Home विषयऐतिहासिक मर्कबाह रहस्यवाद, प्राचीन यहूदियों का एक प्राचीन रहस्यवाद

मर्कबाह रहस्यवाद, प्राचीन यहूदियों का एक प्राचीन रहस्यवाद

zoya mansuri

by ज़ोया मंसूरी
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मर्कबाह रहस्यवाद में मानव शरीर को दो त्रिकोणों के बीच स्थित ‘सेंटर ऑफ एनर्जी फील्ड’ के रूप में परिभाषित किया गया है। मर्कबाह रहस्यवाद में मानव शरीर को शक्ति का स्रोत माना गया है, एक ऐसा ऊर्जा क्षेत्र जो सात चक्रों द्वारा उत्पन्न होता है।
यह विश्वास प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया, अमेरिकी मूलनिवासियों से लेकर भारत तक फैला था। भारतीय योग दर्शन मे मानव शरीर के ये सात चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार कहलाते हैं। ये सभी चक्र मेरुदंड में स्थित होते हैं। मूलाधार चक्र मेरुदंड के मूल में सबसे नीचे और आज्ञा चक्र मेरुदण्ड की समाप्ति पर भ्रूमध्य के पीछे और फिर सहस्रार चक्र।
सहस्रार चक्र की परिकल्पना हजार या अनन्त पंखुडिय़ों वाले कमल के रूप की गई है, जिसके केंद्र में ईश्वर के दो पैर है, शिव और शक्ति। इसे ‘कैलाश’, ‘ब्रह्म रन्ध्र’ और ‘लक्ष किरणों का केन्द्र’ भी कहा जाता है। सहस्रार चक्र एक विशाल ताकतवर और महत्त्वपूर्ण शक्ति का सोर्स माना जाता है। सहस्रार चक्र का कोई विशेष रंग या गुण नहीं है। यह विशुद्ध प्रकाश यानि ऊर्जा है, जिसमें सभी रंग हैं। सहस्रार चक्र के देवता भगवान शिव है।
अब आते है मेरुदंड पर। मेरुदंड या रीढ़ की हड्डी गुदा द्वार से आरम्भ होकर मानव मस्तिष्क के सबसे पिछले और सबसे प्राचीन भाग रेप्टेलियन ब्रेन पर खत्म होती है। मानव मष्तिष्क के तीन हिस्से होते है। एक सबसे प्राचीन रेप्टिलियन या डायनासोर ब्रेन, उसके ऊपर लिम्बिक ब्रेन और सबसे ऊपर नियो कोर्टिक्स ब्रेन जो सबसे नया है। नियो कोर्टिक्स सबसे विकसित हिस्सा है जो सोचने, भाषा, तर्क, फैसले, रचना, अविष्कार आदि के लिए जिम्मेदार है।
लिम्बिक ब्रेन भावनाओं, प्रेम, ईर्ष्या, दर्द आदि के लिए जिम्मेदार है जबकि रेप्टिलियन चेतना, नींद, बॉडी क्लॉक से जुड़ा है। मेरुदंड मस्तिष्क में जाकर इसी रेप्टिलियन ब्रेन और लिम्बिक ब्रेन के बीच में स्थित एक ग्रन्थि से मिलती है, जिसके कहते है पिनियल ग्रन्थि।आधुनिक जीव विज्ञान अब ये मानता है कि पिनियल ग्रंथि वास्तव में हमारे शरीर मे मौजूद तीसरी आँख है।
पिनियल ग्रन्थि से कुछ हार्मोन निकलते है, जिन्हें योग दर्शन में ‘अमृत’ कहा जाता है। उनमें से एक मोलेटोनिन जो सरकेडियम रिदम यानि सोने जागने की क्रिया को नियंत्रित करता है। पीनियल ग्रन्थि मेलाटोनिन का स्राव आवश्यकतानुसार ही करती है लेकिन क्या हो अगर पिनियल ग्रन्थि से निकलने वाले मेलाटोनिन का स्तर बढ़ जाए? मेलाटोनिन का उच्च स्तर सीधे मस्तिष्क के एक हिस्से ‘हाइपोथैलेमस’ को हिट करता है, जिससे भूख को नियंत्रित किया जा सकता है।
इसलिए शिव भूख के संहारक हैं।
पिनियल ग्रन्थि से निकलने वाला एक अन्य हार्मोन है सेरोटोनिन, लेकिन हमारे शरीर मे सेरोटोनिन का सबसे बड़ा स्रोत पिनियल ग्रन्थि नहीं है, हमारा पेट है। सेरोटोनिन भोजन के पश्चात हमारे पेट मे उत्पन्न होता है, जो हमें तृप्ति या आनंद प्रदान करता है इसलिए इसे ‘फील गुड मोलेक्यूल’ कहा जाता है। अगर हम पिनियल ग्रन्थि में सेरोटोनिन का स्तर बढ़ा सकें, तो बिना भोजन किए ही तृप्त हो सकते हैं।
सेरोटोनिन का उच्च स्तर एक जगह और तृप्ति दे सकता है, संभोग की तृप्ति। पुरुषों में संभोग के लिए टेस्टोस्टेरोन हार्मोन जिम्मेदार माना जाता है और टेस्टोस्टेरोन ही सेरोटोनिन का स्तर नियंत्रित करता है, जो यौन इच्छा और अनिच्छा के लिए जिम्मेदार है। क्या हो अगर हम पिनियल ग्रन्थि के उपयोग से सेरेटोनिन का स्तर नियंत्रित करने में सफल हो जाएं?
