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सरदार पटेल और अशराफ सांप्रदायिकता व देशज पसमांदा समाज

Faiyaz Ahmad Fyzie

by Faiyaz Ahmad
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यह सर्व विदित है कि देशज पसमांदा समाज भारत का सबसे उपेक्षित और वंचित समाज है. पसमांदा समाज, अशराफ की मुस्लिम साम्प्रदायिकता और नस्लीय एवं जातीय उत्पीड़न को सहता चला आ रहा है. जब भी मुस्लिम समाज, मुस्लिम (अशराफ) सांप्रदायिकता, पाकिस्तान निर्माण, लीग का चरित्र और भारत में रह गए मुसलमानों से नव भारत के संबंधों की चर्चा होती है, तो सरदार पटेल की नकारात्मक छवि ही सेकुलर लिबरल बुद्धजीवियों द्वारा प्रस्तुत की जाती रही है, जबकि इसके विपरीत सरदार पटेल का व्यक्तित्व, सकारात्मक सोच, कर्म और सद्भाव वाला था.

सरदार पटेल त्वरित, कड़े, बुद्धिमत्तापूर्ण और न्याय प्रिय फैसले लेने में अभ्यस्त थे. यह उनके कार्य शैली की एक विलक्षण विशेषता थी, जो बिना अशिष्ट हुए अपने फैसलों पर दृढ़ और अडिग रहा करते थे. मुस्लिम (अशराफ) संप्रदायिकता ही भारत की संप्रदायिकता का मूल कारण रहा है. जब हम इतिहास में झांकते हैं, तो यह पाते हैं कि हिन्दू सांप्रदायिकता, अशराफ द्वारा जनित मुस्लिम सम्प्रदायिकता के प्रतिक्रियास्वरुप ही अस्तित्व में आया.

किसी भी प्रकार की संप्रदायिकता से निपटने में सरदार पटेल किसी भी पक्ष पर नरमी नहीं बरतते थे. यह बात ऐसी अनेक घटनाओं से साबित होती है, जिनमें पटेल ने हिन्दू और सिख अपराधियों को नहीं बख्शा और उनसे मुसलमानों की रक्षा किया. उनके द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध भी इसी कार्यशैली का एक उदाहरण है. इसके विपरीत सरदार पटेल मुस्लिम लीग से सीधा मुकाबला चाहते थे. मुस्लिम संप्रदायिकता से भलीभांति परिचित थे और उससे ढंग से निपटना भी जानते थे और निपटा भी.

विडंबना है कि सरदार पटेल को मुस्लिम विरोधी साबित करने के लिए अशराफ वर्ग, तथाकथित सेक्युलर लिबरल लोगो ने युद्ध स्तर पर उनके खिलाफ नैरेटिव चलाया. मौलाना आजाद ने उन्हें खुले रुप से सांप्रदायिक कहा था. सरदार पटेल द्वारा संप्रदायिकता से निपटने के लिए देश हित में उठाए गए कदमों को मौलाना हिंदू समर्थक कहते थे. यह सर्वविदित है कि मौलाना आजाद कांग्रेस में अशराफ वर्ग के हितों के सबसे बड़े पैरोकार थे.

जबकि सच्चाई यह है कि सरदार पटेल किसी भी धर्म, संप्रदाय के प्रति पक्षपात की भावना, संकीर्णता और दुराग्रह नहीं रखते थे. महात्मा गांधी ने तो यहां तक कहा है कि सरदार को मुसलमान विरोधी कहना सच्चाई का उपहास उड़ाना है. सरदार पटेल अशराफ नेताओं मौलाना आजाद, मौलाना हिफजुर रहमान, डॉ सैयद महमूद, मियां इफ्तिखारउद्दीन चौधरी, खलीकुज्जमां, कासिम रिजवी, जोश मलीहाबादी आदि के क्रियाकलापों, उनके ढुलमुल रवैया, मुस्लिम सांप्रदायिकता और मुस्लिम लीग के प्रति नरम रुख, दोहरी बातें और धोखा देने की प्रवृत्ति को अच्छी तरह जान और समझ चुके थे. आजादी के बाद सत्ता हस्तांतरण के समय अशराफ नवाबों के व्यवहार ने भी अशराफों की निष्ठा के बारे में सरदार के मन में संदेह बढ़ाने का ही कार्य किया.

