Home लेखक और लेखदेवेन्द्र सिकरवार परंपरा से मान्यता प्राप्त आचार्य

परंपरा से मान्यता प्राप्त आचार्य

देवेन्द्र सिकरवार

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मुझे बार-बार यह कहा जा रहा है कि मुझे अपनी पुस्तक को ‘परंपरा से मान्यता प्राप्त आचार्यों’ से पूछकर लिखनी चाहिये थी।
कौन हैं ये मान्यता प्राप्त आचार्य?
इस देश में, हिंदुत्व में इतनी परम्पराएं हैं कि उनके आचार्यों की गिनती नहीं।
अगर षट दर्शन को भी मानें तो छः परंपराएं तो यही हो गईं और फिर बाद में इनसे इतर परंपराएं जैसे बौद्ध, जैन जिनका हमारे पौराणिक इतिहास में साझा अतीत है।
तो ये किन ‘मान्यता प्राप्त आचार्यों’ की बात कर रहे हैं?
मैं बताता हूँ।
ये कान को घुमाकर पकड़ रहे हैं।
दरअसल इनका कहना है कि उसी परंपरा के आचार्य मान्यता प्राप्त हैं जो इन घिनौने जन्मनाजातिगतश्रेष्ठतावादी नीचों के जातिवादी अहं को तुष्ट करते हैं।
इनका कहना है कि यही पुराणों की व्याख्या करने को अधिकृत हैं या दूसरे शब्दों में हिंदुत्व इनकी ठेकेदारी है।
अजी हाँ! मेरे ठेंगे से!!
आज तक व्यासपीठ पर मेकअप करके, मटकते, थिरकते, मुजरा करते, वास्तविक पौराणिक इतिहास के स्थान पर मनमाने चमत्कार बतियाकर जनता का $#@% काटकर धर्म का धंधा कर, पवित्र भगवे वस्त्र का अपमान करते इन भांडों पर ये तथाकथित आचार्य कभी बोले?
नहीं ना!
क्यों?
क्योंकि भई, जो भी है जैसे भी हैं, चाहे जितना हिंदुत्व का सत्यानाश कर रहे हों पर हमारे जन्मनाजातिगतश्रेष्ठतावाद को तो चुनौती नहीं देते।
यानि ‘टेढ़ा है पर मेरा है।’
अब आई ‘अनसंग हीरोज- #इंदु_से_सिंधु_तक तो इस जातिवादी वर्ग के पेट में मरोड़ उठने लगी क्योंकि पौराणिक इतिहास की चमत्कारपूर्ण दिव्य व्याख्याओं पर ही तो इनका धंधा टिका है और पुस्तक चमत्कारों से इतर वास्तविक इतिहास का विवरण देती है।
चमत्कार खत्म धंधा खत्म।
चाहे पुट्टपर्थी के साँई हो या वागेश्वर वाले।
पूरा मामला पेट से जुड़ा है कि और कुछ न भी बने पर यह चमत्कार बतियाकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ तो होता ही रहेगा।

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