Home लेखक और लेखदेवेन्द्र सिकरवार लक्ष्मण अपनी शब्द रूपी तलवार लेकर फिर से तत्पर खड़े हों।

लक्ष्मण अपनी शब्द रूपी तलवार लेकर फिर से तत्पर खड़े हों।

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अजीत प्रताप सिंह जी का सुंदर आलेख, मानो लक्ष्मण अपनी शब्द रूपी तलवार लेकर फिर से तत्पर खड़े हों।

 

जाने किस मित्र की पोस्ट पर एक श्लोक पढ़ा जो ब्रह्मपुराण से लिया गया है और मन वहीं अटक गया। श्लोक पंचकन्याओं पर है, जिसका भाव यह है कि इन कन्याओं को प्रतिदिन स्मरण करने से पाप धुल जाते हैं।
श्लोक यह है :
अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा।
पंचकन्या: स्मरेतन्नित्यं महापातकनाशम्॥
उपरोक्त पाँचों नाम कन्याओं के नहीं, अपितु विवाहित स्त्रियों के हैं, फिर भी इन्हें कन्या माना गया है। क्यों माना गया है, नहीं जानता।
इन पाँच स्त्रियों का हमारे इतिहास पर गहरा प्रभाव है। आप रामायण और महाभारत को इतिहास न मानते हों तो अलग बात है। अहल्या, तारा और मंदोदरी रामायण काल की हैं और द्रौपदी एवं कुंती महाभारत काल की।
इंटरेस्टिंग फैक्ट यह है कि यह सभी एकाधिक पुरुषों के संग रही हैं।
-अहल्या ने जानते-बुझते कपटवेशधारी इंद्र से सम्बन्ध बनाए और फिर प्रायश्चित किया।
-तारा बाली की पत्नी थी। फिर बाली के मरने पर सुग्रीव से विवाह किया।
-मंदोदरी रावण की पत्नी थी और उन्होंने भी रावण के मरने पर विभीषण से विवाह किया।
-कुंती ने अज्ञानतावश पहले सूर्य से, फिर पुत्रप्राप्ति के उद्देश्य से तीन अन्य देवताओं से सम्बन्ध बनाए।
-द्रौपदी पाँच व्यक्तियों की पत्नी रही।
प्रश्न यह उठ सकता है और मुझे भी जानना है कि सीता, अनुसूया, सावित्री इत्यादि अन्य एकपतिव्रता स्त्रियों को छोड़ इन पांच को ही क्यों इतना मान दिया गया है (हालांकि इन पांचों को मान देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह अन्य पूजनीय स्त्रियों की उपेक्षा है!)
सहज प्रश्न है, इसमें इनके प्रति कोई अपमान की भावना नहीं है। इस प्रश्न को छोड़कर आगे विचार करें तो हमें कई बातें दिखती हैं जो रुचिकर हैं और कई तरह की प्रचारित भ्रांतियों को भंग करती हैं।
अहल्या, एक स्त्री जो किसी कमजोर क्षण में परपुरुष पर मोहित होकर वैवाहिक जीवन की मर्यादा तोड़ देती है (रामायण के अनुसार उन्होंने जानते-बुझते सम्बन्ध बनाए थे), उसे उसका पति छोड़ देता है। उसका कत्ल नहीं करता, जिना करने के अपराध में पत्थर मारकर हत्या नहीं कर देता, बस त्याग देता है। सभ्य समाज का सभ्य पुरुष यही करेगा। आधुनिक कानून भी ऐसा करना उचित मानता है। पर वही पुरुष अपनी पत्नी द्वारा किए गए पश्चाताप पर उसे वापस स्वीकार करता है। इस बीच वह किसी अन्य स्त्री से विवाह नहीं करता। भारतीय इतिहास को पुरुषवादी कहने वाले लोगों को यह उदाहरण देखना चाहिए कि पुरुष अपनी स्त्री से इतना प्रेम कर सकता है कि उसकी अनुपस्थिति में अन्यंत्र नहीं जाता और अंततः इतनी बड़ी गलती को भी क्षमा कर देता है।