सेरेटोनिन यौन इच्छा का एक प्रमुख निरोधात्मक हार्मोन होता है, जो उत्तेजक प्रणालियों की यौन संकेतों द्वारा सक्रिय होने की क्षमता को कम करता है। सरल शब्दों में सेरोटोनिन का उच्च स्तर न्यूरॉन सिग्नलिंग को हिट कर यौनांग और यौन व्यवहार को नियंत्रित करता है। पिनियल ग्रन्थि के नियंत्रण से हम भी ऐसा कर सकते है। ध्यान रहे भगवान शिव ने लम्बे समय तक योग के पश्चात पहली बार अपना तीसरा नेत्र कामदेव के संहार के लिए ही खोला था।
शिव इसलिए काम के संहारक है।
पिनियल ग्रन्थि से एक अन्य हार्मोन भी निकलता है, डीएमटी यानी डाइमिथाइलट्रिप्टमाइन। इसे गॉड मोलेक्यूल भी कहा जाता है। डीएमटी प्रकृति से मिलने वाला एक प्रतिबंधित हेलुसीनोजेनिक मोलेक्यूल है जो मतिभ्रम के लिए जिम्मेदार है। डीएमटी का इस्तेमाल मनुष्य को किसी दूसरे आयाम में ले जाता है। डीएमटी का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोग चेतना के उस स्तर को जागृत कर लेते हैं, जहां वो शक्तिशाली प्रकाश पुंज के बीच देवों, फरिश्तों, परियों और ईश्वर को देख पाते है।
दुर्भाग्य या सौभाग्य से हमारा शरीर इतना डीएमटी पैदा नहीं करता कि हम चेतना के उस स्तर को जागरूक कर पाएं, जिसे साइकेडेलिक अवस्था कहा जाता है। मानव शरीर मे डीएमटी सबसे पहले पिनियल ग्रन्थ से तब स्रावित होता है जब मनुष्य गर्भ के पांचवे हफ्ते में होता है। आध्यात्मिक रूप से यही वह समय माना जाता है जब बच्चे में आत्मा का प्रवेश होता है। इसके बाद सबसे ज्यादा डीएमटी पिनियल ग्रन्थि तब स्रावित करती है, जब मनुष्य मृत्यु के निकट हो। यह वह समय होता है, जब आत्मा शरीर से बाहर जा रही होती है।
इसलिए डीएमटी को आत्मा तत्व अर्थात ‘स्पिरिट मोलेक्यूल’ भी कहा जाता है। अभी तक विज्ञान यह नहीं जान पाया है कि पिनियल ग्रन्थि डीएमटी का उत्पादन क्यों करती है, मस्तिष्क में इसका क्या काम है लेकिन इसे आत्मा के प्रवेश और निष्कासन से जुड़ी प्रक्रिया का जिम्मेदार माना जाता है। मृत्यु के समय पिनियल ग्रन्थि से इतनी अधिक मात्रा में डीएमटी उत्पन्न होता है कि मरने वाला व्यक्ति मृत्यु के भय से दूर साइकेडेलिक अवस्था में प्रकाश पुंज में एक अनंत यात्रा पर चला जाता है
इसलिए शिव भय के संहारक हैं, महाकाल हैं।
9,000 साल से भी ज्यादा से पहले से दुनियां भर की सभ्यताएं पीनियल ग्रन्थि को जागृत करने के लिए प्रयास कर रही हैं। इसके लिए प्राचीन श्रमण तमाम ऐसी वनस्पतियों का सेवन करते थे, जिनसे डीएमटी और एलएसडी प्राप्त हो सके। ऐसा माना जाता था कि एलएसडी के सेवन से पिनियल ग्रन्थि को सक्रिय किया जा सकता है। सम्भवतः इसीलिए भगवान शिव के भांग और धतूरे जैसी हेलुसीनोजेनिक जैसी वनस्पतियों को जोड़ा गया है।
शिव त्रिलोचन है, जिन्होंने अपनी तीसरी आँख को नियंत्रित करना सीखा। यह तीसरी आँख पिनियल ग्रन्थि ही है। शिव ने इसे सक्रिय कर लिया था। इस पिनियल ग्रन्थि को योग से जागृत किया जा सकता है, आसान नहीं है इसलिए शिव सिर्फ एक ही है। यही पिनियल ग्रन्थि ही सातवां चक्र सहस्त्रार चक्र है, जिसे आदियोगी ने जागृत कर लिया था। सहस्त्रार, प्रकाश का एक कमल पुंज जिसके केंद्र में है शिव और शक्ति।
तंत्र विज्ञान में ऊर्जा के इस कमल पुंज को कमल योनि के रूप में दर्शाया गया है, जिसके मध्य में शिवलिंग है। तस्वीर मां कामाख्या की है, तीसरे नेत्र की, शक्ति और शिव के मिलन की, सहस्त्रार चक्र के जागरण की। शक्ति का सोर्स हम हैं, शक्ति हमारे भीतर विराजमान है। शिव वहां किसी दूसरे आयाम में हैं। शिव को शक्ति की प्रतीक्षा है। हम शक्ति का केंद्र बिंदु है। शिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन की बेला है। शिवरात्रि हमारे और शिव के मिलन की बेला है।

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