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ममता बनर्जी को उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार का क्या नैतिक अधिकार है.?

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ममता बनर्जी को उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार का क्या नैतिक अधिकार है.? अपने बयानों और बर्ताव को क्या भूल गया ममता बनर्जी और उनका कलकतिया भद्रलोक.?
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का समर्थन व प्रचार करने ममता बनर्जी उत्तरप्रदेश आ रही हैं। उनके इस निर्णय ने उन्हें संगीन सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है।
कुछ माह पूर्व बंगाल चुनाव के दौरान ममता बनर्जी और उनके कलकतिया भद्रलोक ने उत्तरप्रदेश और बिहार को जमकर कोसा था। देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री को बाहरी कह कर अपमानित किया था। हालांकि इतिहास साक्षी है कि ममता बनर्जी और उनका तथाकथित कलकतिया भद्रलोक उत्तरप्रदेश के आम आदमी के समक्ष इतने बौने हैं कि वर्तमान और इतिहास के दोनों दर्पणों में उप्र के आम आदमी के घुटनों की ऊंचाई के बराबर भी नहीं दिखाई देते हैं। उत्तरप्रदेश के समकक्ष खड़ा होने के लिए ममता बनर्जी को और उनके अभद्र कलकतिया भद्रलोक को अभी कई पड़ाव पार करने होंगे।
केवल 8 साल पहले गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री जब अपने प्रदेश से डेढ़ हजार किलोमीटर दूर वाराणसी से चुनाव लड़ने पहुंचे थे तो महादेव की नगरी काशी ने ममता बनर्जी और उनके अभद्र कलकतिया भद्रलोक की तरह उन मुख्यमंत्री को बाहरी कह कर अपमानित नहीं किया था, उन्हें दुत्कारा फटकारा नहीं था। ऐसा करने के बजाए उन्हें भरपूर मान सम्मान के साथ अपने सिर आंखों पर बैठाया। समूचे उत्तरप्रदेश की जनता ने 80 में से 73 सीटों का वरदान देकर उस गुजराती मुख्यमंत्री को देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया। इतनी उदार विशाल राष्ट्रीय सोच उस तथाकथित कलकतिया भद्रलोक की तो हो ही नहीं सकती जिसने 200 बरसों तक पीढ़ी दर पीढ़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के गोरे साहबों की नौकरी चाकरी गुलामी की हो, जिस तथाकथित कलकतिया भद्रलोक ने अत्याचारी अनाचारी आततायी ब्रिटिश सम्राट की चरण वंदना “अधिनायक जय हे, भारत भाग्यविधाता” उसके सामने खड़े होकर निर्लज्जतापूर्वक गायी हो। उल्लेख कर दूं कि नरेन्द्र मोदी का उदाहरण कोई अकेला उदाहरण या अपवाद मात्र नहीं है। आज से साठ साल पहले भी उत्तरप्रदेश का जनमानस इतना ही उदार, इतना ही विशाल और इतनी ही विराट राष्ट्रीय सोच वाला था।
स्वतन्त्रता पूर्व तत्कालीन पंजाब के अम्बाला में जन्मी तथा दिल्ली और लाहौर के कॉलेजों में अपनी शिक्षा ग्रहण करने के बाद दिल्ली से दो बार सांसद चुनी गईं एक ऐसी बंगाली महिला को जवाहरलाल नेहरू ने 1960 में उत्तरप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री तथा 1963 में उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था जिनका उत्तरप्रदेश से केवल इतना सरोकार था कि वह बीएचयू में शिक्षक रही थीं। इसीलिए 1952 और 1957 में लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उन महिला ने उत्तरप्रदेश के किसी क्षेत्र के बजाय दिल्ली को चुना था। वह बंगाली महिला 4 वर्ष तक उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रही थीं। लेकिन विपक्षी