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तो योगी सरकार तो गई !

दयानंद पांडेय

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तो योगी सरकार तो गई ! ऐसी ख़बरों के साथ उत्तर प्रदेश में पेड न्यूज़ अभी भी उछाल मार रहा है। इसी वसंत बहार में झूम-झूम कर सोशल मीडिया का सेक्यूलर चैंपियन , पेड मीडिया की ख़बरों को ले कर अफवाह उड़ाने के खूंटे पर दौड़-दौड़ कर बैठ रहा है। पेड न्यूज़ वाली फ़ोटो चिपका-चिपका कर नमक़ हलाली कर रहा है। तो कुछ बीमार , समान विचारधारा की नमक़ हलाली में तल्लीन हैं। तर्क और तथ्य से इन लोगों का कभी कोई वास्ता नहीं होता। सारा शौक एजेंडे के खूंटे पर कूद-कूद कर बैठने का ही है। इस से कुछ नुकसान भी होता है तो होता रहे। मंज़ूर है , एजेंडा साधने के लिए।
भास्कर अख़बार लखनऊ से नहीं छपता। भास्कर का वेब एडीशन आता है , लखनऊ से। यह पेड न्यूज़ का कमाल इसी भास्कर ने अपने वेब एडीशन से किया है। हफ़्ते भर से योगी सरकार के विदा होने के संकेत देते हुए ,अफसरशाही में मची भगदड़ को टोटी यादव के चमचे पत्रकारों ने हथियार बनाया हुआ है। तीन दिन पहले एक ख़बर ट्वीट की गई कि एक वरिष्ठ आई ए एस अफ़सर ने रात के अंधेरे में अखिलेश यादव से भेंट की। तो क्या अखिलेश यादव के घर की बिजली काट दी गई है कि उन के घर के सामने की स्ट्रीट लाइट की बिजली काट दी गई है। नहीं तो अंधेरा कैसे ? अंधेरे में कैसे मिले ? बिजली तो अब लखनऊ समेत समूचे उत्तर प्रदेश में चौबीसो घंटे आती है।
एक ट्वीट उसी दिन फिर आया कि सपा सरकार बनती देख एक आई ए एस अफ़सर अखिलेश यादव को दिन में तीन-चार बार गुड मॉर्निंग भेजने लगे। अखिलेश यादव ने उस अफ़सर को ब्लॉक किया। यह दोनों ट्वीट दो अलग-अलग पत्रकारों के हैं। एक लखनऊ से , एक दिल्ली से। लेकिन दोनों ही पत्रकारों ने किसी अधिकारी का नाम लिखने से परहेज़ किया। तभी एक फ़ोटो आई अयोध्या के डी एम के आवास पट्टिका की। योगी सरकार बदलने के उत्साह की जैसे सुनामी आ गई। बताया गया कि सपा सरकार बनती देख , डी एम , अयोध्या ने अपने आवास पट्टी का रंग भगवा से हरा किया। बाद में पता चला कि डी एम आवास में कुछ काम हो रहा है सो वह पी डब्लू डी गेस्ट हाऊस में शिफ्ट हुए हैं। पी डब्लू डी वाले हरे रंग का ही इस्तेमाल करते हैं।
एक सेक्यूलर चैंपियन राजदीप सरदेसाई भी हैं। सेक्यूलर लोग उन्हें चुनावी भविष्य वाणी का आचार्य मानते रहे हैं। दिल्ली और लखनऊ से प्रकाशित 27 फ़रवरी के हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख लिख कर राजदीप सरदेसाई ने कहा है कि यू.पी.चुनाव में भाजपा की साफ बढ़त नजर आ रही है। लेकिन सोशल मीडिया पर सेक्यूलर चैंपियंस ने राजदीप सरदेसाई के इस लेख की नोटिस नहीं ली। क्यों कि इस में अफवाह की धूल उड़ाने का तत्व नहीं था। उन को सूट भी नहीं करता था। तो बिचारे करते भी तो क्या करते ? उन लोगों ने भी नहीं जो लोग अकसर टेलीग्राफ़ की वाहियात और मुहल्ला छाप ख़बरों को भी सोशल मीडिया पर नियमित चिपका कर उस का भाष्य हिंदी में समझाते रहते हैं। तो क्या राजदीप सरदेसाई भी अब संघी या भाजपाई हो गए हैं। दिलचस्प यह कि राजदीप के इस लेख की नोटिस भाजपाइयों और संघियों ने भी नहीं ली।
अब आज कुछ नई ख़बरें आई हैं। भास्कर ने अपने वेब एडीशन पर फ़ोटो लगा कर ख़बर छापी है कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के पुराने सरकारी आवास की साफ़-सफाई शुरु की। गुड है !
