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जल उपवास

नितिन त्रिपाठी

by Nitin Tripathi
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पश्चिम की अच्छी बात यह है कि पहले तो वह आपका मजाक उड़ायेंगे पर जैसे ही उन्हें समझ आ जाता है कि आपकी बात में दम है वह आपकी बात को पूरी तरह से अपना कर उसकी ऐसी ब्रांडिंग कर देंगे सरल भाषा में कि कल तक आपको जो करने में गंवार पना लगता था वह अब कूल लगता है.
जब आप लंबे समय के लिये उपवास करते हैं – उपवास अर्थात सरल भाषा में समझिए जीरो कैलोरी. जल, नींबू पानी, आँवला पानी, ग्रीन टी, ब्लैक कॉफ़ी पी सकते है, जूस, सुगर, फ्रूट कुछ नहीं. तो जब आप लम्बे समय के लिए उपवास करते हैं आपके शरीर के अंदर सर्वाइवल ऑफ़ फ़िटेस्ट आरंभ होता है. मज़बूत कोशिकायें कमजोर कोशिकाओं को खाने लगती हैं. शरीर अपनी ऊर्जा सुरक्षित रखने के लिए मृत कोशिकाओं का तुरंत उत्सर्जन करने लगता है. कुछ समय पश्चात जब आप भोजन करते हैं तो शरीर नई कोशिकायें बना देता है. इस तरीक़े से शरीर का नवीनी करण हो जाता है.
विज्ञान की दृष्टि से यह प्रक्रिया ऑटोफ़ैगी कहलायी. जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी को इस ‘खोज’ के लिए 2016 में नोबेल पुरुष्कार मिला. इसी का संक्षिप्त फॉर्म इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग भी है जो इस समय दुनिया के सभी डायटीशियन की रिकमेंडेशन लिस्ट में है.
यह व्रत / उपवास की प्रक्रिया हमें सदियों से उपलब्ध है सनातन में. आपने देखा होगा ऋषियों / सन्यासियों के चेहरे पर अलग ही चमक रहती है. वैज्ञानिक वजह यही है कि ऑटोफ़ैगी से उनके शरीर की कमजोर कोशिकायें निष्कासित होती रहती हैं चेहरे पर डेड सेल्स के रूप में झुर्रियाँ नहीं होती.
हमारे पूर्वज जो सप्ताह में एक बार मंगल व्रत / एकादशी व्रत आदि का प्रावधान बना गये हैं उसी का ही मॉडर्न अंग्रेज़ी रूप है इंटरमिटेंट फ़ेस्टिंग.
और साल में दो बार नौ दिन उपवास / व्रत. यह है ऑटोफ़ैगी. सम्भव हो व्रत / उपवास अवश्य रहें, स्वयं को अच्छा लगेगा. मनुष्य अपने शरीर को किसी भी परिस्थितियों में ढाल सकते हैं तो सुबह खाना न खाने पर सर में दर्द होता है – यदि मेडिकल रीजन नहीं है तो अभ्यास से इस पर भी विजय पाई जा सकती है.

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