Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय नया संपादक मुख्यमंत्री का सिफ़ारिशी था।

नया संपादक मुख्यमंत्री का सिफ़ारिशी था।

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नया संपादक मुख्यमंत्री का सिफ़ारिशी था। मुख्यमंत्री ने उसे संपादक बनाने के लिए कई लाख रुपए विज्ञापन के मद में एडवांस सूचना विभाग से अख़बार को दिलवा दिए। मुख्यमंत्री कांग्रेसी था पर संपादक भाजपाई भेजा उस ने। जातीय गणित के तहत! लेकिन यह चर्चा भी जल्दी ही थम गई। नया संपादक रिपोर्टर से सीधे संपादक बना था। दलाली और लायज़निंग में बेहद एक्सपर्ट। अख़बार मालिक के कई छोटे बड़े काम उस ने करवाए। एम.डी., चेयरमैन सभी प्रसन्न। हालां कि अख़बार में फ़र्ज़ी और प्रायोजित ख़बरों की बाढ़ आ गई थी। एक प्रतिद्वंद्वी अख़बार में एक नया आया संपादक जो अपने अख़बार का लगभग सर्वेसर्वा बन कर आया था, हाकर स्ट्रेटजी में लग गया। सुबह-सुबह हाकरों को वह शराब बांटता, घड़ी, पंखा से लगायत मोटरसाइकिल तक इंसेंटिव में देता। और फिर भी जो हाकर नहीं मानता उस की कुटाई करवा देता। हाथ पैर तुड़वा देता। नतीजा सामने था, वह अख़बार आगे जा रहा था, बाक़ी पीछे। आज़ाद भारत तो बहुत ही पीछे। लाटरियां बंद हो गईं थीं सो उन के परिणाम भी कहां छपते? टेंडर नोटिस में भी आज़ाद भारत की मोनोपोली टूट चुकी थी। लोकल सिनेमा के विज्ञापन अब प्रतिद्वंद्वी अख़बारों में भी थे। प्रतिद्वंद्वी अख़बार का नया संपादक आज़ाद भारत का न सिर्फ़ सर्कुलेशन छीन रहा था बल्कि विज्ञापन भी छीन रहा था। अख़बारों में यह संपादक एक ऐसा सवेरा उगा रहा था जिस सवेरे में सूरज नहीं था। उजाला नहीं था, अंधेरा था। लगता था जैसे हर सुबह एक सूर्यग्रहण लग जाता था। अपने अख़बार के संपादकीय विभाग में भी उस की गुंडई तारी थी। वह जिस को चाहता गालियां देता, जिस को चाहता थप्पड़ मारता, जिस को चाहता लात मार देता। कभी चूतड़ पर तो कभी मुंह पर। और जो यह सब नहीं स्वीकार करता उस के पेट पर लात मार देता। जिस महिला सहयोगी को वह चाहता अपनी रखैल बना लेता। कहीं कोई चीत्कार या अस्वीकार नहीं। लोग उस को भइया कहते और वह सब की मइया…….करता!

अजब था।

अजब यह भी था कि कहीं किसी स्तर पर इस का प्रतिरोध नहीं था। न भीतर, न बाहर। भइया नाम के इस संपादक की गुंडई की चहुं ओर स्वीकृति पर सुनील जैसे कुछ लोग शर्मशार थे। पर बंद कमरों में। बाहर प्रतिरोध की हिम्मत उन में भी नहीं थी।

यह वही दिन थे जब अख़बारों में स्ट्रिंगर्स और संवाद सूत्र की फ़ौज खड़ी हो रही थी। पहले के दिनों में अख़बारों में अप्रेंटिस आते थे। साल छः महीने या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल में ट्रेनिंग पूरी कर वह उप संपादक या स्टाफ़ रिपोर्टर बन जाते। पर अब वह स्ट्रिंगर बन रहे थे, संवाद सूत्र बन रहे थे। भइया का पैर छू कर यह संवाद सूत्र और स्ट्रिंगर का छूत बाक़ी अख़बारों में भी पांव पसार रहा था। शोषण की एक नई नींव रखी जा रही थी, नई इबारत लिखी जा रही थी, एक नई चौहद्दी बनाई जा रही थी। जिस पर किसी यूनियन, किसी जर्नलिस्ट फ़ेडरेशन, किसी जर्नलिस्ट एसोसिएशन या किसी प्रेस काउंसिल को रत्ती भर भी ऐतराज़ नहीं था।

यह क्या था?

