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वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांड भाग 25

सुमंत विद्वांस

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श्रीराम के वनवास का अप्रिय समाचार सुनकर महारानी कौसल्या सहसा भूमि पर गिर पड़ीं। श्रीराम ने हाथों से सहारा देकर उन्हें उठाया। अपने दुःख से कातर होकर माँ ने कहा, “बेटा रघुनन्दन! यदि तुम्हारा जन्म न हुआ होता, तो मुझे केवल इसी एक बात का शोक रहता। आज तुम्हारे वनवास की बात सुनकर जो भारी दुःख मुझे पर टूट पड़ा है, वह न होता।”
“एक ज्येष्ठ पत्नी को पति से जो सुख या सम्मान मिलना चाहिए, वह मुझे कभी नहीं मिला। बड़ी रानी होकर भी मुझे सदा हृदय को विदीर्ण कर देने वाले कटु वचन ही अपनी सौतों से सुनने पड़े। मैं सोचती थी की जो सुख पति के राज्य में नहीं मिला, वह सब सुख मैं पुत्र के राज्य में देख लूँगी। उसी आशा से मैं अब तक जीती रही।”
“पति की ओर से मुझे सदा तिरस्कार व फटकार ही मिली है; कभी प्रेम और सम्मान नहीं मिला। मुझे कैकेयी की दासियों के समान अथवा उनसे भी गई बीती समझा जाता है। जो कोई मेरी सेवा में रहता है, वह भी कैकेयी के बेटे को देखकर चुप हो जाता है और मुझसे बात नहीं करता। अब मैं क्रोधी स्वभाव वाली उस कैकेयी के कटु वचनों को कैसे सहूँगी? जब तुम्हारे होने पर भी मैं सौतों से तिरस्कृत रही हूँ, तो तुम्हारे वन चले जाने पर मेरी दशा क्या होगी?”
“रघुनन्दन! तुम्हारे उपनयन से अब तक सत्रह वर्ष बीत गए हैं। तब से मैं केवल इसी आशा पर जीवित थी कि तुम्हारे राज्याभिषेक के बाद मेरा दुःख दूर हो जाएगा। तुम्हारे सुख की आशा से मैंने आज तक जितने व्रत, उपवास, दान, ध्यान, पूजन आदि किये थे, वे सब आज व्यर्थ हो गए। निश्चय ही मेरा हृदय पाषाण का बना हुआ है कि तुम्हारे बिछोह की बात सुनकर भी अब तक मैं जीवित हूँ। मुझे कोई संदेह नहीं कि तुम्हारे वन जाते ही मैं भी तत्काल अपने प्राण त्याग कर यमराज की सभा में चली जाऊँगी।”
यह सब कहते-कहते माता कौसल्या भीषण विलाप करने लगीं।
उन्हें देखकर पास ही खड़े लक्ष्मण ने कहा, “बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम इस राज्यलक्ष्मी का परित्याग करके वन को जाएँ। महाराज तो इस समय स्त्री की बातों में आ गए हैं क्योंकि एक तो वे बूढ़े हैं और दूसरे कामासक्त हैं, तभी ऐसा अन्याय कर रहे हैं। अन्यथा कौन राजा होगा जो श्रीराम जैसे शुद्ध, सरल, जितेन्द्रिय पुत्र का अकारण परित्याग करेगा? श्रीराम ने तो ऐसा कोई अपराध नहीं किया है, जिससे इन्हें राज्य से निकाला जाए और वन में रहने को विवश किया जाए। फिर एक विवेकशून्य राजा की बात मानकर इन्हें क्यों वन को जाने दिया जाए?”
