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भारतीय इतिहास लिखने में बेहद कमजोर -वी एस नायपॉल

Rajeev Mishra

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सर वी एस नायपॉल का एक इंटरव्यू सुना था जिसमें उन्होने कहा कि हम भारतीय इतिहास लिखने में बहुत कमजोर रहे हैं. हमारी इतनी पुरानी सभ्यता है लेकिन इसका कोई प्रामाणिक इतिहास नहीं लिखा गया. लेकिन इतिहास नहीं लिखा गया इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई इतिहास है ही नहीं. हमारा इतिहास हमारी पौराणिक कथाओं में, हमारे रामायण और महाभारत में छुपा हुआ है. उसके ऊपर आस्था और संस्कृति की अनेक परतें चढ़ गई हैं.

लेकिन सर नायपॉल ने, जिन्होंने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में जाकर वहां की मूल सभ्यताओं के इतिहास को इतना कुरेदा, उन्होंने भी पुराणों, रामायण या महाभारत में दबे हिंदू सभ्यता के इतिहास की इन परतों को नहीं छुआ. उन्होंने इस्लामिक अक्रांताओं के अत्याचारों और नरसंहारों के नीचे दबे इतिहास को अवश्य छुआ और उससे अपने इतिहास को निकालने और उससे आंखें मिलाने की आवश्यकता पर अवश्य बल दिया, पर आस्था की परतों को नहीं छुआ.

दूसरे एक मॉडर्न मनीषी हैं, श्री राजीव मल्होत्रा. उन्होंने अपनी पुस्तक “Being Different” में कुछ इन शब्दों में हिंदू धर्म और अब्राहमिक रिलीजन का अंतर बताया है : अब्राहमिक रिलीजन इतिहास केंद्रित (History-centric) हैं. क्रिश्चियनिटी इसलिए एक्सिस्ट करती है क्योंकि जीसस का होना एक ऐतिहासिक घटना मानी जाती है. अगर जीसस का वर्जिन बर्थ, उनका सर्मन ऑन द माउंट, उनका सूली पर चढ़ना और उनका पुनर्जन्म एक ऐतिहासिक तथ्य नहीं था यह सिद्ध हो जाए तो क्रिश्चियनिटी का अस्तित्व नहीं रहेगा. ऐसा ही इस्लाम में प्रॉफेट से जुड़ी घटनाएं और कुरान का फरिश्ते द्वारा दिया जाना है…इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का अस्तित्व इन घटनाओं की ऐतिहासिक सत्यता पर निर्भर है. वहीं हिन्दू धर्म विचार केंद्रित (idea centric) है. राम और कृष्ण कब हुए थे, सचमुच हुए थे या नहीं हुए थे, हमारा धर्म उसपर निर्भर ही नहीं है. राम के चरित्र का हमारा जो विचार है वह अपने आप में उतना ही सत्य है जितना राम का ऐतिहासिक रूप में अस्तित्व. हमने उनके जिस चरित्र को आदर्श माना, उतना भर ही काफी है.

ऐसे में भाई देवेन्द्र सिकरवार का हिन्दू पौराणिक कथाओं को इतिहास की दृष्टि से देखना एक बौद्धिक साहस का काम है. दुर्भाग्य से वह पुस्तक मैंने अभी तक नहीं पढ़ी है, इसलिए उसके कथ्य पर विस्तृत चर्चा करने की स्थिति में नहीं हूं, पर अभी तक किसी भी कोने से पुस्तक के कथ्य पर कोई सार्थक चर्चा दिख भी नहीं रही. कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो पुस्तक को पढ़कर उसपर प्रतिक्रिया दे रहा हो. या तो शंकराचार्य वाले प्रकरण पर उत्पन्न व्यक्तिगत कुंठा है, या फिर छिटपुट बिखरे स्क्रीन शॉट्स से उत्पन्न क्षोभ की अभिव्यक्ति है. जो समर्थन है वह भी या तो व्यक्तिगत संबंधों का समर्थन है, या फिर लेखकीय स्वतंत्रता के अधिकार का.

फिर भी, पुस्तक के मूल उद्देश्य के बारे में मुझे जितना समझ में आया उसे मैंने अपने बेटे के सामने रखा, क्योंकि मेरा मानना है कि हमारे समस्त लेखकीय प्रयासों का कुल बौद्धिक मूल्य बस उतना ही है जितना कि अगली पीढ़ी देने को तैयार हो. बेटे को बताया कि मेरे एक मित्र ने हमारे पौराणिक चरित्रों के ऐतिहासिक मूल्यांकन का प्रयास करके एक पुस्तक लिखी है (आशा है, यह इस पुस्तक के उद्देश्य का सही चित्रण होगा)…ऐसे एक प्रयास के बारे में तुम्हें क्या कहना है?

बेटे ने कहा – उससे बड़ा प्रश्न है कि यह करना भी क्यों है? ऐसा करने में कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि वह चीज छूट जायेगी जो अधिक महत्व की है?
मान लो, अगर मैं अपनी पीढ़ी का एक ऐसा व्यक्ति होता जो अपनी हिंदू पहचान के प्रति निरपेक्ष होता और ऐसी एक पुस्तक पढ़ता जो इन्हें ऐतिहासिक चरित्र की तरह देखती है तो क्या सोचता? हिन्दू इतिहास की क्या छवि बनाता? मुझे बस इतना ही लगता कि यह भी क्रिश्चियनिटी का एक और ही वर्जन है. जबकि आज जब मैं राम या कृष्ण को एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के बजाय एक चरित्र की तरह देखता हूं तो उसमें से काम की बात निकाल पाता हूं कि व्यक्ति का आदर्श कैसा होना चाहिए. कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐतिहासिकता के स्टैंडर्ड पर उतर कर हम अपने आपको अब्राहमिक रिलीजंस द्वारा स्थापित उनके मापदंडों पर सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हों?

यह पुस्तक इस रूप में लिखी जानी चाहिए थी या नहीं, यह एक ऐसा प्रश्न है जिसे इस प्रयास की उपयोगिता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. ना कि इस दृष्टि से कि यह एक अनाधिकार चेष्टा है और इसका अधिकार एक सीमित प्रिविलेज है.

जैसे लेखक को लिखने का अधिकार है वैसे ही पाठक को आलोचना का अधिकार है. एक पुस्तक की आलोचना उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. इसका अर्थ यह हुआ कि पुस्तक विमर्श का विषय निर्धारित कर रही है. पर विमर्श होना चाहिए, शोर नहीं. विमर्श यह होना चाहिए कि हमें अपना इतिहास कहां खोजना है, उसे किस रूप में रखना है? क्या हमारे पुराणों को ऐतिहासिक प्रामाणिकता के मॉडर्न स्टैंडर्ड्स पर रखना वांछित या संभव है? आइडियाज को डिस्कस किया जाना चाहिए, डिफेंड या अटैक नहीं. और जिनकी रुचि आइडिया के बजाय व्यक्ति को डिस्कस करने में होती है उनके बारे में पहले भी स्पष्टता से कहा जा चुका है, फिर से क्या कहा जाए?

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