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मोदी_के_बाद_के_लिये_षड्यंत्र

देवेन्द्र सिकरवार

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ठाकरे को हिंदू ह्रदय सम्राट की पदवी दी जा रही थी।
लोगों ने लिखने के लिए कहा पर मैं सदैव चुप रहा।
सुब्रह्मण्यम स्वामी को महान हिंदू हित रक्षक बताया गया,
लोगों ने उनका समर्थन करने को कहा मैं चुप रहा।
आसाराम की गिरफ्तारी पर उनके समर्थन में न लिखने पर कोसा गया।
मैं कुछ नहीं बोला।
सोनू सूद को हीरो बनाया गया।
मैंने मौन धारण कर लिया।
यति नरसिंहानंद ने आग उगली और मुझे उनका समर्थन करने का दवाब डाला गया।
मैं फिर भी चुप रहा।
क्यों?
क्योंकि मैं साफ-साफ हिंदू हितों की ओट में इनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को देख पा रहा था। पर मैं निश्चिंत था क्योंकि इनमें से किसी में भी इतना सामर्थ्य नहीं था कि हिंदू ह्रदय में बसे मोदी की सत्ता को चुनौती दे पाते।
लेकिन अब खतरा बढ़ रहा है।
मोदीजी जिस तरह वीतराग और निष्काम होते जा रहे हैं वह उनके अध्यात्म के बढ़ते स्तर को प्रदर्शित कर रहा है। उनकी माँ की मृत्यु ने लगता है उनके सांसारिक संबंधों की अंतिम डोर को भी तोड़ दिया है।
बहुत संभव है कि अगला चुनाव हमें योगीजी के नेतृत्व में लड़ना पड़े तो उसी की तैयारी है।
विगत चुनाव में हम सभी ने देखा है कि उत्तरप्रदेश पूरे उत्तरी भारत ही नहीं बल्कि पूरे भारत की सत्ता की कुंजी है और वहां चार वोट बैंक निर्णायक हैं–
1)मुस्लिम- सदैव भाजपा विरोधी। जो भी भाजपा को हराता दिखेगा, उसे ये वोट करेंगे।
2)यादव- 90% वोट सपा के हैं और रहेंगे फिलहाल जबतक कि भाजपा में कोई प्रभावी यादव नेता नहीं उभरता।
3)दलित विशेषतः जाटव- मायावती का नियंत्रण लेकिन चंद्रशेखर रावण बहुत तेजी से सैंध लगा रहा है।
4)ब्राह्मण- वर्तमान में भयंकर असंतुष्ट होने के बावजूद 80% वोट भाजपा को।
अब भाजपा के पास कुर्मी, कोइरी, ठाकुर, भूमिहार आदि का टूटा फूटा स्थानीय उम्मीदवार के आधार पर जातीय आधार वाला वोटबैंक है जो पूर्वांचल में ब्राह्मण वोटों, बुंदेलखंड में दलित वोटों पर निर्भर है।
इसीलिये अगर ब्राह्मण वोटों को तोड़ लिया जाए तो भाजपा का सिंहासन भरभरा कर गिर जाएगा।
लेकिन समस्या यह है कि ब्राह्मणों को लामबंद करने वाला कोई नेतृत्व नहीं है तो शुरू में स्वरूपानंद व उनके शिष्य को आगे किया गया पर उनकी घोषित प्रोकाँग्रेस नीति के कारण बात नहीं बनी। फिर निश्चलानन्द को लाया गया पर उनकी भी मास अपील नहीं बन सकी।
इसके बाद सहसा दो नाम धूमकेतु की तरह उभरे– मनोज मुन्तशिर और धीरेंद्र शास्त्री।
मनोज मुन्तशिर की अपील भले सीमित हो लेकिन धीरेंद्र शास्त्री की अपील बढ़ती जा रही है जिसमें मुख्य कारण उनके सो कॉल्ड चमत्कार हैं जिसमें हाल ही का धर्मांतरण का ड्रामा भी है।
कोई ऊपर से कितना भी कहे लेकिन सभी जानते हैं कि योगी बाबा से ब्राह्मणों में असंतोष तो है विशेषतः पूर्वांचल में और विकास दुबे प्रकरण व पिछले विधानसभा चुनावों में इसकी हल्की आंच साफ साफ महसूस की गई।
ऐसे में मोदी के रिटायरमेंट के बाद जब भाजपा में नेतृत्व के लिए जब उथलपुथल मचेगी तब उसके बाद चुनावों के लिए यह सब तैयारियां हैं।
राहुल गांधी मूर्ख हो सकता है, लेकिन उसके चारों ओर जमी धूर्तमंडली नहीं।
आपको क्या लगता है, राहुल गांधी का दाढ़ी बढाकर स्वयं जी बुजुर्ग दिखाना, अटल जी की समाधि पर जाना, टीशर्ट में घूमना यों ही है।
यह वस्तुतः मोदीजी के लिए नहीं बल्कि उनके उत्तराधिकारी, संभवतः योगीजी के विरुद्ध संघर्ष की तैयारी की भूमिका है क्योंकि राहुल के धूर्त सलाहकार मान चुके हैं कि मोदी के रहते सत्ता में वापसी असंभव है।
उत्तरप्रदेश में रालोद के जरिये जाट वोटों, अखिलेश के जरिये यादव वोटों और चंद्रशेखर रावण के जरिये दलित वोटों पर हाथ साफ करके, एक ओर कांग्रेस ब्राह्मण वोटों तथा दूसरी ओर मुस्लिम वोट प्राप्त करेगी।
मोदीजी के बाद आगामी चुनाव में रालोद, सपा, रावण और कांग्रेस का गठबंधन होगा।
ऐसे में निर्णायक वोट होगा ब्राह्मण का।
ब्राह्मण चेहरों के रूप में मनोज मुन्तशिर व धीरेंद्र शास्त्री तैयार हो रहे हैं जिनके समर्थन की बोली लगाना भाजपा की मजबूरी होगी।
अगर भाजपा दोंनों को मैनेज नहीं कर पायी और काँग्रेस ने उन्हें अपने पाले में कर लिया तो समस्त तथाकथित उग्र हिंदू नेता व संत जैसे निश्चलानन्द, यति नरसिंहानंद, सुब्रह्मण्यम स्वामी, प्रवीण तोगड़िया आदि भाजपा व योगी जी का विरोध करते दिखाई देंगे और भाजपा फिर उसी स्थिति में पहुंच जाएगी जैसी बाबरी विध्वंस के बाद पहुंची थी।
समस्या हिंदुओं की यह है कि वह दो गज से आगे देखता नहीं, देखना चाहता भी नहीं। वह सफलता के ऐसे शॉर्टकट ढूढता है जिसमें धर्म के नाम पर चमत्कारों द्वारा व्यक्तिगत हितों की पूर्ति हो सके और हिंदुत्व के नाम पर जातिवादी अहं का पोषण।
आम हिंदू राजनीति में हजार साल पहले भी जीरो था आज भी है। ये मुस्लिम जैसी राजनैतिक रूप से जागरूक व चालाक कौम से कैसे मुकाबला कर पायेगा?
मिशनरीज तो इनकी सोच से भी परे की चीज है, उनसे क्या मुकाबला करेंगे।
सिर्फ एक दो देवकीनंदन मध्यप्रदेश में मैनेज कर लिए थे कांग्रेस ने तो भाजपा छह महीने बाहर रही सत्ता से और अमितशाह- मोदी न होते तो अभी भी बाहर ही होते।

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