रसोई , घर का दूध घी , अनाज , खेती बाड़ी , घर का प्रत्येक सदस्य Earning Member , और आय के छोटे छोटे परंतु Multiple Sources ……. और पूरे परिवार का आज भी Joint account …….
Bare Minimum में जीने की सोच और कला ……. विलासिता , आडंबरपूर्ण जीवन शैली से बिल्कुल इतर ……
मात्र 6 घंटे बिजली आपूर्ति और 42 – 44 डिग्री की गर्मी में भी गांव में हंसी खुशी जीवन बिताया है ……
समाज को दिखाने , खुश करने के लिये Brand Conscious जीवन नही जिया …….
उस ज़माने में जरनल किलास या स्लीपर में travel करना Taboo न था …… AC में seat न मिलने पे प्राण पखेरू उड़ जाएंगे , ऐसा Risk न था जीवन मे ……..
फक्कड़ मस्ती एक सोच है ।
एक जीवन शैली है ।
पर थोड़ी हट के है ।
मेरी जीवन शैली आज के ” आम आदमी ” को सूट नही करती ।
उसके लिये दिल्ली छोड़ गांव वापसी , सुंयुक्त परिवार , वृहद परिवार , एक रसोई एक Account जैसे शब्द Aliens लग सकते हैं ।
Bare Minimum में न सिर्फ घुमक्कड़ी Travel बल्कि पूरा जीवन ही बिता देना …… इसे जीना तो छोड़ , सोचना भी सबके बस की बात नही ।
बहुत कड़वा सच ये है कि आज का ” आम आदमी ” खुद को खुश करने के लिये नही बल्कि समाज को खुश करने की चिंता में मरा जा रहा है ।
समाज को खुश करने वाली सोच से बाहर निकलना होगा ।

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