Home लेखक और लेखस्वामी व्यालोक तिरे बदन पर ये तिरपाल तो बहुत अच्छा था, तू इसका टेंट बना लेती तो क्या बात होती….।

तिरे बदन पर ये तिरपाल तो बहुत अच्छा था, तू इसका टेंट बना लेती तो क्या बात होती….।

by Swami Vyalok
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वह लड़की स्कूटी से आई है, मतलब मुसलमानों में वेल-टू-डू क्लास से है, उसके बाप-भाई नीली कॉलर वाले ही होंगे। वह आपादमस्तक टेंट में लिपटकर आई है, फिर भी सैंकड़ों लड़कों के सामने अल्लाह-हू-अकबर चिल्लाती है। यह हिमाकत उसमें कहां से आयी है?
दो वजहों से। पहला, उसे पता है कि सामने वाली भीड़ हिंदुओं की है और वहां उसके साथ तहार्रुश नहीं होगा, उसके साथ जबर्दस्ती नहीं की जाएगी, आखिर हिंदुओं में कोई अबू आजमी तो होता नहीं जो कहे कि बड़ी होने के बाद तो बेटी के साथ भी एक ही घर में होना एक बाप के लिए उचित नहीं और उसके प्रति भी मन में बुरे खयालात आ सकते हैं।
दूसरी वजह, मजहबी उन्माद है। भगवा गमछा वाले युवक या युवतियां चिढ़कर, थक कर और प्रतिक्रिया में ऐसा कर रहे हैं, जब उन्होंने देखा कि उनके ही देश में मात्र 70 वर्ष पहले हिंदुओं की लाशों पर जब एक अलग मुल्क तकसीम किया गया, एक पाकिस्तान तामीर हुआ और अब उनको ही दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है।
जबकि, मजहबी उन्माद उनको सिखाता है कि हरेक जगह दूसरों को यानी काफिरों को परेशान करना ही उनका एकमात्र कर्तव्य है, अपने मजहबी चिह्नों को जबरन हरेक जगह, बेबात-बेवजह दिखाते रहना ही उनका फर्ज है, क्योंकि अल्लाह नेकदिल है और यह दुनिया तो फानी है, ताकयामत तो उसे जन्नत की ही तैयारी करनी है। यह ठीक वैसा ही है, जैसा पांच साल के बच्चे को मुहर्रम में खून से नहा देना बिल्कुल नॉर्मल है, हरेक अंग्रेजी स्कूल में जानेवाले बच्चे को भी घर पर या मदरसे में कुरान पढ़वाना न केवल अनिवार्य है, बल्कि उसका पालन न करना गुनाह-ए-अज़ीम है।
कृष्णाष्टमी पर साल में एक बार बच्चे को कान्हा बना देना अतिशय सामान्य है। आप हमेशा बच्चे को कान्हा नहीं बनाते, जबरन अपने छोटे बच्चे को धोती नहीं पहनाते क्योंकि आपका भगवान आपको कभी नहीं कहता कि ये आपको करना ही है।
मुसलमान सनातन द्वंद्व में है, क्योंकि उसका पैगंबर उसे यही सिखाता है, उसकी किताब उसे यही बताती है। वह एकरंगा है, उसे पूरी दुनिया तिरपाल में ढंक देनी है, उसे बहुरंगा होना ही नहीं है, उसे एक-एक इंच ज़मीन काफिरों से छीन लेनी है। यह बेहद सहज है, सामान्य है। बाकी, उसके औजार भले जो भी हों। वह अल-तकिया हो, जिहाद हो या कुछ भी हो।
यही कारण है कि गुरुग्राम में उनको पार्क में ही नमाज पढ़नी है, वरना वे रोने लगेंगे, उनकी गंगा-जमनी तहजीब केवल लेना जानती है, केवल छीनना जानती है। दोष उनका नहीं है, वह तो अपनी आसमानी किताब का अक्षरश: पालन कर रहे हैं।
दोषी वे हैं, जो इन घटनाओं पर चुप रहते हैं, या इनका सामान्यीकरण करते हैं। जो थूकने को कभी दुआ पढ़ना कहते हैं, कभी कहते हैं कि ऐसा तो कुछ हुआ ही नहीं, कभी हलाल सर्टिफिकेट पर चुप्पी ओढ़ते हैं, कभी एयरपोर्ट में प्रेयर-रूम को केवल नमाज के लिए आरक्षित बताते हैं।
इस्लाम की खूंरेजी और कट्‌टरता से भी खतरनाक इन सेकुलरों की चतुराई, धूर्तता और बौद्धिक कायरता है।

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