Home विषयलेखक के विचार 80 के दशक में बड़े होते हुए लोग

80 के दशक में बड़े होते हुए लोग

Nitin Tripathi

by Nitin Tripathi
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अस्सी के दसक में बड़े होते हुवे बचपन में विश्व के बारे में जो सोचते समझते थे वह पूरी तरह से रूस की प्रोपोगंदा मैगज़ीन सोवियत से प्रभावित था.
उस मैगज़ीन को पढ़ लगता था पूरी दुनिया में कोई एक देश है तो वह है USSR. फ़िर उसके पश्चात दूसरे नम्बर का देश है भारत. भारत की प्रधान मंत्री इंदिरा विश्व की सबसे बड़ी नेता हैं. अमेरिका, इंग्लैंड आदि खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे में रूस से लड़ाई कर भारत के टक्कर में आने का प्लान कर रहे हैं.
स्कूल तक में यह बताया जाता था कि अमेरिका इंग्लैंड आदि को अगर भारत गेहूं न दे तो वो भूखों मर जाए. ये सब देश उधार का घी पीते हैं. भारत वासी मेहनत से कमाते हैं बचा कर रखते हैं, अंग्रेज उधार लेकर सब उड़ा देते हैं.
यक़ीन मानिए जब नब्बे में बड़े हुवे और दुनिया देखने का अपना नज़रिया आया तो वाक़ई दिल टूट गया. सबसे बड़ा झटका तो इसी बात का लगा कि इकलौती चीज़ जिसका घमंड था कि हम अमेरिका को खिलाते हैं, हक़ीक़त में ये था कि अमेरिका गेहूं न भेजे तो भारत में भुखमरी फैल जाए. भारत की इकॉनमी पाकिस्तान से भी बुरी थी. वर्ल्ड बैंक से लेकर ऐसा कोई ऑर्गनिज़ेशन न होगा जहां से हम लोन न लेते हों और लोन नहीं बल्कि ग़रीबों वाली सब्सिडी. लोन का तो ब्याज तक खैर हम चुकता ही नहीं कर पा रहे थे. हॉलीवुड मूवीज़ में दिखाया जाता कि बच्चों को उनकी माँ कहती है खाना पूरा फ़िनिश करो तुम्हें पता नहीं इंडिया में बच्चों को खाना नहीं मिलता है. कोई भी भारतीय किसी विदेशी फ़िल्म में होगा तो नौकर या टैक्सी ड्राइवर होगा. भारत आधारित फ़िल्म होगी तो उसमें बीच बीच में अपील होगी कि भारत में लोग भूख बीमारी से मर रहे हैं, उनकी मदद करो.
और करेले पे नीम चढ़ा यह कि जिस USSR के सपने देख हमारा बचपन बीता उसका हाल भी अंदर से हमारे जैसा ही था. हालत इतने ख़राब थे कि रसिया के उपग्रहों पर पिज़ा हट अपना लोगों छपवाने लगा था केवल एक मिलियन डालर विज्ञापन फ़ी में. इतना पैसा वह स्कूल लेवेल के खिलाड़ियों कोऐसे ही बाँट देते थे.
भारत की क्रेडिबिलिटी इतनी डाउन थी कि एक रुपया कोई देश उधार देने को तैयार न था. ये था कि भारत के विदेशी दूतावास बेंच कर विदेशी देश अपने लोन की किस्त वसूलेंगे. भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था बस कुछ महीनों की तनखवाहें बाँटने के लिए.
वह दिन और आज का दिन. भारत की स्थिति पहले से काफ़ी बेहतर है. आज पाकिस्तान भारत के सामने कहीं नहीं टिकता. भारत विश्व गुरु नहीं पर हाँ इस लेवल पर ज़रूर है कि अब इसे इग्नोर नहीं कर सकते. पहले जिन सब्सिडी के लिए भारत अमेरिका के चक्कर लगाता था अब भारत स्वयं उन्हें छोड़ने लगा है. अग़ल बग़ल के वह देश जहां समय ख़राब चल रहा है भारत एक दो बिलियन डालर बाँट देता है अब.
और यह सब आया तब जब भारत ने साम्यवाद छोड़ ओपन मार्केट की शरण ली. पहले अपना पेट भरा और अब दुनिया की मदद कर रहा है.
यद्यपि आप आज भी कई लोगों को पाएँगे जिनके दिल उसी समय, उसी रूस, उसी साम्यवादी व्यवस्था के लिए धड़कते हैं. पूर्व में हुआ बलात्कार भी दसकों पश्चात प्रेम की अभिव्यक्ति लगता है.

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