आज ही किसी ने लिखा कि द्रौपदी पाँच से विवाह कर लांछित होती है और कृष्ण सोलह हजार से विवाह कर भी पूज्य हैं। पहली बात कि यह श्लोक ही बताता है कि द्रौपदी लांछित नहीं पूज्य मानी गई हैं। पूरे महाभारत में केवल एक व्यक्ति ने उन्हें अपशब्द कहे थे और वह था प्रगतिशील कहे जाने वाले लेखकों द्वारा महिमामण्डित कर्ण, जो महाभारत के अनुसार दुर्योधन और शकुनी के समान ही, और कई जगहों पर उनसे अधिक धूर्त, कपटी और नराधम था। द्रौपदी पाँच पुरुषों की पत्नी थी, और उन पाँच पुरुषों की भी द्रौपदी के अतिरिक्त भी अन्य स्त्रियां थी। अर्जुन की तो चार थीं, भीम की बलन्धरा, नकुल की करेणुमती, सहदेव की विजया और युधिष्ठिर की भी एक और पत्नी देविका थी। पर इंद्रप्रस्थ, राजसूय यज्ञ और महाभारत युद्ध की विजय के बाद पूरे साम्राज्य के सम्राट के रूप में यदि युधिष्ठिर सिंहासन पर बैठे तो उनके साथ साम्राज्ञी के रूप में द्रौपदी भी अभिषिक्त हुई।
रही कृष्ण की बात तो उन्होंने उन आठ स्त्रियों से विवाह किया जिन्होंने उनसे प्रेम किया और उन आठों ने अपने पिता इत्यादि सम्बन्धियों को विवश किया कि उनका विवाह केवल कृष्ण से हो। रुक्मिणी ने पिता भीष्मक और भाई रुक्मी को विवश किया, सत्यभामा ने पिता सत्राजित को विवश किया, जाम्बवंती ने जाम्बवंत को विवश ही किया।
कुंती ने नियोगविधि से संतान प्राप्त की। यह कहीं स्पष्ट नहीं लिखा कि नियोग का वास्तविक अर्थ क्या है। क्या शारीरिक सम्बन्ध या इनविट्रो फर्टिलाइजेशन जैसी कोई चीज। जो भी हो, यह उस समय की मान्य विधि रही होगी। बावजूद इसके उनके पति उनसे सदैव प्रेम करते रहे, उनके पुत्र उनका सम्मान करते रहे, वे महारानी या राजमाता के रूप में सदैव प्रतिष्ठित रहीं। किसी ने भी कभी भी उन्हें असम्मानजनक भाव से नहीं देखा। क्या पितृसत्तात्मक समाज का पुरुष इतना उदार हो सकता है? उत्तर स्वयं विचारिये।
मंदोदरी और तारा, दोनों ने अपने पतियों की मृत्यु के पश्चात विवाह किया। तो क्या विधवा विवाह उस समय मान्य था? अमान्य होता तो क्या स्वयं राम विभीषण से कहते कि मंदोदरी से विवाह कर लो?
अब कोई कह सकता है कि वे तो वानर या राक्षस थे। उनकी सभ्यता में यह चलता होगा। हालांकि मैं नहीं मानता कि वानर या राक्षस मनुष्य प्रजाति से भिन्न प्रजाति होंगी, यदि होती तो मानव, देव, राक्षस, नाग, वानरों में आपसी विवाह न होते। वानरों को छोड़ दें तो राक्षसों के राजा रावण को तो हममें से कई लोग न केवल मानव मानते हैं बल्कि ब्राह्मण भी मानते हैं।
इसके अतिरिक्त एक प्रकरण शुद्ध मानवों का भी है। सोने के मृग, मारीच वाले प्रकरण में सीता लक्ष्मण पर क्रोधित होकर कहती हैं कि तुम इसलिए राम की मदद करने नहीं जा रहे, क्योंकि तुम चाहते हो कि राम न रहे और मैं तेरी हो जाऊं।
तो विधवा विवाह उस समय भी होते रहे होंगे।
अस्तु, इस श्लोक से यह तो सिद्ध होता ही है कि हमारा पुराना इतिहास पुरुषवादी नहीं था और न स्त्रीविरोधी था, बल्कि आधुनिक समाज से अधिक उदार, अधिक सहिष्णु और अधिक लैंगिक-साम्यता रखता था।
बाकी,
मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।

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