Home विषयजाति धर्म कौन कहता है कि मंदिरों में जाति पूछी जाती है

कौन कहता है कि मंदिरों में जाति पूछी जाती है

by रंजना सिंह
157 views

मैं जानना चाहता हूँ कि कौन कहता है कि मंदिरों में जाति पूछी जाती है?
जाति मंदिरों में नहीं,बल्कि संविधान में पूछी जाती है,
सरकारी नौकरी,आरक्षण में पूछी जाती हैं।राशन, स्कॉलरशिप और हर संस्थान में पूछी जाती है।
फिर कौन हैं जो मंदिरों पर आरोप लगाते हैं?
“ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण और शूद्र का बेटा शूद्र ही रहेगा, यह बात “मनुस्मृति” नहीं,अपितु भारतीय संविधान का “जाति प्रमाण पत्र” कहता है!”
बाकी सनातन धर्म में तो व्यास, वाल्मीकि, रविदास को भी ब्राह्मण तथा संत की श्रेणी में रखा गया है।
वैसे तो ब्राह्मणों ने जातियाँ बनाई नहीं हैं,ये स्वयमेव समय के साथ अपने आप बन गई हैं। किन्तु मान लिया कि उन्होंने ही बनाई हैं, तो इससे लाभ किसका हुआ?
ब्राह्मणों ने पूरा फर्नीचर व्यवसाय बढ़ई को दिया।
रियल सेक्टर कुम्हार को दिया।
लेदर का व्यवसाय चर्मकार को दिया।
डिलीवरी का व्यवसाय भी चर्मकार को दिया।
दूध का व्यवसाय यादव को दिया।
टेक्सटाइल का दर्जी को दिया।
हथियार का व्यवसाय लुहार को दिया।
बर्तन का ठठेरे को दिया ।
पत्तल का बारी को दिया।
चूड़ी व्यवसाय मणिहार को दिया।
मीट का खटीक को दिया।
फूल का माली को दिया।
तेल का व्यवसाय तेली को दिया।
सबको रोजगार मिला और इसी वजह से भारत पूरी दुनिया में सोने की चिड़िया बना था।
इन सारे सम्मानित व्यवसायियों को आज संविधान ने पिछड़ा और अछूत बना दिया है।
क्षत्रियों को वह काम दिया, जिससे युवावस्था में उनकी स्त्रियाँ विधवा और बच्चे अनाथ हो जाते हैं, जो कोई भी नहीं करना चाहेगा।
और अपने लिए उन्होंने भिक्षा माँगना,पूजापाठ कर्मकांड निष्पादन और अध्यापन का कार्य रखा।
तथाकथित उच्च और सक्षम कहे जाने वाले क्षत्रियों के हिस्से में बलिदान आया और स्वयं ब्राह्मणों के हिस्से में भिक्षाटन आया! तो फिर जाति-व्यवस्था ने अन्याय कैसे किया?

Related Articles

Leave a Comment