ख़ैर, इन्हीं दिनों आज़ाद भारत के सहयोगी प्रकाशन अंगरेज़ी अख़बार के सवा सौ साल पूरे हो रहे थे। सो तय हुआ कि यह एक सौ पचीसवीं जयंती समारोह पूर्वक मनाई जाए। अख़बार के दलाल संपादक ने वाया मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री से टाइम लेने की ज़िम्मेदारी ले ली। और यह लीजिए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने टाइम दे दिया। दिल्ली के विज्ञान भवन में समारोह पूर्वक अंगरेज़ी अख़बार की एक सौ पचीसवीं जयंती मनाई गई। अख़बार मालिक ने मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाया। प्रधानमंत्री से मेल मुलाक़ात का। दो केमिकल फै़क्ट्रियों का लाइसेंस ले लिया। फ़टाफ़ट। प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्रा में पत्रकारों की टीम में अपनी जगह फ़िक्स की। और उस विदेश यात्रा में भी दो फै़क्ट्रियों के लाइसेंस जुगाड़ लिए।

अब सवाल था कि इन फ़ैक्ट्रियों को लगाने की पूंजी कहां से आए? कभी देश के औद्योगिक जगत में पांचवें नंबर पर गिने जाने वाले इस व्यावसायिक मारवाड़ी परिवार ने जो अब शहर में भी पांचवें नंबर के पैसे वालों में नहीं रह गया था, इस अख़बार और इस की बिल्डिंग से ही लागत पूंजी निकालने की तरकीब निकाली।

आलम यह था कि बोफ़ोर्स की बाढ़ में राजीव गांधी की सरकार बह चुकी थी और मंडल कमंडल की आंच में वी.पी. सिंह सरकार ध्वस्त हो गई थी।

चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व में जीप वाली पार्टी कांग्रेस के ट्रक को खींच रही थी। फ़ैक्ट्रियों के लाइसेंस डूबते दिख रहे थे। अंततः कांग्रेस में एक खे़मा सक्रिय हुआ। और उन दिनों देश के औद्योगिक जगत में पांचवें नंबर पर उपस्थित एक उद्योग घराने ने दोनों अख़बार और अख़बार की नई बन रही बिल्डिंग को कांग्रेस के इशारे पर ख़रीद लिया। यह संयोग भी अजब था कि जो घराना इस अख़बार और कंपनी को बेच रहा था उस ने भी जब इस कंपनी और अख़बार को ख़रीदा था तब देश के औद्योगिक जगत में पांचवें नंबर पर था। और अब नया ख़रीददार भी उसी पायदान पर था। यह अख़बार और यह कंपनी अपने को चौथी बार बिकते पा रहे थे। कभी अंगरेज़ों का रहा यह अख़बार जिस में कभी चर्चिल जैसों ने काम किया था जो बाद में इंगलैंड के प्रधानमंत्री बने थे, अपने सौभाग्य पर एक बार फिर मुसकुरा रहा था। हालां कि तजु़र्बेकार आंखें इसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य मान रही थीं, इस अख़बार का। पर अभी होशियार टिप्पणीकार कुछ भी कहना जल्दबाज़ी बता रहे थे। गोया दिल्ली भी दूर थी और लंका भी!