“रघुवीर! अभी कोई भी मनुष्य आपके वनवास की बात नहीं जानता है, अतः इसी क्षण आप मेरी सहायता से इस राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले लीजिए। मैं स्वयं धनुष लेकर आपकी रक्षा करूँगा। आप युद्ध के लिए डट जाएँ, तो कौन आपका सामना कर सकता है? यदि नगर के लोग आपके विरोध में खड़े होंगे, तो मैं अपने तीखे बाणों से सारी अयोध्या को मनुष्यों से सूनी कर दूँगा। जो भी भरत का पक्ष लेगा या केवल उसी का हित चाहेगा, उन सबका मैं वध कर डालूँगा क्योंकि विनम्र व्यक्ति का सभी तिरस्कार करते हैं।”
“पुरुषोत्तम! राजा किस न्याय से आपका राज्य छीनकर अब कैकेयी और भरत को देना चाहते हैं? कैकेयी में आसक्ति के कारण मेरे पिता ऐसा अविवेकी कृत्य कर रहे हैं और इस बुढ़ापे में निन्दित हो रहे हैं। यदि कैकेयी के उकसाने पर हमारे पिताजी ही हमारे शत्रु बन रहे हैं, तो हमें भी मोह-ममता छोड़कर उन्हें कैद कर लेना चाहिए अथवा मार डालना चाहिए क्योंकि यदि गुरु भी अहंकार के कारण कर्तव्य को भूल जाए व कुमार्ग पर चलने लगे, तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है।”
ये बातें सुनकर माता कौसल्या रोती हुई पुनः श्रीराम से बोलीं, “बेटा! तुमने अपने भाई लक्ष्मण की सभी बातें सुन ली हैं। अब यदि तुम्हें उचित लगे, तो यहाँ रहकर धर्म का पालन करते हुए मेरी सेवा करो। मेरी सौत की अधर्मयुक्त बातें मानकर अपनी शोक संतप्त माता को इस प्रकार छोड़कर वन में जाना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।”
“जिस प्रकार तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए पूज्य हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन जाने की आज्ञा नहीं दे रही हूँ, अतः तुम्हें नहीं जाना चाहिए। अब यदि तुम चले जाओगे, तो मैं भी उपवास करके अपने प्राण त्याग दूँगी और तुम भी उस कारण ब्रह्महत्या के समान नरक-तुल्य कष्ट पाओगे।”
माता कौसल्या को इस प्रकार दीन होकर विलाप करती हुई देखकर श्रीराम जी बोले, “माता! मैं तुम्हारे चरणों में सिर झुकाकर तुम्हें प्रणाम करता हूँ। पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन करने की शक्ति मुझमें नहीं है। अतः मैं वन को ही जाना चाहता हूँ।”
इसके बाद उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “भाई लक्ष्मण! मेरे प्रति तुम्हारा जो परम स्नेह है, उसे मैं जानता हूँ। तुम्हारे धैर्य, पराक्रम और तेज का भी मुझे ज्ञान है। सत्य व धर्म के प्रति मेरे अभिप्राय को न समझ पाने के कारण ही मेरी माता इतनी दुखी हो रही हैं। संसार में धर्म ही श्रेष्ठ है और धर्म में ही सत्य की भी प्रतिष्ठा है। अतः मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। तुम भी इस ओछी बुद्धि का त्याग करो, कठोरता छोड़ो, धर्म का पालन करो व मेरे विचार के अनुसार चलो।”
यह कहकर उन्होंने पुनः अपनी माँ के चरणों में मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर बोले, “माता! मैं यहाँ से वन को जाऊँगा। तुम मुझे आज्ञा दो और स्वस्तिवाचन करवाओ। तुम्हें मेरे प्राणों की शपथ है। पिताजी की आज्ञा का पालन करके मैं वनवास से चौदह वर्षों में लौट आऊँगा। अतः मुझे जाने की आज्ञा दो।”
उनकी बात न मानकर माता कौसल्या अभी भी विलाप करती रहीं और उनसे कहती रहीं कि मैं तुम्हें वन जाने की आज्ञा नहीं दूँगी।
माता का यह सतत विलाप सुनकर श्रीराम क्रोधित हो गए। आवेश में भरकर उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “लक्ष्मण! मेरे अभिप्राय की ओर ध्यान न देकर माँ के साथ ही तुम स्वयं मुझे भी पीड़ा दे रहे हो। इस प्रकार मुझे अत्यंत दुःख में न डालो। महाराज हम लोगों के गुरु, राजा और पिता हैं। वे क्रोध से, हर्ष से अथवा काम से प्रेरित होकर भी यदि किसी कार्य की आज्ञा दें, तो हमें वह अवश्य करना चाहिए।”
