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जल्द ही भारत के सामने भयंकर कशमकश की स्थिति आने की बड़ी संभावना है

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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जल्द ही भारत के सामने भयंकर कशमकश की स्थिति आने की बड़ी संभावना है

रूस की आंतरिक स्थिति खराब होती जा रही है। अनेक इलाकों में वस्तुओं की कीमतें गुने के हिसाब से बढ़ रही हैं। वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए राशन लगाना पड़ रहा है। रूस को जल्द ही अपने मित्र देशों के आर्थिक, सैन्य, वस्तुओं व कच्चे माल इत्यादि के सहयोग की जरूरत पड़ने वाली है।
रूस अपने मित्र देशों का निर्यात के लिए भी इस्तेमाल छद्म के रूप में इस्तेमाल करना चाहेगा। मतलब रूस अब दुनिया को सीधे निर्यात नहीं कर सकता है, सीधे लेनदेन नहीं कर सकता है। तो अपने निर्यात व लेनदेन के लिए अपने मित्र देशों का प्राक्सी व छद्म की तरह इस्तेमाल करना चाहेगा। जाहिर है कि रूस अपने दो मित्रों का सहयोग निश्चित तौर चाहेगा। चीन व भारत। शुरुआत चीन से करेगा, फिर यदि जरूरत पड़ी तो भारत की ओर भी मुंह ताकेगा।
अमेरिका व योरप ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया का कोई भी देश रूस पर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनको बाईपास करने में रूस का सहयोग करेगा तो उसके ऊपर भी प्रतिबंध लगाए जाएंगे और रूस का सीधा सहयोगी माना जाएगा।
जिस तरह से पुतिन जिद व धूर्तता में अड़ा हुआ है। उससे दो बाते ही होनी हैं। मैं समझदारी वाले विकल्प को यह मान रहा हूं कि पुतिन जैसा अहंकारी व मानसिक बीमार आदमी समझदारी वाला विकल्प नहीं चुनेगा, इसलिए केवल दो विकल्पों की बात ही कह रहा हूं।
एक तो यह कि पूरी दुनिया परमाणु युद्ध में घिरेगी तब या तो धरती का विनाश हो जाएगा या दुनिया बुरी तरह से हतस-नहस हो जाएगी, फिर से अनेक समाज कबीलाई संस्कृति में लौट जाएंगे। क्योंकि रूस व चीन की मिलाकर भी इतनी औकात नहीं कि नाटो से युद्ध में जीत सकें, इसलिए रूस परमाणु का प्रयोग करेगा ही। जिससे सबसे अधिक नुकसान चीन, भारत, उत्तरी कोरिया, पाकिस्तान जैसी छोटी परमाणु शक्तियों का होगा।
दूसरा यह कि यदि पुतिन परमाणु प्रयोग नहीं शुरू करते हैं, नाटो से पंगा नहीं लेते हैं, लेकिन यूक्रेन के साथ युद्ध की जिद पर अड़े रहते हैं तो रूस की इकोनोमी इतनी अधिक टूट चुकी होगी कि उबरने में दशकों लगेंगे। इस बार तो योरप उस तरह से साथ नहीं खड़ा होगा हैसा सोवियत संघ के विघटन के बाद साथ खड़ा होगा। कोई बड़ी बात नहीं यदि रूस के टुकड़े भी हो जाएं। रूस के लोग खुद ही आर्थिक विभीषिका से मुक्त होने के लिए रूस को विभाजित कर लें, रूस तो वैसे भी बहुत कमजोर हो चुका होगा।
मैं नहीं चाहता कि भारत के सामने ऐसी स्थिति आए कि उसे यह चुनना पड़े कि उसे रूस का छद्म प्राक्सी बनना है या नहीं। बिलकुल भी इच्छा नहीं है कि भारत के सामने ऐसी स्थिति आए। दुर्भाग्यवश यदि ऐसी स्थिति आती है तो भारत को रूस का प्राक्सी नहीं बनना चाहिए। इसका कारण यह है कि पहला तो यह कि रूस वह रूस नहीं रहेगा जो है, दूसरा यह कि यदि भारत में प्रतिबंध लगे तो भारत में स्थिति बहुत भयावह हो जाएगी। भारत के अधिकतर लोगों की कल्पना भी नहीं पहुंच सकती कि भारत की आर्थिक व जीवन की स्थिति कितनी भयावह होगी।
वर्तमान की स्थितियां ऐसी होती जा रहीं हैं जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कभी नहीं आईं। द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत का अपना कोई अस्तित्व नहीं था, इंग्लैंड का गुलाम था, इसलिए भारत को अपना पक्ष नहीं चुनना पड़ा था। कोल्ड-वार की स्थितियां अलग थीं, दोनों पक्षों को साधा जा सकता था। लेकिन अभी की जो स्थितियां बन रही हैं। दोनो पक्षों को साधने जैसी राजनयिक कूटिनीति का मायने नहीं रह जाने वाला है। किसी न किसी एक पक्ष को चुनना ही पड़ेगा।
तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर होने की बात छोडिए, भारत तो खाद्यान तक में आत्मनिर्भर नहीं है। जिस तरह के प्रतिबंध रूस में लगे हैं उसके आधे भी भारत में लग गए तो कुछ सप्ताह में ही भारत बुरी तरह से बैठ जाएगा। चाहे कंपनियों में नौकरी करने वाले हों या सरकारी नौकरी करने वाले या व्यापारी, सबकी हालत बहुत ही अधिक खराब हो जाएगी। कोविड के कारण आने वाली आर्थिक स्थितियां तो कुछ भी नहीं थीं।
