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सिद्धार्थ ही गृह त्यागकर सन्यासी बुद्ध क्यों बनते हैं.

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सिद्धार्थ ही गृह त्यागकर सन्यासी बुद्ध क्यों बनते हैं..?
राम गृह त्यागने के बाद , वन जाने के बाद भी सन्यासी बुद्ध क्यों नहीं बनते ।
भरण पोषण करने वाले राजऋषि क्यों बने ..?
ध्यान रहे बुद्ध एक अवस्था है व्यक्ति नहीं..!
एक ऋषि ने भविष्यवाणी क्या कर दी महाराज शुद्धोधन से कि चाहे कितने भी प्रयत्न क्यों न कर ले राजन..!
तेरा पुत्र सन्यासी ही बनेगा .!!!!
राजा ने मन में ठान लिया कि देखता हूँ कैसे बनेगा ..? सन्यासी बनने के लिए संसार की पीड़ा से जुड़ना होता है और मैं सिद्धार्थ को संसार के किसी भी दुख को देखने ही नहीं दूंगा।
राज्याधिकारियों को आदेश दिया जाता है कि सिद्धार्थ की अधिकतम शिक्षा राजमहल में ही होगी और राज्य के गरीब , दुःखी, पीड़ितों, बुजुर्गों, सन्यासियों को एक अन्य स्थान पर रहने का आदेश दिया जाय, कहीं से भी सिद्धार्थ को ये लोग न दिखें।
महाराज शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को चारों तरफ से रास रंग सुख में बांधने के लिये राजमहल को इंद्रपुरी जैसा बना दिया
पर कहतें हैं न कि भूखें को ही भोजन करने का आनंद मिलता है जिसका पेट भरा है वह भोजन करने का आनंद क्या ले पायेगा ..!!!
जो नर्तकियां सिद्धार्थ को सुंदर लगती थी वो अब कुरूप लगने लगी थी, जो रास रंग सिद्धार्थ को बांधने का कार्य कर रहा था वही अब सिद्धार्थ के गले की जंजीर बन रहा था ।
अत्यधिक सुख ने सिद्धार्थ के अंदर नीरसता का बीज बोना शुरू कर दिया अब तो सिद्धार्थ का अंतर्मन वो मांगने लगा जिसका स्वाद भी अभी सिद्धार्थ ने नहीं चखा था।
चन्ना माध्यम बना तो सिद्धार्थ को पता चल गया कि असली भोजन तो यहां है जिसको अभी तक मैं चख नहीं पाया,
बस क्या था भूखें ने रात के अंधेरे में राज्य को छोड़ दिया और जिसकी तलाश में गया उस भोजन को पाने के उपरांत भी नहीं लौटा…आखिर लौटे ही क्यों..!!!
संसार के दो ही भोजन हैं: एक जो आत्मज्ञान से दूर करता है सांसारिक भोग का अतिवाद और दूसरा जो आत्म ज्ञान के नजदीक ले जाता है आत्मिक योग …
सिद्धार्थ के अंदर दोनों की ही भूंख शांत हो गयी,
अब बचा ही क्या ..!!
सिद्धार्थ इसीलिए सन्यासी बुद्ध की ही अवस्था में रह गए।
सिद्धार्थ की तरह राम का भी जन्म बहुत दिनों बाद हुआ, माता पिता से पूरा प्यार मिला लेकिन माँ की ममता ने अभी अपने पुत्र को ठीक से दुलारा भी नहीं था कि गुरुदेव आये और अधिकार पूर्वक दशरथ के बच्चों का मुंडन यज्ञोपवीत संस्कार कराकर गुरुकुल उठाकर लेकर चले गए..!
उफ्फ महलों का राजकुमार अब गुरुदेव के आश्रम में भूमि पर सोता है, भोजन के लिए लकड़ियां खुद जंगल से इकठ्ठा करके लाता है , भोजन के लिए साधारण ग्रामीणों से भिक्षा मांगता है..!!
