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वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड भाग 105

सुमंत विद्वांस

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तब रावण का सचिव यूपाक्ष आगे आया और हाथ जोड़कर उसने कहा, “महाराज! एक मनुष्य के कारण हम लोगों पर एक भारी संकट आ गया है। सीताहरण से क्रोधित होकर राम ने अपनी विशाल वानर-सेना के साथ लंका को चारों ओर से घेर लिया है। पहले एक वानर ने अकेले ही यहाँ आकर लंकापुरी को जला दिया था और अनेक हाथियों व राक्षसों सहित अक्षकुमार को भी मार डाला था। अब तो साक्षात राक्षसराज रावण को भी राम ने युद्ध में हराकर भी जीवित छोड़ दिया। बड़ी कठिनाई से उनके प्राण बचे। महाराज की ऐसी अपमानित दशा तो देवों, दानवों और दैत्यों ने भी नहीं की थी, जो उस एक मनुष्य ने कर डाली है।”
यह सुनकर कुम्भकर्ण की आँखे आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं। वह यूपाक्ष को देखता हुआ बोला, “यूपाक्ष! मैं अभी सारी वानर-सेना को और राम-लक्ष्मण को भी युद्ध में परास्त कर दूँगा, फिर आकर रावण से मिलूँगा। वानरों के रक्त और मांस से आज मैं राक्षसों को तृप्त करूँगा और स्वयं भी राम-लक्ष्मण का रक्त पीऊँगा।”
कुम्भकर्ण की यह अहंकारपूर्ण बात सुनकर महोदर ने कहा, “महाबली! पहले आप चलकर महाराज रावण की बात सुन लीजिए। फिर आपको जैसा उचित लगे, वह कीजिए।”
उसकी बात मानकर कुम्भकर्ण रावण से मिलने के लिए अपने बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। उसने मुँह धोकर स्नान किया और बलवर्धक पेय लाने की आज्ञा दी। तब वे राक्षस तुरंत उसके लिए मद्य एवं अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ ले आए।
दो हजार घड़े मद्य गटकने के बाद कुम्भकर्ण का मन प्रसन्न हो गया और वह राक्षसों की सेना के साथ अपने भाई के महल की ओर चला। उसके पैरों की धमक से सारी पृथ्वी काँप उठी। नगर के बाहर खड़े वानर सहसा उस विशालकाय राक्षस को देखकर घबरा गए और भय के कारण इधर-उधर भागने लगे।
उस कोलाहल के कारण श्रीराम का ध्यान उस ओर गया और उन्होंने भी कुम्भकर्ण को देखा। उसके विशाल आकार को देखकर उन्हें बड़ा अचंभा हुआ और तब उन्होंने विभीषण से पूछा कि “यह भूरे नेत्रों वाला विशालकाय राक्षस कौन है? मैंने आज तक इतने बड़े डील डौल वाला कोई प्राणी नहीं देखा। यह कोई राक्षस है या असुर?”
तब विभीषण ने बताया, “भगवन्! यह कुम्भकर्ण है। इसने देवता, दानव, नाग, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरों को हजारों बार युद्ध में हराया है। बचपन में भूख के कारण इसने सहस्त्रों प्रजाजनों को खा डाला था। जब उनकी याचना सुनकर इन्द्र ने इस पर वज्र से प्रहार किया, तो इसने भी कुपित होकर इन्द्र के ऐरावत हाथी का एक दाँत तोड़ डाला और उसी से इन्द्र पर प्रहार कर दिया। तब व्यथित होकर इन्द्र सहित सब देवता ब्रह्माजी के पास गए। इसके द्वारा प्रजा के भक्षण, देवताओं के तिरस्कार, ऋषियों के आश्रमों के विनाश तथा परायी स्त्रियों के अपहरण की बात सुनकर ब्रह्माजी ने इसे शाप दिया कि ‘तू सदा मुर्दों के समान सोता रहेगा।’”
“इस शाप से कुम्भकर्ण वहीं गिर पड़ा। यह देखकर घबराए हुए रावण ने ब्रह्माजी से दया की याचना की। इस पर उन्होंने क्षमा करते हुए कहा, “ठीक है! यह छः मास तक सोता रहेगा और एक दिन जागेगा। उस दिन यह भूख के कारण बहुत-से लोगों को खा जाया करेगा।”
“इस समय आपके पराक्रम से भयभीत होकर रावण ने इसे जगाया है। अब यह कुपित होकर वानरों को खा जाने के लिए उनके पीछे इधर-उधर दौड़ रहा है। इससे घबराकर सब वानर भाग गए, तो हम युद्ध में इसे कैसे रोकेंगे? अतः हमें सब वानरों से कह देना चाहिए कि यह कोई व्यक्ति नहीं है, बल्कि काया के आकार वाला एक यन्त्र है। तब वे घबराना छोड़कर निर्भय हो जाएँगे।”
यह सुझाव मानकर श्रीराम ने वानरों को समझाने के लिए नील को भेजा। उसके आदेश के अनुसार गवाक्ष, शरभ, हनुमान जी, अंगद आदि के नेतृत्व में वानर बड़े-बड़े वृक्ष और पत्थर लेकर लंका के द्वारों व राजमार्गों पर युद्ध के लिए डट गए।
