Home विषयअपराध लव जिहाद- आफ़ताब ने की बेक़सूर श्रद्धा की निर्मम हत्या

लव जिहाद- आफ़ताब ने की बेक़सूर श्रद्धा की निर्मम हत्या

Nitin Tripathi

by Nitin Tripathi
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काल सेंटर में काम करने वाली एक श्रद्धा का उसके लिव इन पार्टनर आफ़ताब ने मर्डर कर दिया, शरीर को आरी से काट टुकड़े टुकड़े कर फ्रिज में रखा और रोज़ एक दो टुकड़े फेंक आता था.
यह पहली ऐसी घटना न थी. अंतर यह होता है कि कभी फ्रिज की जगह सूट केस होता है तो कभी कार की डिग्गी. बस नहीं बदलते तो वह है श्रद्धा और आफ़ताब के धर्म / मज़हब. सेट पैटर्न है.
मूल बिंदु पर आते हैं – समस्या पर. यदि आपने कभी अब्ज़र्व किया हो, 18-25 वर्ष की आयु में कार्य करने वाले अधिसंख्य एच लड़के ममाज बॉय होते हैं. या तो लाउड होंगे या कट्टर होंगे बग़ैर लॉजिक वाले या वल्गर होंगे या राउडी होंगे और साथ ही साथ बिलकुल क्लीयर भी होंगे कि मम्मी पापा इस राइट. वहीं दूसरी और अधिसंख्य एम लड़के बिलकुल जेंटल मैनली बिहेव करते मिलेंगे. पारिवारिक बंधन वह विक्टिम कार्ड बन कर बतायेंगे. ईमान, अमन, मज़हब, इश्क़ की बात करते शेरों शायरी सुनाते, स्माइल देते हुवे अपने मज़हब के पक्के पर लॉजिक के साथ. स्वयं को 18 वर्ष की लड़की समझ देखिए आपको कौन पसंद आएगा.
उनका ईको सिस्टम भी इस गंगा जमुनी इश्क़ मुहब्बत को फ़ुल सपोर्ट करता है. किसी धर्म वाली लड़की का मज़हब वाले लड़के से चक्कर चल जाये देखियेगा उनकी बिरादरी की हम उम्र लड़कियाँ इस H लड़की को बिलकुल रॉयल ट्रीटमेंट देंगी. यह लड़की अम्मी जान से मिलने चली जाये अम्मी जान बार बार हाथ चूमेंगे उसे नियामत बताएँगी. किसे नहीं अच्छा लगेगा ये सब. इसका उल्टा या फॉरगेट उल्टा यही समझ लीजिए कि H लड़की का H लड़के से चक्कर चल जाये अपनी एच सोसाइटी ही जीना मुश्किल कर देगी. लड़के की माँ पचास गालियाँ सुनाएँगी कुलक्षिणी कुलटा और क्या क्या.
दुर्भाग्य यह भी है कि जैसे जैसे हिन्दू पुरुष / महिला सो कॉल्ड राइट विंगर बनता है उसका प्रैक्टिकल नॉलेज शून्य होने लगता है. उसके दिमाग़ में इन समस्याओं का समाधान इतना मात्र होता है कि लड़की को बुर्का पहना कर रखो. कंट्रोल रखो आदि. संस्कार सिखाना लंबी प्रक्रिया है वह तो उसे ख़ुद क्लीयर नहीं, मुँह से ये सब बोलने में कुछ जाता नहीं. प्रैक्टिकल लाइफ में कोई हिन्दू परिवार इतनी कट्टरता नहीं दिखा पाता.
यह जो आयु होती है 16-25 वाली इसमें बॉडी नीड्स होती हैं – लड़कों की भी और लड़कियों की भी. एक समय इस आयु में विवाह हो जाता था समस्या न थी. अब शिक्षा / कैरियर आदि होता है तो विवाह आयु पचीस क्रॉस कर गई लेकिन शरीर और मस्तिष्क की ज़रूरतें नहीं बदलीं, वह तो ईश्वर प्रदत्त हैं.
कड़वे शब्दों में बोल रहा हूँ यदि लड़कियों को कम्पैनियन चाहिये तो H लड़कों की मर्दानगी केवल मुँह मुँह की बातें करने तक ही क्यों सीमित रह जाती है. दिखाओ अपनी असल मर्दानगी, लड़कियों को वू करो, अपने को ऐसा बनाओ कि लड़कियाँ तुम्हें पसंद करें, नीट क्लीन जेंटल मैन दिखो, लड़कियों को प्रोटेक्शन दो, दिखाओ कि एक मज़बूत सेंसिबल पार्टनर बन सकते हो, दिखाओ कि समाज का विरोध झेल कर भी लड़की को पत्नी रूप में स्वीकार करने का हौसला / हिम्मत रखते हो. असली मर्द बनो. जिम जाओ, डोले शोले बनाओ. वेल ग्रूम्ड दिखो. श्रद्धा आफ़ताब के पास नहीं सुरेश / रमेश के पास स्वयं ही आ जायेगी.
हमारे लड़के इतना मात्र कर ले जायें आधी समस्या हल हो जायेगी और बिलीव मी उनके लड़के यह सब बहुत आसानी से कर ले जाते हैं.

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