दल के भी किसी नेता ने ममता बनर्जी की तरह राजनीतिक संकीर्णता क्षुद्रता दिखाते हुए यह नहीं कहा था कि इस बंगालिन का तो उत्तरप्रदेश से कोई लेनादेना ही नहीं है, यह तो बाहरी है इसे उत्तरप्रदेश से भगाओ। उत्तरप्रदेश की जनता ने भी उस बंगाली महिला को ममता बनर्जी और उनके अभद्र कलकतिया भद्रलोक की तरह बाहरी कह के अपमानित नही किया था। उस बंगाली महिला को दुत्कारा नहीं था। इसके बजाय उस बंगाली महिला को उत्तरप्रदेश की जनता ने भरपूर स्नेह और सम्मान दिया था। हालांकि ममता बनर्जी का आचरण यह संकेत देता है कि पढ़ने लिखने से ममता बनर्जी का कोई खास लेनादेना नहीं है लेकिन कभी फुर्सत मिले तो उनको उन बंगाली महिला “सुचेता कृपलानी” की कहानी को जरूर पढ़ना चाहिए जिनके गुजराती पति जेबी कृपलानी का भी उत्तरप्रदेश से कोई लेनादेना नहीं था किंतु जेबी कृपलानी को भी उत्तरप्रदेश में भरपूर मान सम्मान मिला। उस कहानी को पढ़ने के बाद शायद ममता बनर्जी की समझ में ठीक से आ जाए कि क्षेत्रीयता के विष से संक्रमित उनकी सोच किसी मोहल्ला स्तर के छुटभैये नेता से भी निकृष्ट है। देश का प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षामंत्री ममता बनर्जी को बंगाल में सिर्फ इसलिए बाहरी लगता है क्योंकि वो बंगाली नहीं है।
सुचेता कृपलानी की कहानी उत्तरप्रदेश के जनमानस की उदार विशाल राष्ट्रीय सोच का एकमात्र उदाहरण नहीं है।
भारतीय सभ्यता संस्कृति धर्म और ज्ञान की राजधानी वाराणसी के सर्वाधिक वीवीआइपी और वास्तविक भद्रलोक का क्षेत्र है “वाराणसी दक्षिण”। इस “वाराणसी दक्षिण” क्षेत्र की जनता ने लगातार 7 बार एक बंगाली दादा श्यामदेव रॉय चौधरी को विधायक चुनकर विधानसभा में भेजा। हर बार 30-40 हजार वोटों से जिता कर भेजा। जबकि बंगाली मतदाताओं की संख्या वहां 3-4% भी नहीं है। उल्लेख कर दूं कि कालजयी साहित्यकार कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद की जन्मस्थली और कर्मस्थली है “वाराणसी दक्षिण”। शास्त्रीय संगीत का ककहरा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने इसी क्षेत्र के बालाजी मंदिर की चौखट पर बरसों तक शहनाई बजा कर ही सीखा और यहीं के होकर रह गए। ऐसे नामों की सूची बड़ी लंबी है। ममता बनर्जी के तथाकथित कलकतिया भद्रलोक की आज तक की सूची में एक भी नाम उनकी बराबरी का नहीं है।
उत्तरप्रदेश वह धरती है जिसके भद्रलोक का विस्तार कबीर, सूर, तुलसी से लेकर महाकवि निराला और प्रसाद तक है। ये वह भद्रलोक है जिसने सम्राटों के आग्रहों अनुरोधों आदेशों को ठुकराने के नैतिक चारित्रिक बल का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। सम्राटों की चरणवंदना “अधिनायक जय हे, भारत भाग्यविधाता” गाने के बजाए स्वाभिमान के साथ अपनी कुटिया में जीवन गुजारने को ही श्रेष्ठ समझा।
इसीलिए इस लेख की शुरुआत ही यह लिखते हुए की है कि… उत्तरप्रदेश के समकक्ष खड़ा होने में ममता बनर्जी को और उनके अभद्र कलकतिया भद्रलोक को अभी कई जन्म लेने पड़ेंगे।
जिस योगी आदित्यनाथ को ममता बनर्जी गुंडा कहती हैं उन योगी आदित्यनाथ की सरकार के 5 साल के कार्यकाल से अपने दस साल के कार्यकाल की तुलना किसी भी कसौटी पर ममता बनर्जी और उनका तथाकथित कलकतिया भद्रलोक एड़ी चोटी का जोर लगा कर कर ले। ममता बनर्जी हर कसौटी पर योगी आदित्यनाथ से सैकड़ों कोस पीछे खड़ी दिखाई देंगी ।

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