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प्रधानमंत्री मोदी को महाकाल का बुलावा

अमित सिंघल

by अमित सिंघल
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प्रधानमंत्री मोदी ने 11 अक्टूबर को अपने संबोधन में कहा कि ‘महाकाल लोक’ में लौकिक कुछ भी नहीं है। शंकर के सानिध्य में साधारण कुछ भी नहीं है। सब कुछ अलौकिक है, असाधारण है। अविस्मरणीय है, अविश्वसनीय है। हमारी तपस्या और आस्था से जब महाकाल प्रसन्न होते हैं, तो उनके आशीर्वाद से ऐसे ही भव्य स्वरूपों का निर्माण होता है।
महाकाल का आशीर्वाद जब मिलता हैं तो काल की रेखाएँ मिट जाती हैं, समय की सीमाएं सिमट जाती हैं, और अनंत के अवसर प्रस्फुटित हो जाते हैं। अंत से अनंत यात्रा आरंभ हो जाती है। मैं राजाधिराज महाकाल के चरणों में शत् शत् नमन करता हूँ।
महाकाल की नगरी उज्जैन के बारे में हमारे यहाँ कहा गया है- “प्रलयो न बाधते तत्र महाकालपुरी” अर्थात्, महाकाल की नगरी प्रलय के प्रहार से भी मुक्त है। हजारों वर्ष पूर्व जब भारत का भौगोलिक स्वरूप आज से अलग रहा होगा, तब से ये माना जाता रहा है कि उज्जैन भारत के केंद्र में है। एक तरह से, ज्योतिषीय गणनाओं में उज्जैन न केवल भारत का केंद्र रहा है, बल्कि ये भारत की आत्मा का भी केंद्र रहा है।
ये वो नगर है, जहां स्वयं भगवान कृष्ण ने भी आकर शिक्षा ग्रहण की थी। उज्जैन ने महाराजा विक्रमादित्य का वो प्रताप देखा है, जिसने भारत के नए स्वर्णकाल की शुरुआत की थी। महाकाल की इसी धरती से विक्रम संवत के रूप में भारतीय कालगणना का एक नया अध्याय शुरू हुआ था।
उज्जैन के क्षण-क्षण में,पल-पल में इतिहास सिमटा हुआ है, कण-कण में आध्यात्म समाया हुआ है, और कोने-कोने में ईश्वरीय ऊर्जा संचारित हो रही है।
यहाँ काल चक्र का, 84 कल्पों का प्रतिनिधित्व करते 84 शिवलिंग हैं। यहाँ 4 महावीर हैं, 6 विनायक हैं, 8 भैरव हैं, अष्टमातृकाएँ हैं, 9 नवग्रह हैं, 10 विष्णु हैं, 11 रुद्र हैं, 12 आदित्य हैं, 24 देवियाँ हैं, और 88 तीर्थ हैं।
और इन सबके केंद्र में राजाधिराज कालाधिराज महाकाल विराजमान हैं। यानि, एक तरह से हमारे पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा को हमारे ऋषियों ने प्रतीक स्वरूप में उज्जैन में स्थापित किया हुआ है।
महाकाल मंदिर प्रांगण शिवपुराण की कथाओं के आधार पर तैयार किया गया है। आप यहाँ आएंगे तो महाकाल के दर्शन के साथ ही आपको महाकाल की महिमा और महत्व के भी दर्शन होंगे। पंचमुखी शिव, उनके डमरू, सर्प, त्रिशूल, अर्धचंद्र और सप्तऋषि, इनके भी उतने ही भव्य स्वरूप यहाँ स्थापित किए गए हैं। ये वास्तु, इसमें ज्ञान का ये समावेश, ये महाकाल लोक को उसके प्राचीन गौरव से जोड़ देता है। उसकी सार्थकता को और भी बढ़ा देता है।
महाकाल का बुलावा आया और ये बेटा आए बिना कैसे रह सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के मुख से महाकाल का वैभव सुनकर मन प्रफुल्लित हो गया।

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