अभी तो उस व्यावसायिक घराने के प्रताप के चर्चे थे। काग़ज, शराब और अन्य तमाम मिलों के अलावा शिपिंग कंपनी भी इस घराने के पास थी। सो कितने पानी के जहाज़ हैं इस कंपनी के पास, इस के भी चर्चे थे। इस व्यावसायिक घराने का चेयरमैन पंजाबी था और कुंवारा था। जब कि पिछला घराना मारवाड़ी था। पिछले घराने का चेयरमैन बाल बच्चेदार था। कभी उस की भी तमाम काटन और चीनी मिलें थीं। पर नया चेयरमैन जल्दी ही फ़ेरा क़ानून में पकड़ा गया था, यह ख़बरें भी चलीं। और कि कैसे इस ने क़ानून को तब ख़रीद लिया था, यह चर्चा भी चली। राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस उद्योगपति को राजीव के विरोध के बावजूद फ़ेरा का़नून में गिऱतार करवाया था। इस उद्योगपति ने जेल जाने से बचने के लिए तब पानी की तरह पैसा बहाया था। और जैसा कि प्रेमचंद कभी लिख गए थे कि न्याय लक्ष्मी की कठपुतली है, वह जैसे चाहती है वैसे ही यह उठती बैठती है, को सार्थक करते हुए यह उद्योगपति जेल जाते समय रास्ते में रुक कर ज़मानत पा गया था। हुआ यह कि सुप्रीम कोर्ट में लगभग सभी जस्टिसों का दरवाज़ा इस उद्योगपति ने खटखटाया। पर बढ़ते विवाद और वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सक्रियता को देखते हुए किसी जस्टिस की हिम्मत नहीं पड़ी कि इस उद्योगपति को ज़मानत दे कर इसे जेल जाने से बचा सके। पर क़िस्मत कहिए कि संयोग या कुछ और उसी दिन एक जस्टिस महोदय रिटायर हो गए थे। इस उद्योगपति के कारिंदों ने उन से संपर्क किया। वह रिटायर्ड जस्टिस रिस्क लेने को आनन-फ़ानन तैयार हो गए। बस दिक़्क़त यह भर थी कि उस दिन लंच के पहले उन्हों ने कार्य भार से मुक्ति ले ली थी। मामला फंसा कि रिलीव होने से पहले के टाइम में ही वह ज़मानत दे सकते थे। इस के लिए सुप्रीम कोर्ट की तमाम मशीनरी को साधना था। कारिंदों ने सुप्रीम कोर्ट की इस तमाम मशीनरी को पानी की तरह पैसा बहा कर क़दम-क़दम पर ख़रीद लिया। जस्टिस के रिलीव होने के पहले का टाइम दर्ज हुआ, ज़मानत दर्ज हुई। पर तब तक इस उद्योगपति को तिहाड़ जेल रवाना किया जा चुका था। तब मोबाइल का भी ज़माना नहीं था। तो भी सब कुछ मैनेज किया गया और बीच रास्ते ज़मानत का पेपर दिखा कर इस उद्योगपति को जेल जाने से इस के कारिंदों ने रोक लिया। और बाद में जनमोर्चा के दिनों में ‘पैग़ाम उन का/पता तुम्हारा/बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा’ जैसी कविता लिखने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह तब कसमसा कर रह गए थे। पर हाथ मलने के अलावा उन के पास और कोई चारा नहीं था।

