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सैद्धांतिक आधार पर पैदा हुआ जन्मनाजातिवाद

देवेन्द्र सिकरवार

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654 ई. से लेकर 900 ई. तक हिंदुओं की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उन्होंने संस्कृति आधारित राष्ट्रभाव को ऊपर रखा।
बौद्ध काल में रचे गए सूत्र ग्रथों व स्मृतियों के द्वारा सैद्धांतिक आधार पर पैदा हुआ जन्मनाजातिवाद 900ई. से 1947 तक धर्म व संस्कृति के साथ मिलकर जन्मनाजातिगतश्रेष्ठतावाद के घृणित रूप में दिखाई देने लगा यद्यपि मुस्लिमों के कारण धर्म की पहचान अभी भी जाति स्वार्थ के ऊपर हावी रही।
1947 के बाद कांग्रेस के माध्यम से सवर्णों विशेषतः ब्राह्मण व दलित वोट का गठबंधन कर सत्ता का कुछ परिवारों में केंद्रीकरण हुआ।
संख्यात्मक लोकतंत्र के कारण सवर्णों की सत्ता पर कब्जा बनाये रखने की चाहत ने आगरा से शुरू हुये जाति विशेष के सम्मेलन ने अन्य जातियों को रास्ता दिखा दिया।
कुकुरमुत्तों की तरह देखादेखी जातीय महासभाएं उग आईं और हर जाति इतिहास में अपनी जाति का महानायक ढूंढकर सत्ता की इस दौड़ में अपना हिस्सा ढूंढने लगा।
आज यह प्रवृत्ति एक बीमारी बन चुकी है।
इतिहास का जातीय पुनर्लेखन हो रहा है और इसके लिए वामपंथियों के साथ वे राइट विंगर इतिहासकार भी पूर्णरूपेण अपराधी हैं जिन्होंने इतिहास की युगप्रवृत्तियों व बिना इतिहासबोध के किये गए विश्लेषणों के आधार पर इतिहास लेखन किया।
आज हर हिंदू नामभर के लिए हिंदू है। वस्तुतः वह अपनी जाति का स्टेकहोल्डर है।
इसीलिये आज भले ही मुस्लिम भय के कारण हिंदुओं में एकता दिखाई देती है लेकिन मुस्लिमों से गृहयुद्ध के बाद जीतने पर भी तुरंत ही सत्ता के लिए हिंदुओं के बीच दूसरा गृहयुद्ध होगा।

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