बचपन में हमारे मोहल्ले में एक रज्जन चच्चा रहा करते थे। चच्चा चरसी थे और अक्सर करके उनका किसी न किसी से झगड़ा हो जाय करता था। चच्चा के मुक़ाबिले चच्ची बहुत समझदार टाइप की थीं। वो हमेशा चच्चा को समझाती रहती थीं और मोहल्ले वालों को भी। उनके नशेड़ी होने की दुहाई देतीं और बतातीं कि किस तरह चच्चा अपने ही रिश्तेदारों के हाथों ज़मीन-जायदाद का मुक़दमा हार कर नशे की लत लगा बैठे हैं, अतः उन पर तरस किया जाए। जब कभी चच्चा किसी से मारपीट कर बैठते तो चच्ची दौड़ कर झगड़ा रुकवातीं और चच्चा को समझा-बुझा कर घर ले जातीं। अगले दिन चच्चा फ़िर किसी को मार बैठते।
धीरे-धीरे मोहल्ले वालों को एक बात साफ़ हुई कि चच्चा जब भी किसी से मारपीट करते हैं तो चच्ची बीचबचाव के दौरान हमेशा सामने वाले को पकड़ लेती थीं, उससे लिपट जाया करतीं और समझाने लगतीं। इस का फायदा उठा कर चच्चा न सिर्फ सामने वाले को दो घूंसे और जड़ देते (क्यूंकि वो तो चच्ची के पकड़ने-लिपटने से बंधा हुआ होता), बल्कि मार कर मौके से गायब भी हो जाय करते थे। फ़िर शुरू होता चच्ची का रोना-पीटना-समझाने का दौर। एक पैटर्न नज़र आने लगा।
फ़िर एक दिन ऐसे ही एक झगडे के दौरान सामने वाले ने समझाने-लिपटने-चिपटने का प्रयास कर रही चच्ची को ही ठीक से कूट दिया। अगली बार जब चच्चा लड़े तो चच्ची प्रकट नहीं हुईं। चच्चा भी अच्छे से कूटे गए। उस दिन के बाद मोहल्ले में शांति हो गयी। चच्चा कितना भी नशे में होते, किसी से उलझते नहीं थे।
वर्तमान में कुछ लिबरल/मीडियाकर्मी और राजनेता वही चच्ची का क़िरदार निभा रहे हैं। आतंक की किसी घटना के होते ही ये पहले तो आतंकवादी की मज़बूरिये-हालात बताने लगते हैं, उसके आतंकवादी बनने में सरकार और समाज का कितना दोष है समझाने लगते हैं, और फ़िर अपने वाक्जाल से मुल्क को ऐसा बांधते हैं की लोगों को आतंक की जड़ में खुद अपनी गलती समझ में आने लगती है। उधर आतंकवादी अपना अगला निशाना तय कर रहे होते हैं।
कुल मिला कर चच्ची के पिटे बगैर चच्चा के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है।

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