भारत के करोड़ों लोग जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं या ऐसी भारतीय कंपनियों में काम करते हैं जिनका व्यापार भारत से बाहर होता है या ऐसी कंपनियों के लिए कच्चा-माल उपलब्ध कराने वाली या उत्पादन मार्केटिंग में सहयोग करने वाली इत्यादि-इत्यादि कंपनियों में काम करते हैं। उन सबकी हालत बहुत बुरी हो जाएगी और यह सब अचानक एक बहुत बड़े झटके की तरह धड़ाम होगा।
जो लोग सरकारी वेतन पाते हैं, जो नेता व नौकरशाह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं, इन लोगों का पैसा किसी काम का नहीं रहेगा, क्योंकि ऐश्वर्य की वस्तुओं का भोग करने को नहीं मिलेगा। क्या होगा इसकी कल्पना भी नहीं है।
जो लोग व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी सोशल मीडिया पर बेहूदापन, नफरत, व फर्जीवाड़ा को गढ़ते व वायरल करते रहते हैं फारवर्ड करते रहते हैं। और इसे अपना राष्ट्रप्रेम, देशभक्ति इत्यादि समझते हुए गर्व करते रहते हैं। इसको ज्ञान मानते हैं, विद्वता मानते हैं। गाली गलौच करते हैं, नफरत फैलाते हैं। इन लोगों की स्थिति ऐसी हो जाएगी कि सोच कर भी सिरहन दौड़ती है। वैसे भी ये लोग बहुत अधिक कायर डरपोक व सतही मानसिकता के लोग हैं।
हम भारतीय लोग तो ऐसे समाज के लोग हैं जो यूक्रेन को गलत मानते हैं क्योंकि यूक्रेन अपनी सार्वभौमिकता के लिए अपनी तुलना में बहुत ही अधिक ताकतवर से बहादुरी से लड़ रहा है। हम इतने कमजोर मानसिकता के लोग हैं कि हमें यूक्रेन के आम लोगों की बहादुरी मूर्खता लगती है, उपहास करते हैं। हम जबरिया साबित करते हैं कि पुतिन की नीचता भी महान क्यों है।
अंतर्राष्ट्रीय मामलों की धेला भर भी समझ न होते हुए भी, हम उपहास करते रहे कि नाटो यूक्रेन को सीढ़ी लगाकर चढ़ाकर फिर सीढ़ी हटाकर भाग गया। ऐसा ही पता नहीं क्या क्या फिजूल बकवास हम करते आ रहे हैं। बेशर्म तो हम इतने हैं कि जानना समझना चाहते ही नहीं हैं। जो चटपटा लगा वही सच है, उसी को लेकर उड़ पड़े। स्तरहीन पाठ्यपुस्तकें रटवा कर नौकरी दिलवाने वाली कोचिंगों के मास्टर लोग जो यूट्यूब पर फर्जी ज्ञान उड़ेलते रहते हैं। रूस व यूक्रेन व नाटो इत्यादि के संदर्भ में भारतीय मीडिया व यूट्यूब पर टपोरी ज्ञान जमकर फैला हुआ है। हममें से अधिकर लोग एक तरह से नशे में डूबे हुए हैं।
हम भारतीय इतने अधिक सैडिस्टिक हैं कि हमें नफरत हिंसा धृणा युद्ध चीत्कार में आनंद आता है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं जिनकी आग हमारे घर को भी बुरी तरह से जला देती है, सब खतम कर देती है।
हम कोविड को लेकर मजाक बना रहे थे, उपहास कर रहे थे, मुझ जैसे लोगों जब समझाने का प्रयास कर रहे थे तब गालियां दे रहे थे। बाद में क्या हुआ, शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो देश में जिसका कोई अपना या जानने वाला न मरा हो, लेकिन हम इतने अधिक सैडिस्टिक हैं कि फिर उसी बेशर्मी व हलकेपन को जीने में लग गए।
हो सके तो अपने पूर्वाग्रहों, अपनी अजानकारी, अपनी अज्ञानता, लघुदृष्टि इत्यादि-इत्यादि के फर्जी व खोखले अहंकारों से बाहर निकलिए। गंभीरता से सोचना विचारना शुरू कीजिए। मीडिया हो, टीवी हो, यूट्यूब हो, अखबार हो इन सबकी भी अजानकारी मूर्खता प्रोपागंडा चीख-चिल्लाहट इत्यादि पर ध्यान नहीं दीजिए। और प्रार्थना कीजिए कि पुतिन को अकल आ जाए और यूक्रेन से वापस चला जाए, भूल कर भी किसी नाटो देश पर हमला न कर दे। नहीं तो आज नहीं तो कल भयंकर आग आपके घर तक भी पहुंचेगी ही।
हो सके तो अपने जीवन के बारे में सोचिए, परिवार के बारे में सोचिए, बच्चों व माता पिता के बारे में सोचिए। मेरी बात का उपहास नहीं उड़ाइए, कोविड के संदर्भ में भी आप 2020 में ऐसे ही उपहास उड़ा रहे थे। मेरा काम है अपने देश के लोगों को बड़ी दुर्घटनाओं से अग्रिम रूप से मानसिक रूप से तैयार करके कुछ सुरक्षित कर पाने का, यह मेरी अपने देश के लिए प्रेम व प्रतिबद्धता है। आप गाली देते रहिए, उपहास उड़ाते रहिए, मैं आपसे आपके हित की बात करता रहूंगा, शायद आप कभी अपने हित की बात सुनने समझने के लिए खुद को तैयार कर पाएं।

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