और अब यही व्यावसायिक घराना आज़ाद भारत और उस के सहयोगी प्रकाशन अंगरेज़ी अख़बार और इस कंपनी का नया मालिक बन चुका था। कोई पचीस करोड़ के इस सौदे में कांग्रेस के एक राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष टाइप नेता आगे-आगे थे जिन के लिए कहा जाता था कि न खाता न बही केसरी जो कहे वही सही! कांग्रेस का अपना अख़बार नेशनल हेरल्ड और नवजीवन बंद हो चुका था। अब उस को अपने अख़बार की ज़रूरत महसूस हो रही थी कि करवाई जा रही थी जो भी हो यह दोनों अख़बार अब कांग्रेस की जेब में थे। हर्र लगे न फिटकरी के तर्ज़ पर। हालां कि जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद जब कांग्रेस दुबारा सत्ता में लौटी थी तब इंदिरा गांधी से किसी पत्रकार ने नेशनल हेरल्ड और नवजीवन के बारे में पूछा तो उन्हों ने साफ़ कहा था कि, ‘अब जब सभी अख़बार हमारी बात ख़ुद कह रहे हैं तब हमें अपना अख़बार निकालने की ज़रूरत भी कहां है?’ पर नवंबर, 1990 में अयोध्या घटना में जब यू.पी. के लगभग सभी अख़बार हिंदुत्ववादी ख़बरों से लैस दिखे ख़ास कर हिंदी अख़बार तो कांग्रेस को इस की चिंता हुई या करवाई गई जो भी हो सो यह सौदा इसी आड़ में करवाया गया।

तो इस घराने ने यह दोनों अख़बार ख़रीदने के बाद दो लाख रुपए महीने का एक सी.ई.ओ. नियुक्त किया। यू.पी. के किसी अख़बार में तब इतने पैसे वाला मैनेजर एक नई और बड़ी घटना थी। आज़ाद भारत की यूनियन इस फ़ैसले पर भौंचक रह गई। कि क्या इतना पैसा अख़बार के पास है कि इतने मंहगे सी.ई.ओ. का बोझ उठा सके? ऐसे तो कंपनी दो दिन में डूब जाएगी और दोनों अख़बार बंद हो जाएंगे। पर बाद में मैनेजमेंट ने साफ़ किया कि इस सी.ई.ओ. को वेतन अख़बार वाली कंपनी नहीं देगी। उस व्यावसायिक घराने की मूल कंपनी देगी। तो मामला शांत हुआ।

