Home विषयमुद्दा क्या एक भारतीय प्रमाणपत्र अमेरिकी नागरिको का जीवन बदल सकता है?

क्या एक भारतीय प्रमाणपत्र अमेरिकी नागरिको का जीवन बदल सकता है?

अमित सिंघल

by अमित सिंघल
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अमेरिका समेत कुछ पश्चिमी राष्ट्र व्यक्तियों को अपनी “पहचान” चुनने का अधिकार देते है। उदाहरण के लिए, जन्म के समय किसी का जेंडर पुरुष था। लेकिन कुछ वर्ष बाद उस व्यक्ति को लगा कि वह महिला है। अतः वह अपना ऑपरेशन करवा के स्वयं को एक स्त्री के रूप में डिफाइन कर सकता/सकती है। कुछ लोग ऑपरेशन की भी आवश्यकता नहीं समझते और एक दिन एकाएक किसी अन्य जेंडर के रूप में अपनी अभिव्यक्ति शुरू कर देते है।
तभी कई सर्वे में यह च्वाइस दी जाती है कि आप अपने जेंडर को ना डिफाइन करे। साथ ही अमेरिका में एक बड़ी डिबेट चली थी और चल रही है कि सार्वजनिक एवं निजी स्थलों पर जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट होने चाहिए – अर्थात जिसे स्त्री-पुरुष दोनों एक साथ प्रयोग कर सके। ऐसे जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट आपको मिल भी जाएंगे।
विवाह के कई वर्ष बाद, बच्चे होने के बाद, कुछ लोग घोषित करते है कि उनका विवाह समलैंगिक प्रणाली में होना चाहिए क्योकि यही उनकी पहचान है। तलाक लेकर वे अन्य वैवाहिक व्यवस्था में प्रवेश कर जाते है।
पिछले वर्ष एक ट्रांसजेंडर – एक ऐसा व्यक्ति जिसकी व्यक्तिगत पहचान और जेंडर की भावना उनके जन्म के लिंग के अनुरूप नहीं है – लिआ टॉमस ने, जो पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय का विद्यार्थी है, और जो पुरुषो की तैराकी प्रतियोगिता में भाग लेता था, एकाएक अपने को महिलाओ की तैराकी प्रतियोगिता में रजिस्टर करवा दिया।
लिआ उस प्रतियोगिता में प्रथम आयी। इस विजय ने फीमेल प्रतियोगियों को दुविधा में डाल दिया क्योकि उनकी जीत की सम्भावना क्षीण हो गयी थी। साथ ही यह डिबेट भी खड़ी हो गयी कि अन्य खेल प्रतियोगिताओ का क्या होगा जिसमे केवल महिलाये भाग ले सकती है और जिसके लिए वे कई वर्षो से परिश्रम कर रही है।
लेकिन मुख्य विषय यह नहीं है। और विषय की संवेदनशीलता के कारण इस पर विवाद-विमर्श भी नहीं करूँगा।
मुख्य विषय यह है कि अमेरिका के सीएटल शहर की नगरपालिका ने एक प्रस्ताव पारित करके जातिगत आधार पर भेदभाव को गैरकानूनी घोषित कर दिया है। होना भी चाहिए।
लेकिन इस घोषणा के पीछे एक प्रदूषित भावना कार्य कर रही है जो असत्य प्रचार कर रही है कि अमेरिका में भारतीय मूल के तथाकथित उच्च जाति वाले लोग तथाकथित निम्न जाति वालो के साथ भेदभाव कर रहे है तथा निम्न जाति वाले लोग प्रगति नहीं कर पा रहे है।
जो भी अमेरिका में कार्य कर रहा है, उसे पता है कि उसका सेलेक्शन जिस पैनल ने किया था उसमे अधिकतर लोग भारतीय मूल के नहीं थे। फिर अमेरिका की जॉब अप्लीकेशन में ऐसा कोई कॉलम नहीं होता जिसमे जाति या राष्ट्रीयता की पहचान पूँछी जाती हो। यहाँ तक कि कई अप्लीकेशन में आप जेंडर भी लिखने से मना कर सकते है। पूरा सिस्टम प्रतिभा के आधार पर चलता है।
कुछ संस्थानों में ब्लैक अमेरिकन, निर्धनता इत्यादि के आधार पर सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था है। लेकिन यह भी विचार-विमर्श का विषय नहीं है।
समस्या यह है कि क्या अमेरिकी सरकारी व्यवस्था एडमिशन एवं नौकरी के लिए भारतीय मूल के अपने नागरिको या परमानेंट रेसिडेंट्स (ग्रीन कार्ड धारक) से भारत से जातिगत प्रमाणपत्र लाने को कहेगी? ध्यान दीजिए – मैं अमेरिकी नागरिको की बात कर रहा हूँ। अमेरिका में कौन सत्यापित करेगा कि फलाना ब्राह्मण है और ढिकाना दलित?
तब क्या होगा जब एक सिंघल/अग्रवाल अपने आपको दलित घोषित कर दे? या फिर जैन? या फिर बनर्जी या मोएत्रा जी? यादव जी? आखिरकार अमेरिकी व्यवस्था व्यक्तियों को अपनी “पहचान” चुनने का अधिकार देती है?
जैन को आप अल्पसंख्यक में रखेंगे या दलित समाज में?
क्या इन अमेरिकी नागरिको को अपनी जातिगत पहचान चुनने का अधिकार नहीं मिलेगा?
उत्सव मनाइये कि भारतीय सरकारी व्यवस्था का एक प्रमाणपत्र अमेरिकी नागरिको का जीवन बदल सकता है!

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