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जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुद्दौला

Mann Ji

by Mann Jee
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नवाब आसफ़ुद्दौला अवध का एक रंगीन मिज़ाज और दरियादिल नवाब था जिसने एक दफ़ा तो अपने खानसामे को वज़ीर बना दिया

लखनऊ के नवाबों के इतिहास में सितंबर का महीना अहम माना जा सकता है. मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह ने नौ सितंबर 1722 को नवाब सादत खान को अवध की नवाबी दी थी. नवाबों की पीढ़ी के चौथे नवाब आसफ़ुद्दौला की पैदाइश 23 सितंबर, 1748 और इंतेकाल 21 सितंबर 1797 को हुआ. दसवें और आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह का इंतेकाल भी सितंबर, 1887 में हुआ. इस तरह लगभग डेढ़ सौ साल का नवाबी काल फ़ैज़ाबाद से शुरू होकर लखनऊ में आकर ख़त्म होता है.

शुजाउद्दौला के बाद नवाब आसफ़ुद्दौला को फ़ैज़ाबाद की गद्दी मिली थी. वह अवध की राजधानी को फ़ैज़ाबाद से लेकर लखनऊ आया. इसके अलावा भी आसफ़ुद्दौला को कई खास बातों के लिए याद किया जाता है.

इमामबाड़ा

आसफ़ुद्दौला ने इसे 1784 में मुहर्रम में अज़ादारी के लिए और उस वक़्त पड़े अकाल में रियाया को रोज़गार देने के लिहाज़ से बनवाया था. इस अकाल में रईसों के पास भी पैसे खत्म हो गए थे. कहा जाता है कि आसफ़ुद्दौला ने उस दौरान 20 हजार से ज्यादा लोगों को काम दिया जिनमें आम लोग भी थे और रईस भी. बताया जाता है दिन में आम लोग काम करते थे तो रात में रईस ताकि परदा रहे. कहते हैं कि बड़ा इमामबाड़ा बनवाने में तकरीबन पांच लाख से 10 लाख रुपये खर्च हुए थे. इसी इमामबाड़े में लखनऊ की विश्वप्रसिद्ध भूलभुलैया भी है जो नवाब ने किसी संभावित हमले से बचने के लिहाज़ से बनवाई थी. आसफ़ुद्दौला के लिए रियाया कहती थी – जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुद्दौला.

अपनी मां को परेशान करने वाला नवाब

उम्मत-उल-ज़ोहरा उर्फ़ बहू बेग़म शुजाउद्दौला की बेगम थीं और आसफ़ुद्दौला की मां. वे बड़ी ज़हीन महिला थीं और फैज़ाबाद से लेकर लखनऊ तक उनका बड़ा मान था. रवि भट्ट की किताब ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़ नवाब्स ऑफ़ लखनऊ’ में ज़िक्र है कि बहू बेगम सबसे रईस बेगम थीं जिनके पास गोंडा, खारा, रुक्का, परसिद्धिपुर, मोहनगंज, सिमरौता आदि की जागीर थी. उनकी शोहरत ऐसी थी कि इन्हें फ़ैज़ाबाद का अघोषित नवाब कहा जाता था. रवि भट्ट लिखते हैं कि बहू बेग़म के प्रभाव से दूर रहने के लिए ही आसफ़ुद्दौला राजधानी लखनऊ ले गया था.

 

नवाब शुजाउद्दौला अपने बेटे से नाख़ुश था, पर बहू बेग़म के चलते उसने आसफ़ुद्दौला को नवाब बनाया. शुजाउद्दौला के मरने का मातम भी पूरा नहीं हुआ था कि आसफ़ुद्दौला ऐयाशी करने मेहंदी घाट, कन्नौज चला गया. उसने अपने मंत्री को बहू बेग़म के पास भेजकर खर्च के लिए रुपये मांगे. बताया जाता है कि हैरतज़दा बेग़म ने उससे कहा, ‘आसफ़ुद्दौला के पास क्या बाप के मरने पर आंसू बहाने का वक़्त नहीं है?’ बेग़म ने उसे छह लाख रु भिजवाये. ये ख़त्म हुए कि उसने और चार लाख की मांग रख दी. जब ये भी कम पड़ गए तो वह ख़ुद फ़ैज़ाबाद गया और अपनी जागीर के कुछ हिस्से बेग़म के पास गिरवी रखकर चार लाख रुपये उधार लिए.

बात यहीं तक नहीं रुकी. बाद में उसने बहू बेग़म की संपत्ति हड़पने के लिए उन्हें नज़रबंद करवाकर उनपर अत्याचार करवाए. मज़बूरी में बहू बेग़म को उसे 31 लाख रुपये, 70 हाथी, 860 बैलगाड़ियां और कई कीमती जवाहरात देने पड़े.

बेटे के निकाह में पैसा पानी की तरह बहाया

वज़ीर अली को आसफ़ुद्दौला ने गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की मौजूदगी में अपना वारिस घोषित किया था. जब बेटा घोड़ी चढ़कर आगे बढ़ा, तो सबको हैरत में डालते हुए आसफ़ुद्दौला कुछ रास्ते घोड़ी के आगे-आगे चला. दरबारियों ने कहा कि नवाब साहब किसी की सवारी पर बैठें तो वह बोला, ‘आज में अपने बेटे के आगे अर्दली की तरह चलना चाहता हूं.’