फिर वे आगे बोले, “लक्ष्मण! अपने मन से शोक व क्रोध को दूर करो। अपने चित्त से अपमान की भावना को निकाल दो। मेरे अभिषेक की यह सारी सामग्री अब दूर हटा दो, जिससे मेरे वनगमन में कोई बाधा न आए। जिस प्रकार राज्याभिषेक की सामग्री जुटाने में तुम्हारा उत्साह था, उसी उत्साह से अब मेरे वन जाने की तैयारी करो।”
“पिताजी सदा सत्यवादी रहे हैं। वे परलोक के भय से सदा डरते हैं। इसीलिए मुझे भी वही काम करना चाहिए, जिससा उनका यह भय दूर हो जाए। यदि मेरे अभिषेक का कार्य नहीं रोका गया, तो उन्हें मन ही मन सदा यह सोचकर दुःख होगा कि उनका वचन झूठा हो गया। उनका वह दुःख मुझे भी सदा दुखी करता रहेगा। इन्हीं सब कारणों से मैं अपने राज्याभिषेक का कार्य रोककर वल्कल और मृगचर्म धारण करके वन को चला जाऊँगा।”
“मेरे जाने से निर्भय होकर महारानी कैकेयी अपने पुत्र का राज्याभिषेक कराए और सुख से रहे। कैकेयी का यह विपरीत आचरण भाग्य का ही विधान है, अन्यथा वह मुझे वन में भेजकर पीड़ा देने की बात क्यों सोचती? उसी प्रकार पिता का दिया हुआ राज्य मेरे हाथ से निकल जाना भी भाग्य का ही लेख समझो। अतः राज्याभिषेक के इस आयोजन को तत्काल बंद कर दो। इसके लिए लाए गए मङ्गलमय कलशों के जल से ही तपस्या के व्रत के लिए मेरा स्नान होगा।”
ऐसी अनेक बातें कहकर श्रीराम ने माता कौसल्या व भाई लक्ष्मण को समझाने का बहुत प्रयत्न किया।
लेकिन लक्ष्मण फिर भी नहीं माने। उन्होंने कहा, “भैया! आप सोच रहे हैं कि पिताजी का आज्ञा का पालन करके मैं यदि वन को न जाऊँ, तो धर्म का उल्लंघन होगा। लोगों के मन में भी यह शंका उठ खड़ी होगी कि जो अपने पिता की ही अवज्ञा करता है, वह हमारा पालन धर्मपूर्वक कैसे करेगा? फिर आपको देखकर अन्य लोग भी अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं करेंगे। इन सब बातों के कारण ही आपके मन में वनगमन का यह भ्रामक विचार आ गया है। आप जैसे समर्थ क्षत्रिय पुरुष को भाग्य जैसी तुच्छ वस्तु को प्रबल बताना शोभा नहीं देता। आप उन लोगों की बात क्यों मान रहे हैं, जो अपना स्वार्थ साधने के लिए धर्म की आड़ ले रहे हैं? ऐसे पाखंड को धर्म समझना अत्यंत निन्दित है। केवल कायर पुरुष ही भाग्य के सहारे बैठता है। आप अपने पुरुषार्थ से भाग्य को बदलने में भी सक्षम हैं। अतः आज आपको पूरे संसार को दिखा देना चाहिए कि भाग्य बलवान है या पुरुषार्थ। जिन लोगों ने आपके वनवास का समर्थन किया है, वे एक बार आपके पराक्रम की शक्ति देख लेंगे, तो स्वयं ही भागकर चौदह वर्षों तक वन में जा छिपेंगे। श्रीराम! मैं आपका दास हूँ। जिस प्रकार भी यह राज्य आपके अधीन हो जाए, मुझे वह बताइये।”
लक्ष्मण की ऐसी बातें सुनकर श्रीराम ने उनके आँसू पोंछे व बार-बार उन्हें सांत्वना देने लगे।
माता कौसल्या ने जब देखा कि श्रीराम का निश्चय अटल है, तो वे आँखों में आँसू भरकर पुनः बोलीं, “हाय! जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा है, वह मेरा राम एक-एक दाने को बीनकर कैसे जीवन निर्वाह करेगा? जिसके सेवक भी स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वह वन में कंद-मूल खाकर कैसे रहेगा? बेटा! तुमसे बिछड़ जाने पर शोक की यह अग्नि मुझे भी भस्म कर देगी। अतः तुम जहाँ जाओगे, मैं भी वहीं चलूँगी।”
यह सुनकर श्रीराम बोले, “माता! रानी कैकेयी ने पिताजी के साथ धोखा किया है। एक तो मैं अब वन को जा रहा हूँ और ऐसी दशा में तुम भी महाराज का परित्याग कर दोगी तो वे निश्चय ही जीवित नहीं रह सकेंगे। अतः तुम्हें ऐसी बात भी अपने मन में नहीं लानी चाहिए। जब तक महाराज दशरथ जीवित हैं, तब तक तुम उनके साथ ही रहो।”
