Home हमारे लेखकनितिन त्रिपाठी इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता

इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता

by Nitin Tripathi
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इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, पर अपने कॉन्सेप्ट क्लीयर होने चाहिए.
2017 में UP वासी होते हुवे केवल यह इच्छा थी कि थोड़ा लॉ ऑर्डर हो जाए, गुंडागर्दी कम हो जाए, शांति रहे. दंगे बंद हों, टोपी वालों का आतंक और अपीजमेंट समाप्त हो जाए, और चूँकि हिंदू वादी थे तो यह भी आकाँक्षा थी कि राम मंदिर बन जाए.
2022 पाँच वर्ष बाद जब देखता हूँ तो लगता ही नहीं कि यह वही UP है. दंगे छोड़िए कोशिश करने वालों की भी रूह काँपती है. गुंडागर्दी कम छोड़िए करने वालों के घर बुल डोजर चल जाते हैं. राम मंदिर तो कब का फ़ाइनल हो गया, काशी का भव्य कारिडोर बन गया, विंध्य्वासिनी माता समेत ढेरों मंदिरों का जीर्णोद्धार हो रहा है और अब मथुरा की बारी है. क़ायदे से 2017 की अपेक्षाएँ देखते हुवे इतना मात्र 10/10 वाला है.
पर बोनस में इधर योगी बाबा हैं. बिजली व्यवस्था इतनी चौकस हुई कि धीमे धीमे जेनरेटर उद्योग समापन की कगार पर है. प्रदेश में पहले जितने अच्छे बस अड्डे होते थे उससे ज़्यादा हवाई अड्डे बना दिए. इक्स्प्रेस वे / रोड नेट्वर्क का जाल बिछ गया. बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र जो कभी बदनाम थे अकाल ग्रस्त थे, वहाँ डिफ़ेंस कारिडोर बन रहा है. कोविड वैक्सीन में रेकर्ड क़ायम किए गए. कोई भी क्षेत्र हो सबमें उत्तर प्रदेश ने प्रगति में नए नए झंडे गाड़े. पाँच वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश गाँवों में यदि जाना होता था रात को तो मैं गनर के साथ ही जाता था. आज अपनी रिवॉल्वर भी लाकर में रखी है ध्यान ही नहीं पिछली बार कब निकाली थी. पहले जहां उत्तर प्रदेश की पहचान केवल ताज थी, आज दसियों ऐतिहासिक स्थल हैं.
व्यक्तिगत कुंठा में कोई कुछ भी कहे मुझे यह कहने में एक प्रतिशत डाउट नहीं कि बीते पाँच वर्षों में उत्तर प्रदेश ने जो अचीव किया वह अकल्पनीय था सोंच भी नहीं सकते थे 2017 में.
सरकार ने जो करना था किया, अब यह हमारे ऊपर है कि हमें कौन सा उत्तर प्रदेश पसंद है. वह वाला जहां सरकार के ख़िलाफ़ पोस्ट करने वालों तक को ज़िंदा जला देते थे या वह वाला उत्तर प्रदेश जहां ऐसा करने वालों की जगह या तो जेल है या भगवान का घर.
निर्णय आपका.

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