अशराफ नेताओं में विशेष रूप से डॉ सैयद महमूद (कांग्रेसी) और मौलाना हिफ्जुर रहमान (जमात ए उलेमा ए हिंद) को लगभग डांटते और लताड़ते हुए पटेल ने कहा था, ‘‘मैं आप लोगों को स्पष्ट कह देना चाहता हूं कि इस नाजुक घड़ी में भारतीय संघ के प्रति निष्ठा की घोषणा मात्र ही पर्याप्त नहीं है. आपको इन घोषणाओं को प्रमाणित करना होगा. मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जब पाकिस्तान ने सीमांत कबायलियों की मदद से भारतीय क्षेत्र पर हमला किया, तो आप लोगों ने इसकी खुली निंदा क्यों नहीं की? क्या भारत के विरुद्ध हुए हर हमले की भर्त्सना करना आपका कर्तव्य नहीं है? सरदार साहब ने बड़े कड़े शब्दों में उन्हें पृथकतावादी मानसिकता छोड़कर हिंदुओं तथा अन्य के साथ एक ही नाव में रहना एवं साथ साथ डूबना या तैरना सीखने का आह्वान किया. उन्होंने कहा था ‘‘मैं आप लोगों से स्पष्ट कहना चाहता हूं कि आप दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकते, जो आपको पसंद हो, वह घोड़ा आप चुन लें.’’

यहां यह बात सर्वविदित है कि अशराफ का चरित्र सदैव दोहरे रवैये वाला रहा है. जहां तक उनके पसमांदा मुसलमान से संबंध की बात है, तो सरदार पटेल को बकरोल के नौकर मुसलमान, कर्मसाद का किराएदार मुसलमान, साबरमती आश्रम का मुसलमान, गांव के मुसलमान, पिछड़े मुसलमान में भिन्न प्रवृत्ति, विचार, व्यवहार और आचरण मिला.

सरदार पटेल इस बात को जान, समझ, परख चुके थे कि भारत में रहने वाले मुसलमानों में विभेद स्पष्ट है. वह देसी भारतीय मुसलमान और उच्च वर्गीय स्वघोषित विदेशी अशराफ मुसलमान के चाल, चरित्र, आचरण, विचार और प्रवृत्ति के आधार पर उन्हें एक दूसरे से बहुत भिन्न पाते थे. धर्मांतरित देशज पसमांदा मुसलमानों के लिए कहीं वह साधारण मुसलमान, सामान्य मुसलमान, निष्ठावान मुसलमान, गांव के मुसलमान, खेतीहर मुसलमान के शब्द प्रयोग में लाते थे.

अतः यह स्पष्ट है कि वह अशराफ और पसमांदा के विभेद से भलीभांति परिचित थे. वह उनके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक भिन्नता से स्पष्ट रूप से अवगत भी थे. देशज मुसलमानों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, ‘‘जहां तक सामान्य मुसलमानों का प्रश्न है, उनकी जड़ें उनके पवित्र स्थान और उनके केंद्र यहीं हैं.’’

वो खेतीहर हिन्दू और खेतीहर मुसलमानों में भेद नहीं करते थे. उनकी मेहनत और पीड़ाओं को एक समझते थे और कहा करते थे कि प्रकृति धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करती है. इस बात को आधार बनाकर उन्होंने अपने धर्म बंधुओं से अपील की थी कि वह मुसलमानों पर अविश्वास करना छोड़ दें. उन्होंने कहा था ‘‘अगर आप समझते हैं कि उनके मुसलमान होने के कारण आप निष्ठावान मुसलमानों को लगातार परेशान करते रहेंगे, तो हमारी स्वतंत्रता सार्थक नहीं है.’’