बाद में अंगरेज़ी अख़बार के लिए एक नामी गिरामी, ईमानदार और अंगरेज़ी पत्रकारिता में एक शीर्ष नाम मेहता को एडीटर इन चीफ़ बनाया गया। साथ ही ऐलान हुआ कि मेहता दिल्ली में बैठेंगे और कि इस अंगरेज़ी अख़बार की लांचिंग दिल्ली से भी होगी जो बाद के दिनों में हुई भी। मेहता ने लचक गए अंगरेज़ी अख़बार में प्राण भी फूंके। मेहता हिंदी अख़बार के लिए भी हिंदी के एक शीर्ष और सुलझे पत्रकार को संपादक बना कर लाना चाहते थे पर तब तक पुराने भाजपाई संपादक ने अपने कांग्रेसी संपर्कों को खंगाला और केसरी को साध कर अपने को कांटिन्यू करवा लिया। पर बात ज़्यादा दिनों तक चली नहीं। लायज़निंग में सिद्धहस्त मनमोहन कमल ने बरास्ता केसरी ही अपनी नियुक्ति बतौर प्रधान संपादक करवा ली। मनमोहन कमल मूलतः बिहार के मुंगेर ज़िले के निवासी थे। दत्तक पुत्र थे बनारस के एक परिवार में। बनारस में ही उन की पढ़ाई लिखाई हुई थी। पढ़ाई के दौरान ही उन्हों ने वैश्य परिवार की एक लड़की से प्रेम किया। फिर प्रेम विवाह भी। यह अंतरजातीय विवाह था। मनमोहन कमल की पत्नी के परिवार से एक सज्जन कांग्रेस में थे जो बाद में राज्यपाल भी हुए। मनमोहन कमल ने इन राज्यपाल महोदय के संपर्कों को ले कर कांग्रेस में ढेर सारे संपर्क बनाए। एक हिंदी समाचार एजेंसी के संपादक और महाप्रबंधक बन गए। मनमोहन कमल ने इस समाचार एजेंसी में रहते हुए अपने संपर्कों को और प्रगाढ़ और सुदृढ़ किया। चौतरफ़ा! पर समाचार एजेंसी फिर भी बंद हो गई। फिर वह लखनऊ के एक सांध्य दैनिक के संपादक हो गए। सांध्य दैनिक का कलेवर और कंटेंट दोनों ही बहुत बढ़िया बनाया उन्होंने। अख़बार बहुत अच्छा निकलने के बावजूद बंद हो गया। दरअसल लखनऊ जैसे छोटे शहर में सांध्य दैनिक की बहुत ज़रूरत तब थी भी नहीं। अब वह दिल्ली में एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका के संपादक हो गए। जल्दी ही यह पत्रिका अपना स्वरूप बदल कर साप्ताहिक अख़बार बन गई। यह अख़बार भी मनमोहन कमल ने बहुत अच्छा निकाला। कंटेंट, ले आऊट और तमाम मामलों में बहुत ही आगे हो गया अख़बार। पर कहते हैं कि मनमोहन कमल की औरतबाज़ी के फेर में बंद हो गया। जाने यह मसला गासिप था कि सच पर कहानी यह चली कि इस साप्ताहिक अख़बार में एक लड़की पर मनमोहन कमल रीझ गए। उसे खजुराहो कवर करने का एसाइनमेंट दिया। वह टालती रही और यह दबाव बनाते रहे। अंततः एक दिन इन्होंने दो एयर टिकट खजुराहो के मंगवा लिए और लड़की से कहा कि, ‘चलों मैं भी साथ चलता हूं। तुम्हारी मदद कर दूंगा।’ यह पत्रकार लड़की एक वरिष्ठ आई.ए.एस. की बेटी थी। उस ने अपने पिता को मनमोहन कमल की इस हरकत को बता दिया। वह वरिष्ठ आई.ए.एस. अफ़सर भड़क गया। सीधे अख़बार के मालिकों से बात की। मालिकान वैसे भी अपने हिंदी प्रकाशनों को अच्छी नज़र से नहीं देखते थे, यह अख़बार भी भारी घाटे में था। हिंदी का था ही। सो इस अख़बार को बंद करने का फ़ैसला अनान-फ़ानन हो गया। मनमोहन कमल फिर ख़ाली हो गए।

मनमोहन कमल भले हिंदी के पत्रकार थे पर रहते खूब ठाट-बाट से थे। बिलकुल किसी करोड़पति-अरबपति सेठ की तरह। हरदम सफ़ारी सूट में लकदक सेंट से गमकते हुए। गले में मोटी सी चेन, हाथों की अंगुलियों में अंगूठी। लहसुन, प्याज भले न खाते हों पर पीते स्काच ही थे। मंहगी घड़ी, मंहगी चेन, हीरे की अंगूठी और मंहगे कपड़ों में इत्र में गमकते हुए हिंदी पत्रकार तो क्या पत्रकार भी नहीं दिखते थे। किसी कारपोरेट सेक्टर के सी.ई.ओ. की तरह हमेशा चाक चौबंद! लेकिन महिला प्रेम के लिए भी उन की शोहरत कम नहीं थी। जब समाचार एजेंसी में थे तब भी अपनी पी.ए. से ले कर किसिम-किसिम की महिलाओं के लिए उन का अनुराग, उन की आसक्ति अख़बारी लोगों के बीच सुर्खि़यों में रहती। इस समाचार एजेंसी में उनके पूर्ववर्ती संपादक भी एक सिक्खड़ी पी.ए. पर आसक्त रहे थे। और जब वह यहां से विदा हुए तो भी उसे अपने साप्ताहिक अख़बार में भी ले गए थे। खै़र, मनमोहन कमल ने उन की परंपरा को और संवर्धित किया। और जब वह लखनऊ के सांध्य समाचार में थे तब भी उन के महिला प्रेम के क़िस्से तोता-मैना की कहानी की तरह फैले हुए थे। एक सूचनाधिकारी की पत्नी से उन के संबंधों की आंच अभी लोग ताप ही रहे थे कि लोगों ने उसी सूचनाधिकारी की बेटी से भी उन का नाम जोड़ दिया। वह उन के साथ काम भी कर रही थी। अभी यह सब चल ही रहा था कि एक बैडमिंटन खिलाड़ी के साथ भी यह प्रयासरत हो गए। वहां एक दो राजनीतिक और व्यवसायी पहले से ही लगे पड़े थे। कि तभी इन्हों ने एक मंत्री के खि़लाफ़ बिना नाम लिए उस महिला खिलाड़ी को परेशान करने की ख़बरें छापनी शुरू कर दीं। मंत्री आजिज़ आ गया। बुलाया मनमोहन कमल को अपने घर स्काच की दावत पर। स्काच पिलाई और फिर अख़बारी भाषा में कहें तो जैसा कि कहा जाता है, कमरा बंद कर के ख़ूब जूते भी खिलाए। मनमोहन कमल के एक मुंहलगे रिपोर्टर ने मामला विधान सभा में उठवाने की कोशिश की तो उस मंत्री ने उस रिपोर्टर को विधान सभा के गलियारे में ही दबोच लिया।

