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दस वर्ष पुराना एक रोचक किस्सा-

रिवेश प्रताप सिंह

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दस वर्ष पुराना एक रोचक किस्सा-

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मेरे एक मित्र का विवाह तय हुआ। मित्र, घर के मालिक ठहरे… सो विवाह से जुड़ी तमाम व्यवस्थाओं की ज़िम्मेदारी पूरी तरह उन पर टिकी थी। इसलिए किफायत के साथ बेहतर प्रबंधन की हर जुगत लगाना उनकी पहली प्राथमिकता रहती थी।
दुल्हन की साड़ी, जेवर-गहने के साथ तिलक से लेकर बरात रवानगी तक दर्जनों जगह सट्टा बुक करना.. सामान संजोना मतलब कदम कदम पर खर्चा!! इधर रोज की भागदौड़ और लाखों की खरीददारी के बीच… बारातियों के तरफ से भी एक प्रचंड मांग आने लगी। बाराती अपने मनशोधन- मनोरंजन आदि के लिए मित्र पर आर्केस्ट्रा पार्टी बुक करने का दबाव बनाने लगे। मित्र ने पहले तो बहुत टालमटोल की। आर्केस्ट्रा में गाये जाने वाले फ़ालतू एवं अश्लील गीतों के कारण मारपीट एवं झगड़े- टंटे से होने वाले खतरे का हवाला देकर.. वो इस आर्थिक प्रहार से बचकर निकलना चाह रहे थे। लेकिन बाराती कहां मानने वाले भला! वो भी अड़ गये। क्योंकि अन्य विवाह समारोहों में मित्र द्वारा आर्केस्ट्रा पार्टी के मंच से गिरने वाली लहर को लूटते हुए देखा था उन्होंने। इसलिए बाराती, मित्र के प्रति बेरहम हो गये। वो मित्र की हर दलील को ख़ारिज़ कर अपने मनपसंद का आर्केस्ट्रा बुक कराने की ज़िद पर टिके रहे।
मरता क्या न करता! थक-हार कर बरातियों द्वारा फरमाइश आर्केस्ट्रा बुक हुआ। हांलांकि दाम तुड़वाने के लिए उन्होंने वो हर संभव प्रयास किया, जो वो कर सकते थे। बस इतना नहीं किया कि क्षेत्र के विधायक से आर्केस्ट्रा पार्टी के मैनेजर को फोन न कराया..बाकि चेयरमैन, ब्लाक प्रमुख सबको झोंक दिया।
खैर! तमाम रस्साकस्सी के बाद सोलह हजार नगद और गाड़ी के खर्चे के साथ कस्बे का झनकहुआं आर्केस्ट्रा बुक करके 1001 रुपए बयाना देकर सट्टा बुक कर लिये।
सट्टा बुक होने के बाद मित्र की आर्थिक चिंता ने उनके माथे पर लहर मारना शुरु कर दिया। लगे सोलह हज़ार की मोटी रकम में दुबले होने। खैर! बारात का शुभ दिन आया। गाजे-बाजे के साथ बारात चढ़ी…भोजन, जलपान हुआ और फिर रात में बारातियों के लिए महंगे वाले आर्केस्ट्रा पर धुन भी बजने लगी “हैलो माई टेस्टिंग हैलो!! एक भक्ति गीत के बाद आर्केस्ट्रा वाले अपने हिसाब से हिट गाना गाना शुरू किए… तभी आगे बैठे कुछ लड़को ने चिल्लाकर उस गाने को बंद कराया और अपनी तरफ से एक फरमाइश गीत भेजा। गाना ऐसा कि आर्केस्ट्रा वाले को याद ही नहीं… फिर किसी ने पीछे से एक लोकप्रिय गाने की फरमाइश की। आर्केस्ट्रा वाले की जान में जान आयी। फिर नयी धुन बजी लेकिन गाने का दो अंतरा पूरा हुआ नहीं कि फिर आगे के लड़के डांट-डपट कर गाना बंद करा दिए और एक नये गाने की फरमाइश, पुर्ची पर लिखकर एनाउंसर तक भिजवायी। अब दूसरी फरमाइश भी ऐसी जो आर्केस्ट्रा के तीनों डायरी में कहीं नहीं। अब यूं होने लगा कि हर पांच मिनट पर आर्केस्ट्रा बंद और नये तथा गुमनाम गाने की फरमाइश आने लगी। जब मुझे यह देखा नहीं गया तो मैं आर्केस्ट्रा पार्टी से उठकर मित्र की जयमाल की स्टेज और गया और मित्र के कान में पूरा माजरा बताया। मित्र मुस्कुराकर मेरी कान की तरफ मुंह करके बोले भाई। आर्केस्ट्रा का पेमेंट जब आधा करना है तो कोई न कोई प्लेटफार्म तो बनाना ही पड़ेगा वरना इनका पेमेंट कैसे काट पाऊंगा!! वहां आगे की दो लाइन में सब मेरे घर के बच्चे और मेरे काबिल दोस्त बैठे हैं जिन्हें सख्ती के साथ यह कहकर बिठाया हूं कि किसी भी परफार्मेंस पर न तो वाह-वाह करना है और न ही पैसा लुटाना है..और पूरे तीन दिन ढूंढ़ ढ़ूंढ कर ऐसे फरमाइश गीत जुटाया हूं कि आर्केस्ट्रा वालों की तीन पुश्त पहले तक कोई यह गाना न सुना हों। देखें किस मुंह से पेमेंट मांगते हैं।
खैर! मैंने, मन ही मन उनके चरण छुए और कहा- “धन्य हैं प्रभु”
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इस विधान सभा चुनाव में अजीत अंजुम सर को मैं लगातार देख-सुन रहा हूं। अंजुम सर चुनाव को बहुत अच्छे ढ़ंग से कवर करते हैं। सत्तापक्ष के समर्थकों से उनके प्रश्न बहुत नुकीले और तीखे होते हैं (होना भी चाहिए जो सत्ता में है… प्रश्न भी उसी से) उनके पास सरकार के विरोध और समर्थन दोनों की पर्याप्त कवरेज रहती है। दोनों को कितनी ईमानदारी से दिखाते हैं कह नहीं सकता.. लेकिन उनको देखने वाले कभी 350 तक का ख़्वाब सजा सकते हैं और उनके किसी विडियो में ऐसा झटका लगता है कि 50 भी मिल जाये तब भी ज्यादा ही है। किन्तु जो भी है.. उनकी रिपोर्टिंग देखना अच्छा लगता है भले जोखिमपूर्ण ही क्यों न हो।
महत्वपूर्ण बात यह कि प्रत्येक चरण के चुनाव के बाद अंजुम सर चाट पकौड़े खा-खिलाकर अपने पैनलिस्ट बिठाते हैं। उनके हर पैनलिस्ट अपने अपने अनुभव और आंकड़े साझा करते है।
मित्रों! ईश्वर झूठ न बुलवाये लेकिन जब मैं अंजुम सर के पैनलिस्टों को देखता हूं तो मुझे वो आर्केस्ट्रा याद आता है जिसको मेरे मित्र के भाई भतीजे घेरकर बैठे थे।
जिन्हें पहले से ही सख्त निर्देश मिला है कि किसी भी कीमत पर वाह- वाह नहीं करना है। बस उस गीत की फरमाइश करना जिसे किसी के बाप-दादा भी न सुने हों।

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