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रूस – यूक्रेन युद्ध: अमरीका के आधिपत्य के अंत का आरंभ

Pushker Awasthi

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**रूस – यूक्रेन युद्ध: अमरीका के आधिपत्य के अंत का आरंभ**
आज प्रातः रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण की घोषणा कर और तीन तरफ उसकी सीमाओं में घुस कर, लगातार बढ़त बना, विश्व में पिछले कई दिनों से चल रही ओहपोह की स्थिति का अंत कर दिया है। आज जब तक रूस की सेनाओं ने यूक्रेन की सीमाओं पर थल वा नभ से आक्रमण नही किया था, तब तक विश्व द्वारा, विशेषकर अमेरिका वा उसके नाटो के सदस्य राष्ट्रों को यही आशा थी की रूस, यूक्रेन पर सीमित सैन्य कार्यवाही मिलिट्री करेगा और शेष विश्व द्वारा आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने पर, रुक जाएगा।
लेकिन ऐसा हुआ नही बल्कि रूस, अमेरिका और उसके यूरोप के नाटो सदस्यों की तमाम धमिकयों का तिरस्कार करते हुए, आगे बढ़ गया है। मुझे इसको लेकर कोई संशय नही है की यूक्रेन रूस के बीच हो रहा यह युद्ध सिर्फ यही तक केंद्रित नही रहेगा बल्कि ‘युद्ध’ अपनी परिधि बढ़ाएगा। मैं वर्तमान में इस परिधि में अमेरिका या नाटो राष्ट्रों को आते हुए नही देखता हूं क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति जोए बाइडेन कभी भी यूक्रेन को लेकर, रूस के विरुद्ध सैन्य शक्ति के प्रयोग करने की मानसिकता नही रखते थे। जोए बाइडेन एक थके और फूंके हुए, अमेरिकी लिबरल वामियों के समर्थन से राष्ट्रपति बने डेमोक्रेट है जो अमेरिका को एक युद्धकालीन राष्ट्रध्यक्ष का नेतृत्व देने में पूरी तरह अक्षम है।
हम यदि यूक्रेन रूस के संदर्भ में पिछले एक माह के घटनाक्रम को देखे तो यह स्पष्ट है की यूक्रेन जिस नियति को प्राप्त हो रहा है, वह अमेरिका की हठधर्मिता वा जोए बाइडेन द्वारा रूस के राष्ट्रपति पुतिन की संकल्पशक्ति का व्यवहारिक आंकलन करने की गलती किया जाना है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन, जब विंटर ओलंपिक्स में बीजिंग गए थे और वहां चीन के राष्ट्रपति शी के साथ एक बड़ा ट्रेड एग्रीमेंट किया था, तभी अमेरिका को यह समझ लेना चाहिए था की रूस और चीन दोनो मिल कर, अमेरिका के आधिपत्य को चुनौती देने के लिए समझौता कर चुके है। अमेरिका ने इसकी गंभीरता को शायद इसलिए नही लिया क्योंकि इतने दशकों से अपने अहंकार में लोकतंत्र को लेकर इतना विरोधाभासी विदेश नीति का अनुपालन करता रहा है कि आज, जब परिवर्तन का दशक है और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के सृजन का काल है, तब चूक गया है।
मैं समझता हूं की हम युद्ध, विभीषिका, सामाजिक वा राजनैतिक द्वंद और शासकीय तंत्र के पुनर्गठन के दशक के काल में है, जहां नैतिकता की न आंख और न कान होते है। ऐसे में वही राष्ट्र वा उसका समाज सफल होगा जो राष्ट्र अपने आत्मसंरक्षण की नीति को प्राथमिकता देगा। मैं आने वाले समय में, यूक्रेन के समर्पण के बाद, ताइवान पर चीन का एक सफल आक्रमण देख रहा हूं। संभवतः, ताइवान अपने वर्तमान अस्तिव के अंतिम माहों में है। मुझे लगता है की यूक्रेन में रूस की सफलता से प्रेरित चीन ताइवान पर आक्रमण कर अधिकृत कर लेगा और अमेरिका, चीन से सीधे युद्ध की हिम्मत न करने के कारण सही समय पर निर्णय लेने में असफल सिद्ध होगा। यहां यह भी संभव है की आगामी माह, विशेषकर नवंबर 2022 से पहले चीन, भारत की अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर बड़ा आक्रमण करने का प्रयास करे लेकिन इस पर अभी बहुत कुछ नही कहा जा सकता है।
मैं यह समझता हूं की भारत के लिए अभी किसी के साथ खड़े होने का समय नहीं है क्योंकि यूक्रेन कभी भी भारत का मित्र राष्ट्र नही रहा है। भारत के भविष्य के लिए, वर्तमान में अमेरिका के एकल प्रभुत्व का टूटना बड़ा आवश्यक है। आगे वैश्विक भूराजनीति में क्या क्या परिवर्तन होगा और उसका सामरिक समीकरणों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, वह जहां 2022 जाते जाते संभावनाओं के द्वार खोल देगा, वहीं 24 फरवरी 2022 में यह स्पष्ट कर चुका है की अमेरिका की सुपर पावर है से सुपर पावर ‘था’ की यात्रा आरंभ हो चुकी है।

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