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तानाशाही सत्ताओं की क्रोनोलोजी

विवेक उमराओ

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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तब-तक मुख्यधारा समाज की मानसिकता में माओवाद द्वारा, यह नैरेटिव स्थापित नहीं हो पाया था कि माओवादी, आम-आदिवासी होता है, जो अपनी संस्कृति व जंगल-अर्थव्यवस्था इत्यादि को संरक्षित करने के लिए मजबूरी में हिंसा करता है। उस दिनों मुख्यधारा के गांवों, कस्बों, शहरों में पीढ़ियों से रहने वाले आदिवासी जाति-वर्ग के लोगों के रहन-सहन व जीवन-शैली को ही अधिकांश लोग आदिवासी संस्कृति व शैली मानते थे जो इन लोगों को लगभग अपने जैसी ही दीखती थी (आज भी बहुत लोग मानते हैं)। जबकि आदिवासी व आदिवासी जाति-वर्ग, इन दोनों में जब आज भी भारी अंतर है, तो उस समय कितना अंतर रहा होगा, इसका अनुमान करना मुश्किल नहीं।
लगभग पांच दशक पहले जब माओवादी बस्तर पहुंचे तो; भोले-भाले दुनियादारी से अनजान अपने में मगन रहने वाले, जंगल ने जो दे दिया उसको खा-पीकर जीवन को जीने वाले आदिवासियों के बीच; अपनी पकड़ बनाने के लिए उनको बताया कि मुख्य-धारा के लोग बर्बर शोषक हैं (जबकि माओवादी खुद ही मुख्य-धारा वर्ग से थे, शोषण व बर्बरता करने ही आए थे), आदिवासियों का शोषण करती है। माओवाद ही ऐसा अपवाद है जिसको दुनिया, जीवन व सामाजिक मूल्यों की समझ है, सामाजिक समाधान जानते हैं। इसलिए केवल माओवाद ही आदिवासियों का जीवन पार लगा सकता है और पार लगाने के लिए प्रतिबद्ध है, बदले में आदिवासियों को माओवाद का अंधा-अनुसरण करना होगा।
माओवादी शातिर तरीकों के साथ आदिवासियों का ब्रेनवाश करने लगे। आदिवासी आखिर क्यों न मैनीपुलेट होते, क्यों न जुड़ते। मुख्यधारा-समाज के लोग कभी न पहुंचे उनके पास कि हम आपके हैं, आपको पिछड़ा नहीं मानते हैं, आपकी संस्कृति व जीवन-शैली का तहेदिल से आदर करते हैं। मुख्यधारा के लोग तो जब गांवों में रहने वालों को गवांर कहकर गाली देते हैं तो आदिवासियों के प्रति क्या मानसिकता रखते होंगे, इसको समझना किसी भी ईमानदार व विचारशील व्यक्ति के लिए मुश्किल नहीं। परिणामतः माओवादियों ने जो समझाया जैसा समझाया, उसको वैसा मान लिया गया स्वीकार कर लिया गया। माओवादियों ने खुद को आदिवासियों का एकमात्र रहनुमा प्रायोजित किया, आगे चलकर खुद को आदिवासियों के देवताओं की तरह स्थापित कर लिया जिनके विरुद्ध कुछ भी बोलना करना अक्षम्य अपराध हो गया। वीभत्स तरीकों से आम-आदिवासियों की हत्याएं की जाने लगीं, ताकि आदिवासियों में रूह कंपा देने वाला भय कायम हो सके, निरंकुश तानाशाही गहरे व व्यापक स्तर पर स्थापित होती रहे।
आदिवासी प्रकृति की पूजा करते थे, प्रकृति को ही ईश्वर मानते थे। आपदाओं व बीमारियों इत्यादि के लिए, मन में कुछ आत्मविश्वास पाने के लिए स्थानीय देवी-देवता गढ़ लिए थे। आस्तिकता के नाम पर यही जमा-पूंजी रही। माओवादियों ने कहा कि यह सब बंद होना चाहिए, नास्तिकता होना चाहिए। नास्तिकता के नाम पर माओ जैसे महाधूर्त महाक्रूर महाबर्बर महाशातिर महाप्रपंची व मानव इतिहास के सबसे बड़े हत्यारों में से एक को सर्वोच्च देवता के रूप में स्थापित किया।