इतिहासकार जॉन पेमब्ल ‘द राज; द इंडियन म्यूटिनी एंड द किंगडम ऑफ़ अवध’ में लिखते हैं, ‘शादी की इस शान ओ शौक़त देखकर दिल्ली के मुग़ल भी शरमा जाते. बारात में लगभग 1200 सजे-धजे हाथी थे जिनमें से लगभग 100 हाथियों पर चांदी के हौदे थे. जिस हाथी पर नवाब आसफ़ुद्दौला बैठा, वो जवाहरातों से सजा हुआ था. बारातियों के दोनों तरफ़ नाचने वालियां चल रही थीं. पूरे रास्ते में आतिशबाज़ी होती रही. ये ज़श्न पूरे तीन दिन चला. शादी में नवाब ने 36 लाख रुपये ख़र्च किये थे. ये अवध की सबसे महंगी शादियों में से एक कही जा सकती है.’

नवाब की रंगीन मिजाज़ी

कुछ लोगों का मानना है कि नवाब आसफ़ुद्दौला समलैंगिक था और उसका कम उम्र के लड़कों का एक हरम भी था. ब्रिटिश इतिहासकार रोसी लेलेवेलन जोंस ने नवाब के ख़िलाफ़ वारेन हेस्टिंग्स को भेजी गयी रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि नवाब के समलैंगिक प्रवृति होने के चलते उसकी रानियां कई वर्षों तक कुंवारी रही थीं. शुजाउद्दौला अपने बेटे की इस आदत से इतना ख़फ़ा हो गया था कि उसने आसफ़ुद्दौला की हत्या करने की ठान ली थी. पर बहू बेग़म के बीच-बचाव के चलते उसकी जान बच गयी.

शुजाउद्दौला ने तवायफ़ संस्कृति की शुरुआत की थी. आसफ़ुद्दौला बाप से एक कदम आगे निकल गया. बड़ी मिसरी, सालारो, राम कली, हीराजान, जलालो और ख़ुर्शीद जान उसके समय की कुछ प्रमुख तवायफ़ें थीं जिनका दख़ल राजकाज में भी था. आसफ़ुद्दौला को शराब का इस हद तक शौक था कि उसने अपने मंत्री भी वही रख लिए जो शराब पीने में उसका साथ देते थे.

नवाब खाने के बेहद शौक़ीन हुआ करते थे. गिलौटी कबाबों के मुलायम होने का राज़ यही था कि कबाब के शौक़ीन किसी नवाब के सब दांत उसका साथ छोड़ गए थे, लेकिन उसका खाने का शौक नहीं छूटा. चुनांचे, खानसामा को ताकीद की गयी कि ऐसा कबाब बनाया जाए जो मुंह में डालते ही गल जाए. खानसामे ने गिलौटी कबाब ईजाद किया. रवि भट्ट लिखते हैं, ‘आसफुद्दौला ने तो अपने खानसामे, हसन रेज़ा खान उर्फ़ मिर्ज़ा हसनू, को ‘सरफ़राज़-उद्द-दौला’ की पदवी देकर अपना वज़ीर ही बना दिया था!’

शायरी और मुर्गियों की लड़ाई शौक़

दिल्ली के पतन ने शहर के हुनरमंदों को दूसरी रियासतों में जाकर बसने पर मजबूर कर दिया था. मिसाल के तौर पर मशहूर शायर मीर तक़ी मीर आसफुद्दौला के अनुरोध पर लखनऊ आये थे. मीर की मुलाकात आसफुद्दौला से मुर्गियों की लड़ाई के खेल के दौरान हुई थी. शायरी और शायरों को आसफ़ुद्दौला का खूब साथ मिला. आसफ़ ख़ुद भी एक अच्छा शायर था और उसका काल संगीत के सुनहरे दौर के लिए भी याद किया जाता है.

होली का शौक़ीन

लखनऊ के नवाब कौमी यकजहती (एकता) के लिए जाने जाते हैं. उनके काल में हिंदू मोहर्रम मानते थे और मुसलमान हिंदू त्योहारों से ख़ूब राज़ी थे. आसफ़ुद्दौला को होली खेलने का शौक था. मीर तक़ी मीर ने आसफ़ की शान में एक मस्नवी भी लिखी है जिसका मजमून है – ‘होली खेले आसफ़ुद्दौला वज़ीर’

कुल मिलाकर लखनऊ के नवाब बहादुरी के लिए तो नहीं, लेकिन अपनी तुनकमिज़ाजी और ऐयाशी के लिए जरूर जाने जाते हैं. नवाब आसफ़ुद्दौला भी इनमें से एक था. उसमें कुछ ऐब थे, तो कुछ ख़ूबियां भी थीं.

मन जी की कलम से
जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुद्दौला- ये आपने अनेक बार सुना पढ़ा होगा। नवाब आसफ़ुद्दौला की अनेक रंगारंग कहानियाँ है। अपनी माँ को लूटने वाला ये नवाब अव्वल दर्जे का लड़केबाज़ था। चूँकि कोई औलाद ना होती थी तो जो भी गर्भवती महिला मिलती उसे अपने हरम में रख लेता और उसकी औलाद को अपनी औलाद का दर्जा देता।
आसफ़ुद्दौला के दरबारी आबूतालिब ने लिखा है- अपने गोद लिए लड़के वज़ीर अली को आसफ़ुद्दौला ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उसके निकाह में अपार दौलत लुटाई। दरबारी ये भी लिखता है- बताओ कैसे दिन आ गए- एक ख़ानसामे की औलाद वज़ीर अली को सब सलाम पेश करेंगे। गौरतलब है वज़ीर अली का बाप पहले एक ख़ानसामा था।
कदाचित इसी कहानी को पढ़ पूप जी ने जेएनयू वाली प्रोफेसरगिरी छोड़ ख़ानसामा वाला पेशा अपनाया होगा।

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