यही जीवन है।

by अमित सिंघल
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पश्चिमी समाज तीव्र गति से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा है। यूरोप, अमेरिका, जापान, कोरिया इत्यादि के कई गाँवों में ना तो बच्चे, ना ही नवयुवा-युवती दिखाई देंगे। शहरो में भी बच्चो की तुलना में अधेड़ एवं प्रौढ़ अधिक दिखते है। कई परिवारों में केवल अति वृद्ध – 80 वर्ष के ऊपर – रह गए है।
कई बार सोचता हूँ की उन परिवारों एवं समाज में वृद्ध व्यक्ति कैसे जीवन-यापन करते होंगे।
फिर उत्तर भी फुटपाथ-सड़क पर मिल जाता है। कई बार अति वृद्ध पुरुष-महिला अपने आप या वॉकर के सहारे अत्यधिक धीमी चाल से चलेंगे। एक-एक कदम घसीटते हुए। कमर 60 से 80 डिग्री की कोण पर झुकी हुयी। हाथ या वॉकर से लटकी घरेलु आवश्यकता के शॉपिंग की एक थैली।
कभी दो अति वृद्ध पुरुष – एक वॉकर पर, दूसरा उसको सहारा देते हुए मिल जाते है। सप्ताह में एक बार उनसे सामना हो जाता है। एक ही समय पर एक दिशा में सड़क पार करते हुए। पता नहीं कहाँ से आ रहे है, कहाँ जा रहे है।
फिर एक दिन एक अति वृद्ध, लेकिन अति धनाढ्य पुरुष, सूट-टाई, इस्त्री की गयी कड़क श्वेत शर्ट पहने हुए चल रहे थे। उनको दो सूटेड-बूटेड बॉडीगार्ड ने कंधो से सहारा दे रखा था। वृद्ध सज्जन का अभिमान, उनका गौरवशाली, समृद्ध जीवन उन्हें छड़ी या वॉकर के सहारे चलने से रोक रहा था।
सहारा उन दोनों बुजुर्गो को चाहिए था। एक को उनका मित्र या पारिवारिक सदस्य सहारा दे रहा था।
दूसरे को उनका धन एवं बॉडीगार्ड।
यही जीवन है।

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