सरदार पटेल को देशज पसमांदा मानस की समझ थी और वह इस बात से बेहद परेशान रहा करते थे कि द्विराष्ट्र सिद्धांत और पाकिस्तान निर्माण पर सामान्य मुसलमान जानबूझकर क्यों धोखा खा रहे हैं और एक ऐसे नेता की अंधभक्ति क्यों कर रहे हैं, जो उन्हें गलत रास्ते पर ले जा रहा था.

मुस्लिम लीग की बढ़ती लोकप्रियता का मुकाबला करने के लिए पटेल ने कांग्रेस को सुझाव दिया था कि मुस्लिम लीग के संभ्रांत मुसलमानों (अशराफ) नेताओं के बजाय कांग्रेस को सामान्य मुसलमानों (पसमांदा) से बात करनी चाहिए.

जब चारों तरफ सांप्रदायिकता की आग लगी थी, तो सरदार पटेल महान ने पसमांदा रक्षक के रूप में प्रकट होकर हिन्दू समाज से आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘मैं हिन्दुओं से अपील करना चाहता हूं कि वह बीती को बिसार दें, जो हुआ, वह सब शहरों में रहने वाले मुट्ठी भर लोगों की शरारत थी. गांव के लाखों मुसलमान इस बारे में कुछ जानते तक नहीं. उन्होंने कभी पाकिस्तान के बारे में नहीं सोचा. उन्होंने ऐसा क्या अपराध किया है कि उनके साथ भिन्न व्यवहार किया जाए.’’

यहां यह तथ्य गौरतलब है कि गांवों के रहने वाले मुसलमानों से उनका तात्पर्य देशज पसमांदा से था.

सरदार पटेल अपनी सोच, विचार, आचरण, व्यवहार से पूर्णरूपेण पसमांदा हितैषी थे. यह बात तब और स्पष्ट रूप से परिलक्षित होकर देश के सामने आती है. जब कांग्रेस की अशराफ लॉबी के सर्वोच्च नेता मौलाना आजाद के प्रबल विरोध के बावजूद उन्होंने बिहार राज्य में प्रथम पसमांदा आंदोलन के गैर कांग्रेसी नूर मोहम्मद और अब्दुल कयूम अंसारी, जिन्होंने चुनाव में मुस्लिम लीग को हराया था, को बिना कांग्रेस पार्टी की सदस्यता दिलवाए, उन्हें मंत्रिमंडल में जगह दिलवाई. यह अपने आप में यह एक विडंबना ही है कि पिछड़े मुस्लिम प्रतिनिधित्व को मौलाना आजाद नकार रहे थे, जबकि पटेल दृढ़ता और न्यायप्रियता के साथ उन्हें अधिकार दिलवा रहे थे. इस प्रकरण में देशज पसमांदा मुसलमानों के प्रति अशरफ मुसलमानों की विकृत मानसिकता और हिंदू समाज की सद्भावना स्पष्ट रूप से प्रकट होती है.

भारत के इतिहास में यह दूसरा अवसर था, जब राजा जउना (मोहम्मद बिन तुगलक) के बाद किसी ने धर्मांतरित देशज पसमांदा को हक अधिकार और सरकार में जगह देने का प्रयास किया गया. सरकार को चाहिए कि सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा के प्रांगण में उनके द्वारा देशज पसमांदा समाज के लिए किए गए इस कार्य को शिलालेख पर लिखवाकर स्थापित कराया जाए, ताकि रहती दुनिया तक यह सनद रहे कि जिसने भारत की कुल मुस्लिम आबादी के लगभग 90 फीसद भाग वाले मुसलमानों के राजनैतिक भागेदारी को सुनिश्चित किया, वो मुस्लिम विरोधी कैसे हो सकता है.

आजादी के तुरंत बाद सरदार पटेल की मृत्यु से पसमांदा समाज का एक शुभचिंतक उनका हितैषी उनसे बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में जुदा हो गया, जिसका खामियाजा पसमांदा समाज आज तक भुगत रहा है. आज भी अगर सरकार को संप्रदायिकता से भली-भांति निपटना है, तो उसे इस मामले में सरदार पटेल के दिशा निर्देशों एवं उनके मॉडल का अनुसरण करना चाहिए.

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