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वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड भाग 54

सुमंत विद्वांस

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अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावली के साथ लंका की ओर गया और उसने रावण को सूचना दी कि खर-दूषण सहित जो बहुत सारे राक्षस जनस्थान में रहते थे, वे सब के सब युद्ध में मारे गए हैं और वह स्वयं किसी प्रकार अपनी जान बचाकर वहाँ तक पहुँचा है।
यह सुनते ही दशानन क्रोध से जल उठा। उसकी आँखें लाल हो गईं और उसने कुपित होकर हुंकार भरी, “मेरा अपराध करके इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी चैन से नहीं रह सकते। मैं काल का भी काल हूँ, मृत्यु को भी मार सकता हूँ और आग को भी जला सकता हूँ। वह कौन दुस्साहसी है, जिसने जनस्थान में मेरे राक्षसों को मार डाला?”
रावण को इस प्रकार क्रोधित देखकर अकम्पन की बोलती बंद हो गई। उसे लगा कि कहीं रावण क्रोध में उसके भी प्राण न ले ले। लेकिन अभयदान मिलने पर उसने आगे कहा, “राक्षसराज! राजा दशरथ का नवयुवक पुत्र राम पंचवटी में रहता है। उसका शरीर सिंह के समान बलशाली है, कंधे मोटे और भुजाएँ गोल व लंबी हैं। उसके शरीर का रंग साँवला है। उसका बल और पराक्रम अतुलनीय है। उसी ने खर दूषण आदि का वध किया है।”
तब रावण ने लंबी साँस खींचकर अकम्पन से पूछा, “अकम्पन! क्या राम समस्त देवताओं और इन्द्र आदि के साथ जनस्थान में आया है?”
इस पर अकम्पन ने कहा, “लंकेश्वर! उसके साथ न कोई देवता है और न कोई मुनि। उसके साथ उसका छोटा भाई लक्ष्मण है, जो उसी के समान वीर और बलवान है। यह राम पूरे संसार के समस्त धनुर्धरों में सर्वश्रेष्ठ और अत्यंत तेजस्वी है। वह सभी दिव्यास्त्रों का प्रयोग भी जानता है। उसके छोड़े हुए नुकीले बाण पाँच मुख वाले सर्प बनकर राक्षसों को खा जाते थे। भयभीत राक्षस युद्ध-भूमि में जिस ओर भी भागते थे, उन्हें हर ओर राम ही काल बनकर खड़ा दिखाई देता था। इस प्रकार उस अकेले राम ने ही आपके जनस्थान का विनाश किया है।”
यह सुनकर रावण बोला, “राम और उसके भाई लक्ष्मण का वध करने के लिए मैं अभी जनस्थान को जाऊँगा।”
तब अकम्पन ने उसे समझाते हुए कहा, “राजन! राम का बल और पराक्रम समस्त लोकों में सर्वश्रेष्ठ है। उसके पराक्रम को कोई नहीं रोक सकता और आप अथवा समस्त राक्षसगण मिलकर भी युद्ध में उसे नहीं जीत सकते। लेकिन मुझे उसके वध का एक उपाय सूझा है, आप वह सुनिये।”
“राम की पत्नी सीता इस संसार की सर्वोत्तम सुंदरी है। देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा, नागकन्या या मनुष्य-जाति की कोई भी स्त्री सौंदर्य में उसकी बराबरी नहीं कर सकती। उस विशाल वन में किसी भी प्रकार धोखे से आप उसका अपहरण कर लीजिए। सीता से बिछड़ जाने पर राम कदापि जीवित नहीं रह पाएगा।”
रावण को अकम्पन की यह बात पसंद आई। उसने कहा, “मैं कल प्रातःकाल सारथी के साथ अकेला ही जाऊँगा और सीता को प्रसन्नतापूर्वक इस लंकापुरी में ले आऊँगा।”
ऐसा कहकर रावण गधों से जुते हुए अपने रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ से कुछ ही दूरी पर स्थित एक आश्रम की ओर चला गया और वहाँ जाकर वह ताटका राक्षसी के पुत्र मारीच से मिला।
उसका स्वागत करके मारीच ने उसके आगमन का कारण पूछा।
तब रावण ने उसे बताया, “तात! महापराक्रमी राम ने मेरे राज्य की सीमा के रक्षक खर-दूषण के प्राण ले लिए हैं और जनस्थान के मेरे सारे राक्षसों को भी युद्ध में मार गिराया है। इसका बदला लेने के लिए मैं उसकी स्त्री का अपहरण करना चाहता हूँ। अतः इस कार्य में तुम मेरी सहायता करो।”