तो क्या अखिलेश यादव सपा की सरकार बनाने के बाद भी अधिकृत मुख्य मंत्री निवास , 5 कालिदास मार्ग पर नहीं रहेंगे ? विक्रमादित्य मार्ग स्थित उस घर में रहेंगे जहां वह पूर्व मुख्य मंत्री की हैसियत से रहते थे और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन वह घर उन्हें छोड़ना पड़ा था। इस घर से ही वह टाइल और टोटी उखाड़ कर ले गए थे और उन का एक नाम टोटी यादव भी पड़ गया। एक तल्ख़ सचाई यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण यह दोनों घर बतौर पूर्व मुख्य मंत्री न मुलायम सिंह यादव को मिल सकता है , न अखिलेश यादव को मिल सकता है। सिर्फ़ एक सूरत है अखिलेश यादव को यह घर मिलने की। कि बतौर विधायक वह इस में रहने आ जाएं। क्यों कि करहल विधान सभा सीट वह क्लीयरकट जीत रहे हैं। तो क्या लोकसभा की सदस्यता से वह इस्तीफ़ा दे देंगे ? इस बात की भी तुक नहीं दिखती। बतौर विधायक यहां रहेंगे नहीं अखिलेश। करहल की विधायकी से इस्तीफ़ा देने के लिए ही वह लड़ रहे हैं। अच्छा जो मुख्य मंत्री बनेंगे तो 5 , कालिदास मार्ग के मुख्य मंत्री निवास में ही रहेंगे। कहीं और नहीं।
फिर क्या इन घरों की साफ़-सफाई भी न हो ? रुटीन साफ़-सफाई हो तो दिमाग से ख़ाली , पेड न्यूज़ के पत्रकारों की ऐसी फर्जी ख़बरों पर आप लट्टू बन जाएंगे ? क्यों कि सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े सेक्यूलर चैंपियंस विद्वान आज दिन भर इस फ़ोटो वाली ख़बरों को ले कर किसी बंदर की मानिंद कूद रहे हैं। इस डाल से , उस डाल। क्या सपाई , क्या कम्युनिस्ट , क्या कांग्रेसी। गुड है यह मंकी एफर्ट भी। दो और ख़बरें भी नत्थी हैं। क्या तो जनेश्वर मिश्र पार्क और गोमती रिवर फ्रंट भी पर काम शुरु हो गया है। अजब है यह बीमारी भी। जनेश्वर मिश्र पार्क या गोमती रिवर फ्रंट क्या अखिलेश यादव के पिता जी का है कि मुलायम सिंह के पिता जी का है , कि उत्तर प्रदेश सरकार का है ? इतना भी नहीं जानते यह उल्लू के ढक्कन लोग तो क्या करें इन का। ऐसे बैसाखनंदनों का कोई कुछ कर सकता हो तो कर ले।
हक़ीक़त तो यह है कि किसी भी सरकारी संपत्ति का रख-रखाव कोई अफ़सर या बाबू अपनी मर्जी से कभी नहीं कर सकता। इस के लिए फंड भी सरकार ही देती है। पिद्दी से पिद्दी काम के लिए टेंडर होता है। दुनिया भर की फाइलबाजी होती है। तब कहीं जा कर फंड जारी होता है। विक्रमादित्य मार्ग स्थित मुलायम सिंह के पुराने सरकारी आवास को मैं ने भीतर-बाहर से पूरा देख रखा है। मुलायम सिंह यादव ने ही एक बार दिखाया था। तब वह रक्षा मंत्री थे। कई बार गया हूं यहां। हाल तक। किसी राजा के राज महल जैसा है यह। कुछ राज महल भी देखे हैं मैं ने। वह राज महल भी इस आवास के आगे पानी मांगते हैं। वैसे पी डब्लू डी विभाग के एक इंजीनियर ने इस बाबत खंडन जारी किया है।