मनमोहन कमल के महिला प्रेम के ऐसे अनेक क़िस्से उनसे लिपटे पड़े थे गोया जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग, चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग! उन से उन की आसक्ति और बढ़ती जाती उन का कैरियर और उछाल पाता जाता। कोई उन का कुछ बिगाड़ नहीं पाता। क़िस्मत जैसे उन के लिए हमेशा उन की तरक्क़ी का दरवाज़ा खोले बैठे रहती। मनमोहन कमल की एक बड़ी ख़ासियत यह भी थी कि तमाम हिंदी पत्रकारों की तरह रूढ़ियों, दक़ियानूसी ख़यालों और अभावों में वह नहीं जीते थे। उन की समझ और सोच पर कहीं कोई सवाल नहीं था। भाषा जैसे उन की ग़ुलाम थी।

साहित्य और राजनीति में उनकी समझ और सूचनाएं हमेशा अद्यतन रहतीं। सुनील जैसे लोग मनमोहन कमल की तमाम ख़ामियों के बावजूद उनकी भाषा पर मोहित रहते। तो भी जाने क्यों लोग मानमोहन कमल के लिखे पर चर्चा करने के बजाय उन की महिलाओं और लायज़निंग की ही चर्चा करते। और सच यह भी था कि लगातार जो उन की क़िस्मत का दरवाज़ा खुला रहता तो उन की भाषा या समझ के बूते नहीं बल्कि उन की लायज़निंग में निपुणता के चलते ही खुला रहता।

और अब मेहता की नापसंदगी के बावजूद यही मनमोहन कमल आज़ाद भारत के प्रधान संपादक नियुक्त हो गए थे। बरास्ता केसरी। जिन के लिए तब कहा जाता था न खाता न बही, केसरी जो कहे वही सही। केसरी से एक बार पूछा गया कि ऐसा क्यों कहा जाता है आप के लिए? तो उन्हों ने बताया था कि चूंकि वह कोषाध्यक्ष हैं वर्षों से पार्टी के। सो चुनाव के समय उम्मीदावारों को पोस्टर, पैसा, गाड़ी वग़ैरह की ज़िम्मेदारी प्रकारांतर से उन पर ही रहती है।