तब मारीच उसे समझाते हुए बोला, “निशाचरशिरोमणि! मित्र के रूप में तुम्हारा कौन शत्रु है, जिसने तुम्हें सीता को हर लेने की सलाह दी है? मुझे उसका नाम बताओ। वह कौन है, जो समस्त राक्षस-जाति का विनाश करना चाहता है?”
“जो भी इस कार्य के लिए तुम्हें उकसा रहा है, वह निश्चित ही तुम्हारा शत्रु है, इसमें कोई संशय न रखो। राम से युद्ध करना तो दूर, युद्धस्थल में उसकी ओर देखना भी तुम्हारे लिए उचित नहीं है। इसलिए तुम ऐसी गलती मत करो। सकुशल लंका में रहो और अपनी स्त्रियों के साथ आनंद करो।”
मारीच की यह बात मानकर रावण लंका में अपने महल में लौट गया।
उधर पंचवटी में जब शूर्पणखा ने देखा कि श्रीराम ने उन चौदह हजार राक्षसों के साथ-साथ खर, दूषण और त्रिशिरा को भी युद्ध में मार डाला है, तो वह बड़े शोक के साथ चीत्कार करने लगी। श्रीराम ने असंभव लगने वाला कार्य कर दिखाया था। अत्यंत शोक से उद्विग्न शूर्पणखा भी तब वहाँ से निकलकर लंका की ओर भागी।
लंका में पहुँचकर उसने देखा कि रावण सूर्य के समान जगमगाते एक सोने के सिंहासन पर विराजमान है। उसके सभी मंत्री उसके आस-पास बैठे हुए थे।
रावण की बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे। उसका सीना विशाल था। वह अपने शरीर पर वैदूर्यमणि (नीलम) का एक आभूषण पहना हुआ था और उसके शरीर की कान्ति भी वैसी ही थी। उसने दिव्य वस्त्र, सोने के आभूषण और दिव्य पुष्पों की मालाएँ पहन रखी थीं।
उसकी भुजाएँ सुन्दर, दाँत सफेद, मुँह बहुत बड़ा और शरीर पर्वत जैसा विशाल था। देवताओं के साथ युद्ध करते समय उसके शरीर पर सैकड़ों बार भगवान विष्णु के चक्र का प्रहार लगा था। कई अन्य बड़े युद्धों में भी उसे कई शस्त्रों से चोट लगी थी। उन सबके चिह्न उसके शरीर पर दिखाई दे रहे थे।
रावण सभी कार्य बड़ी शीघ्रता से करता था। वह देवताओं को रौंद डालता था, परायी स्त्रियों का शील नष्ट कर देता था और धर्म की तो वह जड़ें ही काट देता था। वह हर प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग जानता था, सदा यज्ञों में विघ्न डालता था और ब्राह्मणों की हत्या कर देता था। वह बड़े रूखे स्वभाव का था और बहुत निर्दयी था। वह सज्जनों का सदा अहित ही करता था।
एक बार वह पाताल लोक में जाकर नागराज वासुकी को परास्त करके और तक्षक को भी हराकर उसकी प्रिय पत्नी का अपहरण करके ले आया था। इसी प्रकार कैलास पर्वत पर कुबेर को परास्त करके वह उसका भी पुष्पक विमान छीन लाया था। कुबेर के चैत्ररथ वन को, इन्द्र के नन्दनवन को और अन्य देवताओं के दिव्य उद्यानों को भी वह नष्ट करता रहता था।
उसने घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को अपने मस्तकों की बलि दी थी। उस तपस्या के प्रभाव से उसे देवता, दानव, गंधर्व, पिशाच, पक्षी और सर्पों से भी संग्राम में सुरक्षा का वरदान मिल गया था। मनुष्यों के सिवा किसी के हाथों मृत्यु का उसे भय नहीं था।
निर्भय होकर जनस्थान में विचरने वाली शूर्पणखा युद्ध में खर-दूषण आदि के संहार को देखकर भयभीत होती हुई लंका में पहुँची और मंत्रियों से घिरे अपने उस भाई के पास जाकर उसने शोक से विह्वल होकर अपनी दुर्दशा रावण को सुनाना आरंभ किया।
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। अरण्यकाण्ड। गीताप्रेस)
आगे जारी रहेगा……

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