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जब दंगे होना आम बात होती थी

रंजना सिंह

by रंजना सिंह
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बात उन दिनों की है जब देशभर में छोटे बड़े दंगे होते रहना आम बात थी।चूँकि सत्ता उनके हाथों थी जिन्होंने धर्म के आधार पर देश विभाजन होने के बाद भी जबरदस्ती संविधान में “सेक्युलर” शब्द जोड़कर अपने दुलरूओं को स्पष्ट सन्देश दे दिया था जिसके बल पर वे पूरे धौंस के साथ ऐलान करते थे कि “लड़ के लिया है पापिस्तान, हँस के लेंगे बाकिस्थान”…तो बरसों उनके उत्पातों को अघोषित रूप से यही ठहराया गया कि देश के संसाधनों पर ही नहीं,विध्वंसों पर भी उन्हें पूरी छूट/पहला अधिकार है।

ये जहाँ कहीं भी गाँव या शहर में बसते हैं,झुण्ड बनाकर गलियों को इतना संकरा बनाकर बसते हैं कि जब भी ये चाहें चारों ओर सहज ही पसर सकें,पर पुलिसबल या इनके विरोधी यदि भीड़ में चाहें भी तो इनकी गलियों में समूह रूप में न घुस पाएँ।और जैसे ही कतार में कोई गलियों में घुसे तो ये चारों तरफ से पत्थर गोली बरसा कर भारी क्षति पहुँचाएँ,उन्हें पलायन को विवश कर दें।

छोटे मोटे घावों के अतिरिक्त उस शहर में भी 70 की दशक में इन्होंने खूब ताण्डव मचाया और भारी तबाही की थी।एक तरह से यह कहें कि ये निर्भीक और निश्चिन्त थे कि ये कुछ भी करेंगे,इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।लेकिन इस अव्यवस्था से ऊबकर 90 के दशक में शहर की वह सबसे बड़ी प्राइवेट संस्थान जिनके दिए कर से पूरे प्रदेश का 50% खर्चा चलता था,उन्होंने सत्तासीन सेकुलड़ी सरकार को धमकी दी कि, या तो वे मनबढुओं (दंगेबाज़ और रंगबाजी हत्या वाले गुण्डे माफिया)को नियंत्रित करें न तो वे अपनी हानि की चिंता किये बिना अपना सारा कारोबार समेट कर किसी दूसरे राज्य में हो लेंगे।

तब हाथ खोलकर एक आईपीएस को उस शहर में भेजा गया और उन्होंने मात्र 2 वर्ष में लोगों को बता दिया कि लॉ एंड ऑर्डर क्या होता है।आधे से अधिक अपराधी मारे गए और बाकी बचे ऐसे भूमिगत हुए कि उस एसपी के वहाँ से चले जाने के बाद भी एक दशक तक किसी की हिम्मत डॉन बनने या दंगा पसारने की हुई।

इधर पिछली घटनाओं को बचपन में किस्से कहानियों की तरह सुनकर बड़ी हुई युवा पीढ़ी ने भी यह चिन्तन मनन किया कि संख्या में इतने अधिक होने के बाद भी मुट्ठी भर विध्वंसकों से उनके लुट पिट जाने का कारण क्या था और इसका निदान क्या होना चाहिए।

अच्छा, इनकी एक सबसे बड़ी बात है कि यदि ये पीट पाए तो इनके द्वारा उत्पात उग्र से उग्रतर होकर बहुत जल्दी जल्दी दुहराया जाता है, किन्तु यदि ये पिट गए,ठीक ठाक क्षति उठाई तो लम्बे समय तक ठण्डे रहते हैं।

तो ठीक ठाक अन्तराल के बाद इनका जोश उफान पर आया और इन्होंने उक्त शहर में अपने इलाके के निकट एक हनुमान मंदिर पर आक्रमण कर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया।पूरे शहर में सनसनी फैल गयी और लगभग सुनिश्चित हो गया कि अब दंगा होगा ही होगा।