यह सुनकर रानी कौसल्या ने कहा, “ठीक है बेटा! मैं ऐसा ही करुँगी।” ऐसा कहकर माता कौसल्या पुनः रोने लगीं।
उन्हें इस प्रकार रोता देखकर श्रीराम भी रो पड़े और उन्हें सांत्वना देते हुए बोले, “माँ! मेरे चले जाने पर तुम महाराज का ध्यान रखना। कहीं ऐसा न हो कि पुत्र शोक उनके जीवन को ही समाप्त कर दे। भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं, वे निश्चय ही अपनी माता के समान ही तुम्हारी भी सेवा करेंगे।”
अंततः माता कौसल्या ने हार मान ली। वे बोलीं, “बेटा! मैं वन में जाने के तुम्हारे निश्चय को नहीं बदल सकती। तुम्हारा सदा कल्याण हो। जब तुम वनवास का यह महान व्रत पूर्ण करके कृतार्थ व सौभाग्यशाली होकर लौटोगे, तब मेरे समस्त क्लेश दूर हो जाएँगे और मैं सुख की नींद सो सकूँगी। अब तुम जाओ और चौदह वर्षों बाद कुशलपूर्वक वन से लौटकर अपने मधुर वचनों से मुझे पुनः आनंदित करना। अब मुझे उस क्षण की प्रतीक्षा है, जब मैं तुम्हें वन से लौटा हुआ देखूँगी।”
ऐसा कहकर देवी कौसल्या श्रीराम को मङ्गल आशीर्वाद देने लगीं व उनके लिए स्वस्तिवाचन कराने लगीं। शोक को दूर हटाकर उन्होंने पवित्र जल से आचमन किया। फिर वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं, “रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती। अतः तुम जाओ, सन्मार्ग पर चलो और शीघ्र ही वन से लौटो।”
“तुम जिस धर्म का पालन करते हो, वह तुम्हारी रक्षा करे। सभी देवता तुम्हारी रक्षा करें। महर्षि विश्वामित्र ने तुम्हें जो अस्त्र दिए हैं, वे सब तुम्हारी रक्षा करें। छहों ऋतुएँ सभी मास, संवत्सर, दिन-रात्रि, सभी मुहूर्त तुम्हारे लिए शुभ हों। तुम चिरंजीवी रहो। तुम्हारा कल्याण हो। भयंकर राक्षसों, पिशाचों व मांसभक्षी जीवों से कभी तुम्हें भय न हो। मेंढक, वानर, बिच्छू, सर्प, कीड़े, हाथी, सिंह, व्याघ्र, रीछ, भयंकर सींग वाले भैंसे कभी वन में तुम्हें कष्ट न दें। तुम्हारे सभी मार्ग मङ्गलकारी हों। शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर, यम, अग्नि, वायु, इन्द्र आदि सभी तुम्हारी रक्षा करें।”
यह कहकर माता ने पुष्पमाला, गन्ध आदि से देवताओं का पूजन किया। फिर घी, श्वेत पुष्प, माला, समिधा, सरसों आदि वस्तुएँ लाकर ब्राह्मण के समीप रखवा दीं। पुरोहितजी ने विधिपूर्वक हवन किया। इसके बाद माता ने ब्राह्मणों को शहद, दही, अक्षत और घी अर्पित करके उन सबसे स्वस्तिवाचन के मन्त्रों का पाठ करवाया। तत्पश्चात उन्हें इच्छानुसार दक्षिण दी।
इसके बाद माता कौसल्या ने अपने पुत्र श्रीराम के मस्तक पर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगाई और विशल्यकरणी नामक शुभ औषधि लेकर रक्षा के उद्देश्य से उसे श्रीराम के हाथों में बाँध दिया। अत्यधिक शोक के कारण मन्त्र बोलते समय उनकी वाणी बार-बार लड़खड़ा रही थी।
अंत में उन्होंने पुत्र को अपने हृदय से लगा लिया। भरे हुए गले से वे बोलीं, “वत्स राम! अब तुम अपनी इच्छानुसार वन को जाओ। जब चौदह वर्षों बाद तुम वन से लौटोगे, तब मेरे सारे दुःख मिट जाएँगे और राजमार्ग पर तुम्हें वन से लौटते हुए देखूँगी। वनवास की अवधि पूर्ण करके जब तुम राजसिंहासन पर बैठोगे, तब मैं पुनः प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें देखकर हर्षित होऊँगी।”
यह कहकर माता ने नेत्रों में आँसू भरकर श्रीराम की प्रदक्षिणा की और उन्हें गले से लगा लिया। तब महायशस्वी श्रीराम ने उनके चरणों को प्रणाम करके विदा ली और वे सीता के महल की ओर बढ़े।
आगे जारी रहेगा…

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