Home विषयइतिहास युवाओं को दिशा देती है भगत सिंह की जिंदगी

युवाओं को दिशा देती है भगत सिंह की जिंदगी

by Praarabdh Desk
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शहीद भगत सिंह और भगवती चरण वोहरा ने नौजवानों और विद्यार्थियों को संगठित करने के प्रयास 1926 से ही आरंभ कर दिए थे। अमृतसर में 11,12,13 अप्रैल 1928 को हुए नौजवान भारत सभा के सम्मेलन के लिए तैयार किए गए नौजवान भारत सभा के घोषणा-पत्र का लिखा कुछ अंश है।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के भारत में ही दीवाने नहीं है बल्कि आज भी सरहद पार कई देशों में उनके बहादुरी के कसीदे पड़े जाते हैं

शहीद भगत सिंह और भगवती चरण वोहरा ने नौजवानों और विद्यार्थियों को संगठित करने के प्रयास 1926 से ही आरंभ कर दिए थे। अमृतसर में 11,12,13 अप्रैल 1928 को हुए नौजवान भारत सभा के सम्मेलन के लिए तैयार किए गए नौजवान भारत सभा के घोषणा-पत्र का नीचे लिखा कुछ अंश है।

 

भगत सिंह इस सभा के महासचिव और भगवतीचरण वोहरा प्रचार सचिव बने थे। नौजवान दोस्तों, इतनी बड़ी लड़ाई में अपने आप को अकेला पाकर हताश मत होना। अपनी शक्ति को पहचानो। अपने ऊपर भरोसा करो। सफलता आपकी है। धनहीन, निस्साहय एवं साधन हीन अवस्था में भाग्य आजमाने के लिए अपने पुत्र को घर से बाहर भेजते समय जेम्स गैरीबाल्डी की महान जननी ने उससे जो शब्द कहे थे (उन्हें) याद रखो उसने कहा, दस में से नौ बार एक नौजवान के साथ जो सबसे अच्छी घटना हो सकती है वह यह है कि उसे जहाज की छत पर से समुद्र में फेंक दिया जाए ताकि वह तैरकर या डूबकर स्वयं अपना रास्ता तय करें।” प्रणाम है उस मां को, जिसने यह शब्द कहे और प्रणाम है उन लोगों को जो इन शब्दों पर अमल करेंगे।

तत्कालीन परिस्थितियां बेशक विपरीत थी, लेकिन भगत सिंह देश के युवाओं को भविष्य के लिए क्रान्ति की तलवार को धार दे रहे थे। 28 सितंबर 1907 में पंजाब के बंगा गांव में भारत के उस शेर ने जन्म लिया जिसे दुनिया ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह के नाम से पहचाना। भारत के इस वीर सपूत ने दुनिया को क्रांति और शहादत की राह पर मुस्कुराते, स्वतंत्रता के गीत गाते हुए चलने की राह दिखाई।

बिरले ही जन्म लेते हैं ऐसे लोग जिनकी सोच समय से भी तेज रफ़्तार में आगे बढ़ती है। जिनका चिंतन और दूर दृष्टि संसार को अचंभित कर डाले। कहने को तो शहीद ए आजम भगत सिंह को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी की सजा दी लेकिन वास्तव में 23 मार्च का दिन शहीद-ए-आजम भगत सिंह का अनेकों रूपों के जन्म लेने का दिन था। वो कभी मरे ही नही या यूं कहें भगत सिंह को जो समाप्त कर सके ऐसा फांसी का फंदा, ऐसा हथियार अंग्रेजी हुकूमत बना ही न सकी।

वे भारत में हर भारतीय नौजवान में जी उठे। शरीर नष्ट होने से विचार नहीं मरा करते। शहीद-ए-आजम की शहादत ने यह साबित किया, वो आज भी जिंदा हैं। भारत के हर नौजवान के जोश में, जज्बे में, वतन पर मर मिटने वाले उन असंख्य युवाओं के फौलादी इरादों में, जिनके आगे दुश्मनों के नापाक इरादे आज भी पस्त हो जाते हैं। भगत सिंह भारत के युवाओं के हाथों में क्रान्ति की मशाल थमा यकीनन आज भी जिंदा हैं। 

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के भारत में ही दीवाने नहीं है बल्कि आज भी सरहद पार कई देशों में उनके बहादुरी के कसीदे पड़े जाते हैं। दुनिया में कम ही लोग होते हैं जो हर शख्स की आंखों का तारा और दिलो पर बादशाहत कायम करने में कामयाब होता है लेकिन भगत सिंह उन रियल लाइफ हीरोज की फ़ेहरिस्त के सबसे आगे हैं।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की ओर से जेल से भेजा गया एक पत्र जो 19 अक्टूबर 1929 को पंजाब छात्र संघ, लाहौर के दूसरे अधिवेशन में जिसके सभापति सुभाष चन्द्र बोस थे, उस सभा में सुनाया गया। जिसके शब्द आज भी युवाओं को नसीहत है।
“इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वह बम और पिस्तौल उठाएं आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम है आने वाले लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस देश की आजादी की लड़ाई के लिए जबरदस्त लड़ाई की घोषणा करने वाली है। राष्ट्रीय इतिहास के इस कठिन क्षणों में नौजवानों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ेगी। यह सच है कि स्वतंत्रता के इस युद्ध में अग्रिम मोर्चो पर विद्यार्थियों ने मौत से टक्कर ली है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिचाएंगे?

नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने कोने में पहुंचाना है। फैक्ट्री कारखाने के क्षेत्र में, गंदी बस्तियों और गांव की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असंभव हो जाएगा।

पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी जिम्मेदारी युवा वर्ग पर ही है। आज वे देश के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और शहीद यतींद्रनाथ दास के महान बलिदान से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें की स्वतंत्रता के इस संघर्ष में वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं।”

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