किन्तु इसबार हिनू युवा वाहिनी ने पुलिस थाने की मुँहदेखी नहीं की।उत्पतियों को खबर भिजवाया कि 12 घण्टे के अन्दर जिन्होंने यह काण्ड किया है,उनको इन्हें सौंप दें अन्यथा पूरा मुहल्ला कीमत चुकाने को तैयार रहे।

जोश की उफान में बुलबुलों पर तैर रहे कौम ने सोचा, क्या कर लेंगे ये हिनू।हद से हद पुलिस नेता के पास जाकर रोयेंगे,गिड़गिड़ाऐंगे कि हमारा इंसाफ करो।सो उन्होंने उत्तर में सर तन से जुदा टाइप धमकी दे डाली।

हिंनु युवा समूह यह जानता था कि वे लोग यही करेंगे।सो इन बारह घण्टे में इन्होंने विधायक मन्त्री को विश्वास में लिया और उनसे यही आग्रह किया कि रैफ या ऐसा ही कुछ जो उन्हें उतारना है,वह तब उतारें जब ये उन्हें सबक सिखा चुके होंगे।साथ ही इन्होंने यह वचन भी दिया कि अपनी तरफ से ये जन हानि कतई नहीं करेंगे।

इसके उपरांत वाहिनी ने यह भी पता लगा लिया कि कौन कौन जोशीले इसमें इन्वॉल्व थे और उन्हें उकसाने और रक्षा करने वाले उनके कौम से कौन कौन थे,,,,और बस सबके दुकान और घर चिन्हित कर लिए गए।उनके यहाँ यह खबर पहुँचा दी गयी कि इनलोगों की तैयारी इतनी तगड़ी है कि अगर कोई सामने पड़ा तो राख कर दिया जाएगा।बाहर घण्टे की अवधि इधर समाप्त हुई और चुन चुन कर सभी चिन्हित घर और दुकान जला दिए गए।

हर बार रोते पीटते हिनू थाना पुलिस करते थे,,इसबार ये भागते हुए पहुँचे कि हमें बचाओ।इसके बाद इलाके में रैफ उतारी गयी।युवा ब्रिगेड का काम समाप्त हो चुका था,इसलिए वे भी अपने अपने घर सोने चले गए कि अब अगर उधर से कोई उत्पात होता भी है तो सरकारी व्यवस्था देख लेगी।कई दिनों तक रैफ डटी रही और भारी आर्थिक क्षति उठाने के बाद उन्हें भी समझ में आ गया कि इतना आसान नहीं भिड़ और जीत जाना।उनके नेताओं ने आगे कोई उत्पात न करने का वादा देकर युवा ब्रिगेड से माफ़ी मांग ली और उनसे वचन ले लिया कि आगे वे उन्हें कोई और नुकसान नहीं पहुँचायेंगे।

समस्या यह है कि हमलोग मलेरिया का इलाज़ पैरासिटामोल देकर करना चाहते हैं,जबकि समाधान चाहिए तो इससे संक्रमितों को कड़वी कुनैन की गोली और मलेरिया वाले मच्छरों पर छिड़काव करके ही समाधान पा सकते हैं।पुचकारने,दूधभात खिलाने से मच्छर नहीं मानेंगे कि इन्होंने हमें इतना दुलारा है तो हम इन्हें काटेंगे नहीं।काटना उनका धर्म है, उनसे हम बचने के उपाय करें,यह हमारा कर्तब्य।

हाँ, एक बताना भूल गयी।यह सबक सिखाने वाला पूरा एपिसोड इसलिए हो सका क्योंकि प्रदेश में उस समय सरकार भाजपा की थी।बाकी आप खुद समझदार हैं कि आत्मरक्षा के लिए हमें किस स्तर पर क्या क्या करना चाहिए।जिसको जिस भाषा में शान्ति पाठ समझ आये,उसी भाषा में समझानी चाहिए।हिंसा हमारा धर्म नहीं,पर आत्मरक्षा परम धर्म है जिसके लिए व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर तैयारी रखनी चाहिए।

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