Home अमित सिंघल एक यूरिया बोरी की ताकत आधा लीटर बोतल में समा गई है।

एक यूरिया बोरी की ताकत आधा लीटर बोतल में समा गई है।

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प्रधानमंत्री मोदी ने मई अंत में बताया कि यूरिया की आधा लीटर बोतल किसान की एक बोरी यूरिया की जरूरत को पूरा करेगी। इसके कारण जाएगा ट्रांसपोर्टेशन, स्टोरेज, एवं रख-रखाव के व्यय में भारी कमी आएगी जिससे छोटे किसानों को लाभ मिलेगा।
इस यूरिया का पहला प्लांट कलोल (गुजरात) में लगा है जिसकी कैपेसिटी अभी डेढ़ लाख बोतल के उत्पादन की है। लेकिन आने वाले समय में ऐसे 8 और प्लांट देश में लगने वाले हैं। इससे यूरिया पर विदेशी निर्भरता कम होगी, देश का पैसा भी बचेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि भविष्य में अन्य फर्टिलाइजर भी किसानों को मिल सकते हैं और इस दिशा में हमारे वैज्ञानिक उस पर काम कर भी रहे हैं।
भारत फर्टिलाइज़र के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कंज्यूमर है लेकिन उत्पादन के मामले में हम तीसरे नंबर पर है। हम अपनी ज़रूरत का लगभग एक चौथाई इंपोर्ट करते हैं, लेकिन पोटाश और फॉस्फेट के मामले में तो हमें करीब-करीब शतप्रतिशत विदेशों से लाना पड़ता है। ऊपर से 7-8 साल पहले तक हमारे यहां ज्यादातर यूरिया खेत में जाने के बजाय कालाबाज़ारी का शिकार हो जाता था और किसान अपनी ज़रूरत के लिए लाठियां खाने को मजबूर हो जाता था। बड़ी यूरिया की फैक्ट्रियां नई टेक्नॉलॉजी के अभाव में बंद हो गई थीं।
2014 में सरकार बनने के बाद हमने यूरिया की शत-प्रतिशत नीम कोटिंग का बीड़ा उठाया, उसको किया। इससे देश के किसानों को पर्याप्त यूरिया मिलना सुनिश्चत हुआ। साथ ही हमने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना में 5 बंद पड़े खाद के कारखानें को फिर चालू करने का काम शुरु किया। और उसमे यूपी और तेलंगाना की फैक्ट्रियां चालू हो चुकी हैं, उत्पादन हो रहा है। और बाकी भी शीघ्र ही अपना काम करना शुरू कर देंगी।
कोरोना एवं युद्ध के कारण पिछले 2 वर्षो में इंटरनेशनल मार्केट में फर्टिलाइज़र की कीमतें बहुत अधिक बढ़ गईं। लेकिन हर मुश्किल के बावजूद भी हमने देश में फर्टिलाइज़र का कोई बड़ा संकट नहीं आने दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में बताया कि भारत विदेशों से यूरिया मंगाता है उसमें यूरिया का 50 किलो का एक बैग 3500 रुपए का पड़ता है। गांव में किसान को वही यूरिया का बैग केवल 300 रुपए में दिया जाता है। यानि यूरिया के एक बैग पर 3200 रुपए का बोझ सरकार वहन कर रही है।
इसी प्रकार DAP (पोटाश और फॉस्फेट) के 50 किलो के बैग पर पूर्व की सरकार 500 रुपए का भार वहन करती थी। लेकिन मोदी सरकार DAP के 50 किलो के बैग पर 2500 रुपए वहन कर रही है। यानि 12 महीने के भीतर-भीतर हर बैग DAP पर 5 गुणा भार केंद्र सरकार ने अपने ऊपर लिया है।
किसान को दिक्कत ना हो इसके लिए पिछले साल 1 लाख 60 हज़ार करोड़ रुपए की फर्टिलाइजर सब्सिडी केंद्र सरकार ने दी है। किसानों को मिलने वाली ये राहत इस साल लगभग 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा होने वाली है।
लेकिन क्या हम 21वीं सदी में अपने किसानों को सिर्फ विदेशी परिस्थितियों पर निर्भर रख सकते हैं? हर साल ये जो लाखों करोड़ रुपए केंद्र सरकार खर्च कर रही है, ये विदेश क्यों जाएं? क्या ये भारत के किसानों के काम नहीं आना चाहिए? महंगे फर्टिलाइज़र से किसानों की बढ़ती लागत को कम करने का कोई स्थाई सामाधान क्या हमें नहीं ढूंढना चाहिए?
पहले सिर्फ तात्कालिक समस्या का ही समाधान तलाशा गया, आगे वो परिस्थितियां ना आएं इसके लिए बहुत सीमित प्रयास हुए। बीते 8 सालों में हमने तात्कालिक उपाय भी किए हैं और समस्याओं के स्थाई समाधान भी खोजे हैं। खाद्य तेल की समस्या कम से कम हो, इसके लिए मिशन ऑयल पाम पर काम चल रहा है। कच्चे तेल पर विदेशी निर्भरता कम करनी है, इसके लिए बायोफ्यूल्स, ग्रीन हाईड्रोजन और दूसरे उपायों पर आज बड़े स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। नैनो (लिक्विड खाद) टेक्नॉलॉजी पर व्यापक निवेश भी इसी अप्रोच का परिणाम है। इसी प्रकार प्राकृतिक खेती की तरफ किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए जो अभियान देश में चल रहा है, वो भी परमानेंट सोल्यूशन का हिस्सा है।

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