तो पहले दौर में तो लगभग सभी उम्मीदवार पोस्टर, पर्चा, पैसा वग़ैरह ले जाते हैं। दूसरे दौर में कई उम्मीदवार यह सब मांगने नहीं आते हैं तो मैं समझ जाता हूं कि पट्ठा चुनाव क्लीयर कट जीत रहा है इस लिए इन सब झंझटों से वह छुट्टी पा कर चुनाव लड़ने में लगा है। उस के पास समय कहां है जो यह सब मांगने आए! दूसरे दौर में भी जो उम्मीदवार यह सब मांगने आता तो उस के मांगने का अंदाज़ भांप लेता हूं। कि कौन सेमीफ़ाइनल तक जाएगा और कौन फ़ाइनल तक। और फिर जो तीसरे दौर में भी पोस्टर पैसा मांगने आ जाता है तो मैं समझ जाता हूं कि यह पट्ठा फ़ुल फे़लियर है। कि इसकी ज़मानत बचनी मुश्किल है तो यह पोस्टर पैसे की माया में पड़ा है। इसी आकलन पर चुनाव परिणाम के पहले ही मैं अपना अनुमान घोषित कर देता हूं कि हमारी पार्टी फ़लां-फ़लां जगह से इतनी सीट ला रही है। जो अमूमन चुनाव परिणाम से मेल खा जाती है। सो मेरी बात सही हो जाती है। और लोग कह बैठते हैं कि न खाता न बही केसरी जो कहे वही सही!

तो इन्हीं केसरी की कृपा से मनमोहन कमल आज़ाद भारत के प्रधान संपादक घोषित हो गए। पर वह लखनऊ आए तभी जब उन का ए.सी. चैम्बर बन कर पूरी तरह तैयार हो गया। अब यह अलग बात है कि उन की भाषा का मुरीद रहा सुनील भाजपाई संपादक से भिड़ कर पहले ही अख़बार से बाहर हो गया था। भाजपाई संपादक ने कंपनी के नए सी.ई.ओ. के सामने सुनील को अनुशासनहीनता का मुद्दा बना कर पेश किया। नए सी.ई.ओ. ने भी आनन फ़ानन में सुनील को नहीं निपटाया। निपटाया पर आहिस्ता-आहिस्ता। वह जानता था कि यहां यूनियन मज़बूत है, सीधे मोर्चा लेना ठीक नहीं है।

वह लोगों से ह्युमन मैनेजमेंट की बात करता और इतनी सरलता और सहजता से कि लोग उस की बातों में आ जाते। सो उस ने पहले दौर में सुनील के खि़लाफ़ विभागीय जांच करवाई। चार्जशीट दिया। फिर बाक़ायदा लेबर लॉ के जानकार एक वकील से एक इंक्वायरी करवाई। उसको दोषी साबित किया। फिर उस की बर्खास्तगी की चिट्ठी बनवाई। सुनील को बुलाया, बर्खास्तगी की चिट्ठी दिखाई और समझाया कि इस्तीफ़ा दे देने में ही उस की भलाई है।

सुनील ने बर्खास्तगी की चिट्ठी लेने और इस्तीफ़ा दोनों से इंकार कर दिया। सी.ई.ओ. जानता था कि यूनियन हस्तक्षेप करेगी। यूनियन ने किया भी। उसने यूनियन के नेताओं को दिल्ली बुलाया बातचीत के लिए। सुनील के ख़र्चे पर यूनियन के तीन लोग गए भी दिल्ली उस से बातचीत करने। उसने यूनियन को बधिया बनाते हुए सुनील से कहा कि सारा मामला भाजपाई संपादक के ईगो का है। मैं उस को ही निपटा रहा हूं। तब तक उस का तीन महीने के लिए कानपुर यूनिट में ट्रांसफर कर दिया जा रहा है। भाजपाई संपादक के जाते ही उसे वापस लखनऊ बुला लिया जाएगा। सब लोग ख़ुशी-ख़ुशी लौटे। पर लखनऊ आ कर जो चिट्ठी मिली सुनील को उस में उस की बर्खास्तगी को सिर्फ़ तीन महीने के लिए स्थगित किया गया था। और कहा गया था कि इस तीन महीने में उस का काम काज और व्यवहार वाच किया जाएगा। और जो रिपोर्ट संतोषजनक निकली तो वापस ले लिया जाएगा। वह चला गया कानपुर। चंद्रशेखर सरकार का पतन हो गया था। चुनाव घोषित हो गया था। कि राजीव गांधी की हत्या की ख़बर आ गई। चुनाव की तारीख़ें आगे बढ़ा दी गईं थीं। सुनील का ट्रांसफ़र भी दो महीने के लिए और एक्स्टेंड कर दिया गया। और अंततः उसे लखनऊ बुला कर बर्खास्तगी की चिट्ठी दे दी गई। इन पांच महीनों में सी.ई.ओ. ने यूनियन को बधिया बना दिया था। साम दाम दंड भेद उर्फ ह्यूमन मैनेजमेंट से।

