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होली बनाम गाँव का रंग

by Jalaj Kumar Mishra
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होली बनाम गाँव का रंग

 

गाँव आपके अन्त:करण में ऐसे धँसा होता है जिसको आप चाह कर भी निकाल नही पाते हैं। गाँव के त्योहार का लालित्य और सौन्दर्य शब्दों में उतरने के लिए तैयार ही नही होता हैं।होली तो शहर में सिर्फ इसलिए याद रहता हैं कि इस दिन ऑफिस बन्द रहता हैं।
अर्बनाइजेशन के चक्कर में गाँव अब गाँव नही रह गया हैं फिर भी भारतीय दर्शन और भारतीय जन-जीवन का सौन्दर्य आज भी गाँव में ही हैं। अभी के समय में सरसों का बंसती परिधान, गेहूँ के बालीयों की छटा तो जस की तस हैं परन्तु कोहार के चाक अब सौर ऊर्जा वाले हो गये हैं। अब मैं बहकने लगा हूँ। गाँव ना नाम‌ लेते ही मुझे सजाव दही कि याद ऑटोमेटिक आने लगती है।
सच पुछिए तो भागते भागते अब हम थकते नही है क्योंकि उम्मीदों के बोझ तले हम सब इस कदर दबे हुए है कि रुकना मना है। महानगरीय जीवन में शान्ति मुश्किल ही नही नामुमकिन सी है। महीनों गुजर जाते है, सूर्योदय और सूर्यास्त के दर्शन नही हो पाते है। गौरैया कि अवाज तो छोड़िए उसकी तस्वीरें अब केवल गौरैया दिवस पर दिखाई देती है। कौवे भी अब नगर मे मुश्किल से दिखाई देते है। पड़ोसी का अजनबी बने रहना महानगरीय जीवन मे आम है लेकिन फुआ और मामा के घर वाले रिश्ते भी अब छुटते जा रहे है। अपनों को याद किए महीनों हो जाते है। जो पास में है या नितांत अपने है सिर्फ उनको ही हम सामयिक याद कर पा रहे है।आँख बन्द कीजिए और गाँव याद कीजिए। याद कीजिए पगडंडी, बाँसवारी, बगीचा, तालाब, पोखरा, ब्रह्म बाबा, पकड़ी का पेड़ , कुँआ, बगीचे में लगा झूला, माल-मवेशी और उसके साथ कच्ची पक्की सड़कों पर दौड़ते भागते सपनों का करवाँ, दादी की ममतामयी मुस्कान और दादाजी का दुलार वाला हाथ, साँझ वाली मंदिर की आरती और मिट्टी की वह खुशबू जिसके लिए शब्दकोश के पास समुचित शब्द नही है।
कॉलेज वाले चेहरे अब धुँधले पड़ रहे है। स्कूल वाली यादें सिर्फ कुछ पुराने एल्बम तक सिमट चुकी है। भूतकाल के किए वादे, वर्तमान में यादों में भी नही दिखाई दे रहे है। गतिमान जीवन एक खामोशी लिए दिन प्रतिदिन ढल रहा है।कल तक लगता था कि वापस समेट कर गाँव चला जाऊँगा। अब न जाने क्यों गाँव दुर और बहुत दुर लग रहा है। घर वापसी अब होगी या नही! तत्कालिक यह कहना नामुमकिन सा दिखता है।
बसंत गाँव में ही दिखाई और महसूस होता है। बसंत की मादकता अंगड़ाई लिए हुए जब होली तक पहुँची है, यह चरम पर होती है। फागुन का आंचलिक लालित्य आप इससे समझ सकते है कि इस मास में बुढ़ आदमी से भी महिलाएँ देवर जैसा हँसी मजाक और ठीठोली करती है। होली का देशज फगुआ है। रंग और गुलाल को लगाने का प्रचलन वैसे तो बंसत पंचमी के दिन से ही शुरु हो जाता है।फागुन में राह पर चलते अनजान राहगीर को भी आप अगर रंग लगा दे तब भी वह बुरा नही मानता। गेहूँ कि बालियाँ और आमों पर लगे मोजर आपको अपने आगोस में पास ऐसे बुलाते है, जैसे आप निश्चल बच्चे की भाँति हो!
गाँव पर त्योहारों से पहले खरीदारी करने की एक मासूम परम्परा है। गाँव में फागुन के माह हर दिन, रात में फगुआ, झाल, ढोलक और हरमुनियम के साथ गाने की परम्परा है।फागुन गाँव को मिलाने के लिए भी जाना जाता है। होली का इतिहास और संबंध पौराणिक है। पुर्वांचल में होली गायन के दौरान शुरुआती गीतों में जब स्वर निकलता है;
घरहीं कोशिला मैया करेली सगुनवा,
बने बने राम जी के बीतेला फगुनवा…
उसके बाद जो अगर किसी ने शुरु कर दिया
रामऽ खेले होली, लछुमन खेले होली
लंका गढ़ में रावण खेले होली …
फिर क्या कहने, संगीत का जादू फिर सर चढ़ कर आपको अपने आप झूमने पर मजबूर कर देता है।
हँसेला जनकपुर के सब लोग
लइका राम धनुषऽ कैइसे तुरिहें…
इस गीत का लय,ताल और प्रस्तुतीकरण, अहा! फगुआ गान के ऐसे दृश्य को आप शब्दो में समेट नही सकते बस महसूस कर सकते है।
राधे घोरऽ ना अबीर, राधे घोरऽ ना अबीर,
मंड़वा में अइलें कन्हैया।
आ हो राधे घोरऽ ना अबीर, राधे घोरऽ ना अबीर,
राधे घोरऽ ना अबीर, की मंड़वा में अइलें कन्हैया ।
मंड़वा में अइलें कन्हैया हो मंड़वा में अइलें कन्हैया
की मंड़वा में अइलें कन्हैया ।
राधे घोरऽ ना अबीर, राधे घोरऽ ना अबीर
मंड़वा में अइलें कन्हैया ।
इन सबो के बीच जोगीरा सा रा रा रा रा रा कहते हुए ताल‌ ठोकना ….
फ़ागुन महिनवा जी सबसे रंगीन हां सबसे रंगीन..
याद करे बुढवा जवानी के दिन .. जोगीरा सारारारारा…..
होली सामाजिक समरसता का त्योहार है। अंत में सबके मंगल कि कामना करते हुए जब गाया जाता है कि
सदा आनन्द रहे एही द्वारे,
मोहन खेले होली हो….
तब लगता है कि सबके मंगल कि कामना करने कि क्षमता सिर्फ हिन्दुस्तानी परम्परा में ही संभव है।होली के दिन रात में गायन के अंतिम गाने के रुप में चइता उठा कर होली और फाल्गुन मास‌‌ को विदाई दी जाती है। चइता सुन कर रोम‌ रोम‌ पुलकित हो उठता है और मन सोचता है कि काश! मैकाले कि शिक्षा नीति को पुरखो ने ठोकर मार दी होती फिर गाँव कट कर शहर नही बसते और ना ही गाँव छोड़ कर शहर के कबूतर खाने में बन्द होने के लिए गाँव का सर्वश्रेष्ठ दिमाग लालायित रहता!
गाँव के होली का प्रत्यक्ष संबंध मानसिक अनुभूति से है। इसकी याद थकान में भी मानसिक शान्ति देने वाली होती है।गाँव सनातन है और इसको‌ ऐसे ही बने रहने में ही सबकी भलाई है।
आप‌ सभी सम्मानित मित्रों को होली कि हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ ।

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