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क्या मधुमक्खियाँ हिन्दू होती हैं ?

आर ए एम देव

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मधुमक्खियाँ बहुत मेहनत से फूलों से परागकण इकट्ठा करती हैं। उन परागकणों पर, छत्ते में रहती मधुमक्खियाँ प्रक्रिया कर के उसे मधु बनाती हैं। छत्ते में एक ही रानी मक्खी होती है, जो दूसरी को उसके पैदा होते ही मार डालती है।
मधुमक्खियों के पास जहरीला डंख तो होता है और वे शत्रु पर झुंड में हमला भी करती हैं लेकिन उनके पास एक ही तरीका होता है, उससे अलग उन्हें कुछ यहीं आता। उनका शिकार वो ही होता है जो अनवधान से उनको छेड बैठता है। जो लोग उनके छत्ते से मधु निकालने आते हैं वे पूरी सावधानियाँ बरतते हैं, उन्होंने खुद को सही तरीके से ढँक लिया होता है, और अपने हाथ में मशाल लेकर आते हैं। मशाल मधुमक्खियों के लिए ऐसा शस्त्र बन जाता है जिसका उनके पास काट नहीं होता। मनुष्य उनको भगाकर, छत्ता तोड़कर ले जाता है, मधु निकालता है। कई मधुमक्खियाँ मशाल के आग से मर जाती हैं, एकाध उसे काट भी ले तो उसके पास उसकी दवाई भी होती है, वो अपना लक्ष्य पूरा कर ही लेता है।
मधुमक्खियाँ फिर से नया छत्ता बनाती हैं। वहीं या कहीं और ऐसी जगह जहां उन्हें लगता है कि मनुष्य नहीं पहुंचेगा । लेकिन छत्ता जैसे ही भरे हुए मधु के वज़न से लटकाने लगता है, छत्ते के मधु से भरे होने की एडवर्टीजमेन्ट होने लगती है, मनुष्य आने के रास्ते खोज निकालता है अगर छत्ता पर्याप्त बड़ा हो तो। मुश्किल भरा हो तो भी मधु और मोम का लालच उसे खींच लाता है।
और तो और, आज तो और भी बुरे हालात हैं मधुमक्खियों के । मनुष्य ने मधुमक्खी पालन सीख लिया है। खास पिंजरे बना लिए हैं उनके लिए, जहां उनको वे अपनी रेडीमेड कालोनी लगती है। आसपास मनचाहे फूलों की खेती ताकि मधुमक्खियाँ एक ही तरह का मधु लाएँ जिसकी क्वालिटी के अधिक पैसे मिले – मनुष्य को, मधुमक्खी को पैसों से क्या ? क्या मनुष्य ने उसके लिए फूलों की व्यवस्था नहीं की ? क्या उसके लिए रहने की भी सुरक्षित व्यवस्था नहीं की ? मधुमक्खियोंको तो मनुष्यों का आभारी होना चाहिए, मनुष्य के लिए और श्रम कर के उसे फायदा देना चाहिए, क्या नहीं ? ये बात अलग है कि मनुष्य ने यह सब व्यवस्थाएँ अपने स्वार्थ के लिए बनाई हैं, लेकिन फिर भी मधुमक्खियों को उसका आभारी होना चाहिए क्योंकि वो उनको नष्ट नहीं कर रहा। अब मधु निकालने की प्रक्रिया में मधुमक्खियाँ नहीं मरती। अहिंसा परमो धर्म:, क्या नहीं ?
इतने तक तो मधुमक्खियों की ही बात हुई, हिंदुओं की बात कहाँ है ? Well, समानताएँ आप की समझ में न आई हो तो कोई बात नहीं। जितनों को आती हैं, मैं उतनी संख्या से ही खुश हूँ। रही बात मधुमक्खियों की तो उनकी सोच उतनी ही होती है, आप अपनी बताएँ।

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