Home हमारे लेखकनितिन त्रिपाठी रूस और यूक्रेन के युद्ध में विशेष

रूस और यूक्रेन के युद्ध में विशेष

by Nitin Tripathi
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रूस और यूक्रेन के युद्ध में विशेष कर हम भारतीयों को अमेरिकन ऐंगल बिल्कुल नहीं समझ आ रहा है. वैसे भी दसकों से भारत में रूस का प्रॉक्सी शाशन रहा है तो हममे अधिसंख्य बाई नेचर रूस के ज़्यादा क़रीब हैं.
यह युद्ध पूरी तरह से अमेरिकन टर्फ़ पर लड़ा जा रहा है. सबको पता है आज नहीं तो कल यूक्रेन पर रूस का क़ब्ज़ा हो ही जाएगा. पर यह युद्ध का ख़ात्मा नहीं बल्कि आरम्भ है. युद्ध जीतने के पश्चात यूक्रेन में फ़्रेंड्ली सरकार बनाना और उसे फ़ुल सपोर्ट देना रूस की मजबूरी रहेगी. तो वहीं यूक्रेन ने अपने नागरिकों को हथियार बाँट दिए हैं, अमेरिका / यूरोप यूक्रेन में अपना प्रपोगंडा चलाते रहेंगे, हथियार सप्लाई करते रहेंगे, गुरिल्ला युद्ध लम्बे समय चलेगा. जिसकी सीधी क़ीमत यूक्रेन और रूस को ही देनी होगी. अमेरिकन group दूर से मौज ले रहा है.
इसी बहाने रूस को फेनेंशियली तोड़ने का भी मौक़ा मिल गया. कहना आसान होता है कि स्वयं सक्षम हैं, हक़ीक़त यह है कि केवल गूगल पे और ऐपल पे बंद हो जाने से रूस में जाम लग गए. भविष्य के लिए तगड़े आर्थिक सेंशन हैं, रूबल की वैल्यू एक दम डाउन, रूस से आयात निर्यात नहीं किया जा सकता, यहाँ तक कि रूसी जहाज़ों तक को परमीशन नहीं. इस पूरे परिप्रेक्ष्य में अमेरिकन group का इकलौता शॉर्ट टर्म नुक़सान यह है कि रूस से तेल की सप्लाई बंद हो जाएगी, अल्प काल में तेल का रेट बढ़ेगा. पर साथ ही खाड़ी के देशों से तेल का उत्पाद बढ़ा, स्वयं अमेरिका जो अपने संसाधनों का दोहन मिनमम करता है अपने तेल खनन को बढ़ा इस तेल शोर्टेज को कंट्रोल कर लेगा.
भारत में बैठ ऐसा भले लगता हो कि चीन अमेरिका को आँखें दिखा सकता है. हक़ीक़त में चीन का अमेरिका / eu से व्यवसाय रूस से दस गुना है. हर चीनी कम्पनी बाहर जो भी व्यवसाय करती है अमेरिकन गाइड लाइन में रहते हुवे ही करती है. अमेरिका को नाराज़ कर रूस में व्यवसाय करने वाली कम्पनियाँ किंचिद ही मिलेंगी और जो रहेंगी भी वह मजबूरी का फ़ायदा उठाने वाली ही रहेंगी.
भारत के परिप्रेक्ष्य से वर्तमान भारत का रूस को ओपन सपोर्ट देना मुश्किल है क्योंकि रूस के अन्य सहयोगी दल चीन पाकिस्तान आदि भारत के दुश्मन राष्ट्र हैं. साथ ही वर्तमान भारत वैश्विक ताक़त / व्यावसायिक ताक़त बढ़ा रहा है तो वह केवल रूस / चीन के सहारे दो तीन देशों में सिमट कर नहीं रहना चाहता. पर साथ ही सत्तर वर्षों की मित्रता / पूर्व सरकारों की अकर्मण्यता की वजह से भारत रक्षा क्षेत्र में आज भी रूस पर ही निर्भर है. भारत के लिए बहुत फूंक फूंक कर कदम रखना आवश्यक है.
रूस पर यह युद्ध नाटो / अमेरिका का थोपा हुआ है. यदि रूस इसे शीघ्र पूर्ण रूप से कंट्रोल कर ले जाता है तो अद्वांटेज रसिया रहेगा अन्यथा यूक्रेन के रूस का अफ़ग़ानिस्तान बन जाने की पूरी सम्भावना है.

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