बहरहाल अरबों रुपए का यह बंगला मुलायम सिंह यादव ने बड़ी मेहनत और जतन से तैयार करवाया था। मुख्य मंत्री का अधिकृत सरकारी आवास भी इस आवास के आगे पानी मांगता है। सिर्फ़ राज्यपाल का राजभवन ही इस की शानो-शौक़त के मुक़ाबिल है। इस आवास की पेंटिंग कुछ लाख रुपए में नहीं हो सकती। कम से कम एक करोड़ रुपए तो लगेंगे ही। ज़्यादा ही लगेंगे। आज की तारीख़ में किसी अफ़सर के अधिकार क्षेत्र में नहीं है , यह करोड़ो रुपए जारी करना। पी डब्लू डी का मंत्री भी इस फ़ाइल को स्वीकृति के लिए मुख्य मंत्री को ही भेजेगा। कुछ समय पहले तक तो स्थिति यह थी कि एक करोड़ रुपए का कोई बजट उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री भी स्वीकृत नहीं कर सकता था। फ़ाइल केंद्र में प्रधान मंत्री के पास जाती थी। एक क़िस्सा याद आता है। वीर बहादुर सिंह तब मुख्य मंत्री थे।
मार्च का महीना था और वीर बहादुर अपनी आदत के मुताबिक मुख्यमंत्री कार्यालय में एक शाम लोगों से घिरे लेटे पड़े थे। एक वरिष्ठ आई. ए. एस. अधिकारी कुछ इंजीनियरों के साथ काफी देर से खड़े थे। वह कई बार आए गए भी पर वीर बहादुर ने उन पर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर बाद वह अधिकारी एक फाइल ले कर उन की ओर बढ़े और बोले कि, ‘सेंटर ने फिर प्रस्ताव रिजेक्ट कर दिया है।’ वीर बहादुर ने पूछा, ‘कौन सा प्रस्ताव?’ अधिकारी बाले, ‘वही पुल वाला सर। सर, तीन साल से प्रस्ताव भेजा जा रहा है और हर बार रिजेक्ट हो जाता है।’
‘क्यों-क्यों?’ पूछा वीर बहादुर ने तो अधिकारी ने कुछ तकनीकी तथा अन्य मुद्दे बता दिए। वीर बहादुर बोले, ‘इस से क्या होता है। एक करोड़ से ऊपर के लिए केंद्र की मंजूरी चाहिए। तीन पुलों के लिए 90-90 लाख का प्रस्ताव बना कर हमें दो। हम मंजूर करेंगे।’
फिर वह अधिकारी खुशी-खुशी जाने लगा तो उसे फिर वापस बुलाया और कहा कि अगले दो हफ्ते में ही तारीख तय कर शिलान्यास करवा डालो फिर बैठे ही बैठे उन्हों ने न सिर्फ़ तारीख तय की वरन् अपने को उद्घाटनकर्ता भी तय कर दिया और कहा कि केंद्र से अध्यक्षता के लिए फला को बुला लो। वह अधिकारी और इंजीनियर सारे समय जी-जी करते रहे। फिर वह अधिकारी और इंजीनियर भाव विभोर हो कर गए।
तो इस समय भी मार्च का महीना है। स्वीकृत फंड को खर्च करना भी सरकारी विभागों का सिर दर्द होता है। नहीं लैप्स कर जाता है। तो यह पेड न्यूज़ के सौदागर अपनी आत्मा तो बेच ही चुके हैं। कुछ प्रक्रिया भी होती है , हर शासकीय काम के लिए। खाला जी का घर नहीं है। यह लोग चाहते हैं कि स्वीकृत पैसा भी नष्ट हो जाए। बहुत लोग बेताब हैं योगी सरकार को विदा करने के लिए। जनता विदा करे , न करे। यह मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने वाले तो विदा कर चुके हैं। गुड है , यह सपना भी।
यह वही लोग हैं जो कभी लोकतंत्र बचाने के लिए , कभी संविधान बचाने के लिए तबाह रहते हैं। लेकिन लोकतंत्र में इन को रत्ती भर भी यक़ीन नहीं है। लोकतंत्र और संविधान बचाने की आड़ में यह लोग अपने को बचाने में लगे हैं। अपनी उजड़ी हुई दुकान को बचाने में लगे हुए हैं। एक चुनी हुई सरकार को तो यह लोग कभी स्वीकार नहीं कर पाते और जनादेश का निरंतर अपमान करते रहते हैं। लेकिन संविधान और लोकतंत्र बचाने का स्वांग भरते हैं। फासिस्ट वग़ैरह बुदबुदाते रहते हैं। अभी देखिएगा कि जो लोग सरकारी कामकाज के बहाने विदा होती योगी सरकार का सपना देख रहे हैं , ठीक यही लोग 10 मार्च की शाम से ई वी एम का गाना गाते हुए लोकतंत्र और संविधान बचाने का कोरस गान गाने लगेंगे। समवेत !

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