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विषैलावामपंथ

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मेरा एक मित्र था मेडिकल कॉलेज में… कमाल का नर्ड. हर समय मेडिसिन, फिजियोलॉजी, पैथोलॉजी ही सोचता था. एक दिन उसने बताया, जब वह किसी को देखता है तो सोचता है कि वह कैसे साँस ले रहा है, कैसे उसके लंग्स में एल्वीओलाई में गैस एक्सचेंज हो रहा है, कैसे उसके सेल्स में एटीपी के ब्रेकडाउन से एनर्जी रिलीज हो रही है, कैसे वह खा रहा है तो अभी फ़ूड उसके एसोफेगस को पार करके स्टमक में जा रहा है, कब उसमें गैस्ट्रिक जूस, पैंक्रियाटिक एंजाइम रिलीज हो रहा है. जब कोई चलता है तो कैसे उसके कौन से मसल कॉन्ट्रैक्ट कर रहे हैं…
जब कोई फिजिसिस्ट दुनिया को देखता है तो उसे हर चीज में फिजिक्स काम करता दिखाई देता है. रामानुजम को हर चीज में मैथमेटिक्स दिखाई देता था. यह खूबी है साइंस की.. वह आपको नेचर की हर चीज में दिखाई देती है.
जब मैं घर से निकलता हूँ तो मुझे हर चीज में इकोनॉमिक्स एक्शन में दिखाई देती है. हर बात का कारण इकोनॉमिक्स में दिखाई देता है. ह्यूमन एक्शन्स का सजीव प्रभाव हर बात में दिखाई देता है. यह महत्व की बात नहीं है कि मैंने इकोनॉमिक्स पढ़ा कितना है, बल्कि यह कि जो पढ़ा है उसे अपने जीवन में स्वयं देख पाता हूँ या नहीं.
आज हम पति पत्नी टहलने निकले तो जैसे ही अपने गाँव की सड़क को पार करके दूसरे मोहल्ले में कदम रखा, हमने उस इलाके के बदले हुए इकोनॉमिक प्रोफाइल को नोटिस किया.
हमारा गाँव इंग्लैंड के सबसे धनी इलाकों में से एक है, जहाँ कुछ घर कई कई मिलियन्स के हैं. कुछ घरों में फुटबॉलर्स, फ़िल्म स्टार्स, सेलेब्रिटीज़ रहते हैं ऐसा सुना है. सड़क पार करते ही जो घर दिखाई दिए वे पुराने हैं, पुरानी स्टाइल के हैं. सुन्दर इलाका है, हिल के ऊपर है. वहाँ से नीचे घाटी का सुंदर दृश्य दिखता है. घर भी डिसेंट साइज के हैं, पर प्रॉपर्टी प्राइस कम है. किसी भी इलाके की इकोनॉमिक प्रोफाइल वहाँ खड़ी कारों से पता लगती है. मैंने गिना, पहली तीस कारें सारी फोर्ड, टोयोटा, सेट्रोन, वॉक्सहॉल… सारी सस्ती कारें, पुरानी.. एक भी एसयूवी नहीं, एक भी मर्क, बीएमडब्ल्यू, ऑडी नहीं. पहली सबसे बड़ी एक कार दिखी वह वॉल्वो की XC60, 9 साल पुरानी.
फिर उसी गाँव में आगे बढ़े तो नए बने हुए घर दिखाई दिए. उन घरों का इकनोमिक प्रोफाइल अलग था. गार्डन वेल मैन्टेन्ड थे. ड्राइववे पर मर्सेडीज़ और बीएमडब्ल्यू दिखने लगी.
हम बात करने लगे, 500 यार्ड में यह फर्क कैसे आया?
तो जो लोग इन घरों में रह रहे हैं वे संभवतः औसतन आज से 30-40 साल पहले आये होंगे. वे आज रिटायर हो चुके होंगे यानि वे अपने इनकम के प्राइम में नहीं रहे. तब प्रॉपर्टी की प्राइस कम रही होगी. आज प्रॉपर्टी की प्राइस बढ़ गयी है, और आज जो नया पॉपुलेशन घर खरीद रहा है उसकी उम्र कम है और वह अपने अर्निंग पोटेंशियल के प्राइम में है. जगह रहने के लिए सुंदर है, पर यहाँ स्कूल भी अच्छे होने चाहिए. ट्रान्सपोर्ट लिंक भी अच्छा होना चाहिए. अगले कुछ वर्षों में इन घरों में धीरे धीरे नया पापुलेशन आता जाएगा और इस इलाके की इकोनॉमिक प्रोफाइल भी बदल जाएगी.
ऐसी छोटी छोटी बातें हर समय इकोनॉमी में होती रहती हैं. जैसे खाने पर एंजाइम का सेक्रीट होना, चलने पर मसल्स का कॉन्ट्रैक्ट होना…कार्बोहायड्रेट का ग्लाइकोजन में बदलना और लिवर में जमा होना…सेल के माइटोकांड्रिया में एटीपी का टूटना. वैसे ही हर छोटे से छोटे स्तर पर इकोनॉमी में एक के बाद एक रिएक्शन होते रहते हैं जिनमें से कुछ हमें दिखते हैं, कुछ नहीं दिखते.
पर कुछ लोगों को सिर्फ एन्ड-रिजल्ट दिखते हैं. और उन्हें एन्ड-रिजल्ट पसंद नहीं आते तो वे उन्हें बदल देना चाहते हैं. पर इकोनॉमी एक जीवित ऑर्गेनिज्म है. उसे आप अपनी पसन्द का नहीं बना सकते..जैसे आप अपनी मर्जी से किसी का हाथ, किसी का पैर, किसी का सर, किसी का लिवर और किसी की किडनी जोड़ कर एक जीवित मनुष्य नहीं बना सकते. मनुष्य के पैदा और बड़े होने की एक नियत प्रक्रिया है. जैसे इसे अपनी मनमर्जी से बदल कर एक आइडियल ह्यूमन बीइंग की मैन्युफैक्चरिंग नहीं की जा सकती, वैसे ही अपनी मर्जी से एक आदर्श इकॉनमी नहीं बनाई जा सकती. उसे समझा जा सकता है, जाना जा सकता है, उसके अनुकूल अपने व्यवहार को एडजस्ट किया जा सकता है. पर उसे अपनी मर्जी से नहीं चलाया जा सकता.
पिछले सौ वर्षों में आर्थिक निरक्षर वामपन्थियों ने किसी का हाथ, किसी का सर काट कर, किसी का लिवर, किसी की किडनी निकाल कर एक आदर्श इकोनॉमी की मैन्यूफैक्चरिंग के प्रयास किये हैं. इस प्रयास में उन्होंने कितनी ही सोसाइटीज को क्षत-विक्षत किया है, कितनी ही आर्थिक हत्याएँ की हैं. करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेला है और करोड़ों जीवन बर्बाद किये हैं. उन नीम-हकीमों को समाज की हत्या ना करने दें.. अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा करें.

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