आदिवासियों ने संस्कृति के नाम पर सहजता व भोलेपन से शताब्दियों की यात्रा में जो स्थापित किया था, उसको माओवादियों ने बर्बरता से बंद करवाना शुरू किया। आदिवासी संगीत, कला, सामाजिक-परंपराओं इत्यादि को प्रतिबंधित करना शुरू किया (अब तक तो लगभग सबकुछ नष्ट ही चुका है)।
दस-बीस साल गुजरने के बाद आदिवासियों को महसूस होना शुरू हुआ कि यह तो कहानी ही अलग है। कुछ साहसी आदिवासियों ने इसका विरोध करना शुरू किया। माओवादियों ने सत्ता मजबूत व निरकुंश करने के लिए आदिवासियों की हत्ताएं करना शुरू किया। जिनकी भी हत्याएं करना होता उनके खिलाफ नैरेटिव गढ़ा जाता कि वे पुलिस व प्रशासन के एजेंट हैं, शोषकों के एजेंट हैं। जबकि उस समय पुलिस प्रशासन दूर-दूर तक नाममात्र का होता था, जो पूरा जोर लगाकर भी कितना व कितनों का शोषण कर लेता भला।
माहौल बनाने के लिए जिन लोगों की हत्याएं की जातीं, उनके पीछे महीनों तक आम आदिवासियों में से जासूस टाइप लोग लगाए जाते। सीधे हत्या की जा सकती थी। लेकिन यह सब नौटंकी करने से नैरेटिव सेट होता था कि पुलिस प्रशासन व शोषक षणयंत्र रच रहे हैं, उनको पता चले बिना उनके षणयंत्र को खतम करना है। इस तरह से हत्याएं करने से आदिवासी समाज में भय का प्रसार भी होता था, नैरेटिव तो सेट होता ही था।
निरंकुश तानाशाही माओवादी सत्ता ठीक-ठाक तरीके से स्थापित होने के बाद अगले चरण में माओवादियों ने बसें जलाना, मुख्यधारा के आम निर्दोष लोगों की मास-किलिंग करना शुरू किया। इससे मुख्यधारा में हंगामा तो होता ही था। माओवादी बहुत ताकतवर हैं, मुख्यधारा से लड़ने की ताकत रखते हैं, जब मुख्यधारा-समाज इनके सामने कुछ नहीं तो हम आदिवासी लोग क्या हैं, यह भय व नैरेटिव भी आदिवासियों के अंदर खुद ब खुद स्थापित होता था।
जब तक, माओवाद की समानांतर सत्ता स्थापित नहीं हुई थी, तब तक अच्छे-दिनों का सपना प्रायोजित किया, ज्यों-ज्यों माओवाद की पकड़ मजबूत होती चली गई, त्यों-त्यों माओवाद अपने वास्तविक चरित्र में आने लगा, ढोंग करने की जरूरत ही नहीं रह गई थी। स्थानीय व्यापारी, सरकारी कर्मचारी, NGO, पत्रकार इत्यादि लालच या भय से माओवाद के अघोषित एजेंटों के तौर पर काम करने लग गए। आदिवासियों के स्वतःफूर्त आंदोलनों व विरोध को नैरेटिव व पीआर द्वारा बदनाम कर दिया गया, मुख्यधारा के लोग माओवाद के विरोध में खड़े आदिवासी-आंदोलनों का विरोध करने लगे, ऐसा करने को अपनी जागृति व सामाजिक-प्रतिबद्धता समझने लगे।
तानाशाही व अलोकतांत्रिक सत्ताओं की यही क्रोनोलोजी होती है। क्रोनोलोजी को सूक्ष्मतर नैरेटिव्स, ब्रेनवाश व पीआर इत्यादि के कुचक्रों व आभामंडल इत्यादि से बाहर निकल कर देखना-समझना होता है।

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