उधर रावण के पास पहुँचकर कुम्भकर्ण ने उसके चरणों में प्रणाम किया और नींद से जाए जाने का कारण पूछा। रावण ने बड़ी प्रसन्नता से उसे गले से लगा लिया। फिर उसे एक सुन्दर सिंहासन पर बिठाने के बाद रावण बोला, “महाबली वीर! तुम नहीं जानते कि जब तुम गाढ़ी निद्रा में मग्न थे, तब राम के साथ सुग्रीव की सेना समुद्र पर सेतु बनाकर इस पार आ गई और उन वानरों ने लंका को संकट में डाल दिया है। हमारे सब प्रमुख राक्षस वीरों को उन वानरों ने मार डाला। वानरों के इस संकट से तुम ही हमारी रक्षा कर सकते हो। अब तुम ही मुझ पर अनुग्रह करके इस लंका को बचाओ।”
यह सुनकर कुम्भकर्ण ठहाका मारकर हँसने लगा। वह बोला, “भाई! पहले तो तुमने विभीषण जैसे हितैषियों की बातों पर ध्यान नहीं दिया। अब अपने पापकर्म का फल देखकर तुम्हें भय हो रहा है। अपने अहंकार से तुमने आज तक जो अनुचित कर्म किए हैं, उन संस्कारहीन कर्मों के कारण ही आज तुम इस संकट में आ गिरे हो।”
“जो राजा अपने सचिवों के साथ विचार-विमर्श करके साम, दान और दण्ड का उचित प्रकार से उपयोग करता है, वही उत्तम राजा है। जो नीतिशास्त्र का पालन करता है और अपनी बुद्धि से अपने हितैषियों को पहचान सकता है, वही राजा अपने कर्तव्य और अकर्तव्य को समझ पाता है। धर्म, अर्थ और काम का सेवन उचित समय पर ही करना चाहिए। इन तीनों में भी धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है, अतः आवश्यकता पड़ने पर धर्म के लिए अर्थ व काम को भी त्याग देना चाहिए। जो राजा इस बात को नहीं समझता या समझकर भी नहीं मानता, उसका सब अध्ययन व्यर्थ है।”
“राजा को केवल उत्तम बुद्धि वाले मंत्रियों को नियुक्त करके उनके परामर्श से कार्य करना चाहिए। जो राजा पशु के समान बुद्धि वाले किसी भी प्रकार के मंत्रियों को अपने आस-पास जुटा लेता है, उसके कार्य सदा बिगड़ते हैं क्योंकि शास्त्र के अर्थ को न जानने के कारण वे मंत्री उचित सलाह कभी नहीं दे सकते। उनमें से कुछ तो शत्रुओं के साथ भी मिल जाते हैं और अपने ही स्वामी का विनाश कर डालते हैं।”
“जो राजा अपने चंचल मन के कारण केवल रमणीय वचनों को सुनकर ही संतुष्ट होता है और बिना सोचे-समझे कोई भी कार्य करता है, उसे अपनी मूर्खता का परिणाम भी शीघ्र भुगतना पड़ता है। विभीषण और मंदोदरी की हितकर बात न मानने के कारण ही तुम अब संकट में पड़ गए हो।”
यह सब सुनकर रावण क्रोधित हो गया। भौहें टेढ़ी करके उसने क्रोधित स्वर में कहा, “तुम किसी आचार्य की भाँति मुझे उपदेश क्यों दे रहे हो? मैंने जिस किसी भी कारण से तुम लोगों की बात नहीं मानी थी, अब उसकी चर्चा करना व्यर्थ है। बीती हुई बात के लिए बुद्धिमान लोग बार-बार शोक नहीं करते हैं। तुम अब इसका विचार करो कि आगे हमें क्या करना चाहिए।”
रावण का यह क्रोध देखकर कुम्भकर्ण ने धीमी वाणी में उसे सांत्वना देते हुए कहा, “शत्रुदमन! संताप व्यर्थ है। तुम अब शांत होकर मेरी बात सुनो। मुझे सदा तुम्हारे हित की ही बात करनी चाहिए, इसी कारण मैंने यह सब कहा। एक भाई के लिए जो करना उचित है, मैं भी तुम्हारे लिए वही करूँगा। अब तुम युद्धभूमि में मेरे द्वारा शत्रु का संहार देखो। आज तुम देखोगे कि राम और उसके भाई के मारे जाने पर किस प्रकार वानर-सेना इधर-उधर भागेगी। मैं आज समरभूमि से राम का शीश काटकर लाऊँगा। उसे देखकर सीता दुःख में डूब जाएगी और तुम सुखी हो जाओगे। जिन राक्षसों के सगे-संबंधी वानरों के हाथों मारे गए हैं, वे सब भी आज राम की मृत्यु देखेंगे।”
“राक्षसराज! मुझे राम से कोई भय नहीं है। अब तुम मुझे युद्ध की आज्ञा दो। मेरे इस तीखे त्रिशूल से देवता भी डरते हैं, किन्तु आज न तो मैं शक्ति से, न गदा से, न तलवार से और न पैने बाणों से युद्ध करूँगा। अपने दोनों हाथों से ही मैं राम का वध कर डालूँगा। जिस हनुमान ने लंका जलाई थी, उसे भी आज मैं जीवित नहीं छोड़ूँगा। लक्ष्मण और सुग्रीव को भी मार डालूँगा और वानरों को खा जाऊँगा। अतः तुम अब अपना भय त्याग दो।”
यह सुनकर महोदर बोला, “कुम्भकर्ण! तुम उत्तम कुल में जन्मे हो, किन्तु तुम्हारी बुद्धि नीच ही है। तुम ढीठ और घमंडी हो, इसीलिए उचित-अनुचित को नहीं जानते।”
आगे जारी रहेगा….
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। युद्धकाण्ड। गीताप्रेस)

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