Home विषयइतिहास संत रविदास जयंती पर विशेष

संत रविदास जयंती पर विशेष

by Swami Vyalok
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फिर से कौआ कान ले गया वाली बात हुई है, मित्रों। ऐसा मुझे पक्का विश्वास है। इसके तीन कारण हैं और तीनों ही जबरदस्त हैं।
पहला, जो पत्तलकार ‘संत रविदास’ को रोहिदास-रोहितदास और रोहिदा लिख रहे हैं, वे खबरों को कैसे लिखते हैं, कम से कम मुझे जानने की जरूरत नहीं है।
दूसरा, संघ प्रमुख भागवत मराठी में बोले हैं, तो उसका संदर्भ और वाच्यार्थ भी समझने की जरूरत है। शब्द उन्होंने बोला है- पंडित। महाबुद्धिमान पत्तलकारों ने इसका अनुवाद ब्राह्मण कर दिया है। कोई मराठी का जानकार उस बयान को पूरा सुने और अनुवाद करे, तो बात बने।
तीसरा, महामूर्ख जड़बुद्धि शठ स्वामी प्रसाद मौर्य उस बयान का समर्थन कर रहा है, तो जाहिर है कि वह बयान वैसा तो बिल्कुल नहीं होगा, जैसा बताया जा रहा है। आखिर, मूर्खाधिराज चंद्रशेखर यादव और स्वामी प्रसाद मौर्यों ने पहले भी तो अपना प्रमाणपत्र बार-बार दिखाया है।
पुनश्चः बाबा मोहन को भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए। वह जानते हैं कि उनके बयान पर सारे गिद्ध नजर गड़ाए हुए हैं। उनको अगर बोलने की बीमारी है तो खुद ही जारी किया करें बयान और यह ताकीद करें कि पत्तलकार उनके बयान को तोड़ें-मरोड़ें नहीं।
पहले भी उन्होंने बिहार की एक सभा में आरक्षण पर ज्ञान देकर भजप्पा की मिट्टी पलीद कर दी थी।

विशेष

गुरू रविदास (रैदास) का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत 1398 को हुआ था उनका एक दोहा प्रचलित है। चौदह सौ तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास। उनके पिता संतोख दास तथा माता का नाम कलसांं देवी था। उनकी पत्नी का नाम लोना देवी बताया जाता है। रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। वे जूते बनाने का काम किया करते थे औऱ ये उनका व्यवसाय था और अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। संत रामानन्द के शिष्य बनकर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया। संत रविदास जी ने स्वामी रामानंद जी को कबीर साहेब जी के कहने पर गुरु बनाया था, जबकि उनके वास्तविक आध्यात्मिक गुरु कबीर साहेब जी ही थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से भगा दिया। रविदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग इमारत बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।

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