बिना गुरु के पांव दबाए तब तक नहीं सोता है जब तक कि गुरुदेव आज्ञा नहीं देते कि राम बड़ी रात हो गयी है अब सो जाओ ।
उधर दशरथ और रानियां अपने पुत्रों के लिए तड़प रहें हैं कि पुत्रों को सुख नहीं दे पा रहें हैं.., हाँ सिद्धार्थ के पिता भी तड़प रहें है पर इसलिए कि वो सिद्धार्थ को इतना सुख तो दे रहें हैं पर क्या ये सुख सिद्धार्थ को इस संसार में बांध पाएंगे……?
सिद्धार्थ पर सबका अधिकार नहीं है पर राम पर जो भी आता है अधिकार जताकर ले कर चल देता है । बताईये इतने दिनों बाद वशिष्ठ जी के गुरुकुल से शिक्षा पूरी हुई नहीं कि विश्वामित्र जी धमक पड़े और राजा दशरथ से अधिकार पूर्वक बोले: लाओ दो अपने राम को, मुझे यज्ञ की रक्षा करवानी है।
पिता पुत्र मोह से पीड़ित हो चुका है , ऋषि के पैर पकड़ लेता है और कहता है कि कहाँ वो नन्हें बालक और कहाँ वो दुर्दांत राक्षस..!!
मुझपर दया करिये ऋषिवर , आप मुझे ले चलिए मैं आपके यज्ञ की रक्षा करूंगा मगर ऋषि का क्रोध बढ़ गया और फटकारते हुए बोले : कदाचित तुम्हारा मन ऋषि सेवा से भर गया है राजन..!!
राम ने माँ के हाथ से मालपुआ का टुकड़ा अभी मुंह में ग्रहण किया ही था कि बुलावा आ गया कि चलो ऋषि विश्वामित्र की सेवा में जाना है । राम एक जिम्मेदारी से मुक्त होते नहीं कि दूसरी पहुँच जाती थी…
जैसे ही राजमहल का सुख भोगने का समय आता है वैसे ही कोई न कोई वन जाने का निमित्त बन ही जाता है।
विवाह के उपरांत फिर वनों की लताओं ने पुकारा तो लताओं ने कैकेयी को माध्यम बनाकर राम को अपने पास बुला लिया।
सिद्धार्थ ने कभी वन नही देखा और न ही सन्यासी देखे पर राम की तो दिनचर्या ही बन गयी थी । राम ने बाल्यकाल से ही दुखी मनुष्य, सुखी मनुष्य, अहंकारी, तपस्वी सबको देखा, राम का जीवन बाल्यकाल से ही संघर्षों में बीता, उन्होंने सिद्धार्थ की तरह न सुख की पराकाष्ठा को देखा और न ही अंतर्मन में दुःख की पराकाष्ठा को जाना..!!! आदत सी हो गयी थी उथल पुथल संघर्षों से भरे जीवन जीने की..
शुद्धोधन अपने पुत्र को सांसारिक सुखों में बांधने की चेष्टा करते समय ही खो दिए थे , उन्होंने सिद्धार्थ को असाधारण व्यक्तित्व मान लिया पर दशरथ का तो अपने पुत्र पर एकाधिकार ही नहीं था तो बांधते कैसे..? राम असाधारण हैं यह ऋषिगण दशरथ को संकेत में बताते हैं पर दशरथ राम को अपने पुत्र से अधिक कुछ नहीं मानते ।
दशरथ पुत्र को आज्ञा दे रहें हैं कि मेरे खिलाफ विद्रोह करके राज्य को अपने अधीन कर लो पर राम तो सन्यासी बन चुके हैं ऋषियों की संगत में पहले से ही अतः राज्य उनके लिए दायित्व से अधिक कोई और उपलब्धि नहीं है। पिता को समझा बुझाकर शांत कर देते हैं।
यही कारण है राम जब वन गए तो लौटकर आये पर बुद्ध जब वन गए तो लौटकर नहीं आये क्योंकि राम की तपस्या स्थली राजनीति और वन दोनों ही बन गए पर सिद्धार्थ बुद्ध बनकर वन के ही रह गए।
जिसे केवल वन मिला वह समाज को सन्यासी के रूप में मिला औऱ जिसे वन , प्रजा दोनों मिले वह समाज को राजऋषि के रूप में मिला।
आप चाहें तो इसे भाग्य और नियति के रूप में देख सकते हैं पर यथार्थवादी अगर चाहें तो इसे मनोवैज्ञानिक ढंग से भी देख सकते हैं।

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