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नाक_में_उंगली

देवेन्द्र सिकरवार

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एक बार इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में मोदीजी का इंटरव्यू चल रहा था और डॉगी राजा मोदीजी पर दंगे न रोक पाने पर बार बार फिकरे कस रहे थे तो अंत में उन्होंने पूछ लिया कि उन्होंने कि दिग्गी राजा , जो उस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, ने तत्काल पुलिस बल सहायता भेजने का अनुरोध किया था तो उन्होंने मना क्यों कर दिया था?
डॉगी राजा बगलें झांकने लगे।
तब मोदीजी ने कहा था,” मैं भीतरी बातें नहीं खोलना चाहता हूँ लेकिन अगर नाक में उंगली डालोगे तो बोलना पड़ेगा।”
मैं यह नहीं कहता कि मैं इतिहास का सर्वज्ञ विद्वान हूँ बल्कि स्वयं को एक छात्र भर मानता हूँ लेकिन जब भी कोई बात लिखता हूँ तो कोशिश करता हूँ कि उसके पीछे ठोस प्रमाण हों।
अगर मैं महाराज ललितादित्य को सुनहरे बाल, भूरी आंखें और क्षीर श्वेत वर्ण में दिखा रहा हूँ तो उसके कारण हैं जिन्हें मैं बताना नहीं चाहता था लेकिन कुछ लोगों ने नाक में उंगली कर दी है तो सुनिये:-
1)मुस्लिम डोमिनेंसी से पहले भारत के नगरों में गौर वर्ण, नीली या भूरी आंखें सामान्यतः होती थीं और हिमाचल से लेकर यूरोप तक तो बहुतायत में थी।
2)ललितादित्य के पिता महाराज प्रतापादित्य एक तो स्वयं ही कश्मीरी थे अतः स्वाभाविकतः गौर वर्ण के थे लेकिन उनकी पत्नी नरेंद्रप्रभा …..
3)वस्तुतः इसमें एक लज्जाजनक घटना थी और वह यह कि एक विदेशी (यूरोपियन) व्यापारी अपनी पत्नी के साथ कश्मीर आई थी। प्रतापादित्य उस पर मोहित हो गए और व्यापारी (संभवतः) समझ गया कि बीवी तो जाएगी ही स्वयं भी निबटेगा अतः स्वयं अपनी इस पत्नी को प्रतापादित्य को समर्पित कर निकल लिया।
व्यापारी की यह पत्नी ही नरेंद्रप्रभा के नाम से राजा प्रतापादित्य की पत्नी बनी जिससे वज्रापीड, तारापीड और मुक्तापीड़ का जन्म हुआ था।
मुझे किसी महापुरुष के जन्म से नहीं बल्कि उसके किये महान कार्यों से मतलब है इसलिए मैंने इस चित्र के माध्यम से अपनी पुस्तक ‘अनसंग हीरोज:#इंदु_से_सिंधु_तक में उनके व्यक्तित्व का चित्रण ऐसा किया था।
अब समझ आया कि मैंने उन्हें ऐसा क्यों चित्रित किया?
अब मेरी नाक में उंगली मत करना क्योंकि आपका इतिहास संबंधी पाचनतंत्र इतना मजबूत नहीं है जो ऐसे तथ्यों को झेल जाए।
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