चौहान चपरासी साफ़ कहता कि, ‘भइया सुनील हमारी यूनियन भी पत्रकार हो गई है!’

‘मतलब?’

‘अरे इतना भी नहीं समझते कि पत्रकार माने का होता है?’ और जैसे वह जोड़ता, ‘पत्रकार माने दलाल!’

और चौहान ही क्यों अब कोई भी अख़बार की यूनियन को दलाल कहने में परहेज़ नहीं कर रहा था। सी.ई.ओ. ने यूनियन के महामंत्री को सचमुच ख़रीद कर अपना कुत्ता बना लिया था। महामंत्री और अध्यक्ष को पहले का मैनेजमेंट भी बाक़ायदा हर महीने पैसे देता था। पर इस नए मैनेजमेंट ने एकमुश्त भारी रक़म दे दी थी। लोग कहते कि लाखों में। जो भी हो, जितना भी हो पर यूनियन के महामंत्री का नया घर बनने लगा था।

अख़बार में पहले बात-बात पर आंदोलन की धमकी दे कर चुटकी में मसले हल कर लेने वाला यह महामंत्री अब जो कोई समस्या आती तो आंदोलन की जगह बात की जाएगी की बात करता। और यह बात भी दिल्ली में सी.ई.ओ. से होती संबंधित पीड़ित के ख़र्चे पर। बातचीत में पीड़ित को बधिया बना कर दिल्ली से भेज दिया जाता। और वह पीड़ित फिर सारे अपमान, सारी यातनाएं भुगत लेता पर यूनियन के पास जाने से तौबा कर लेता।

सी.ई.ओ. के ह्यूमन मैनेजमेंट में कर्मचारी, पत्रकार, यूनियन सभी मैनेज हो गए थे।

वैसे भी अख़बारों से ट्रेड यूनियन की विदाई के यह दिन थे।

अख़बारों में लायज़नर्स की चांदी के दिन भी अब उछाल पर थे। और जो पहले यह होता था कि अख़बारों में अस्सी परसेंट पत्रकार काम करने वाले होते थे और बीस परसेंट दलाली करने वाले, अब यह अनुपात भी बदल रहा था। अब अख़बारों में काम करने वालों का अनुपात बीस प्रतिशत पर आ गया था और दलालों का अनुपात अस्सी प्रतिशत पर। संपादक भी अब विद्वान नहीं चाहिए थे मैनेजमेंट को। पी.आर.ओ. या लायज़नर्स टाइप चाहिए थे।

मनमोहन कमल की ख़ासियत यह थी कि वह लायज़निंग में भी निपुण थे और संपादन में भी। एडीटोरियल टीम बनाने में भी उन का जवाब नहीं था। जैसे वह ख़ुद पढ़े लिखे भी थे और लायज़नर भी। तो अपनी टीम में भी दोनों तरह के लोग वह रखते ही रखते थे। यहां आज़ाद भारत में भी रखा। बल्कि यहां तो उन का एक शिष्य रिपोर्टर सूर्य प्रताप तो दो क़दम आगे निकल गया। सूर्य प्रताप के साथ भी यह दुर्लभ संयोग था कि वह कलम का भी धनी था और लायज़निंग का भी। पर उस के साथ एक बड़ी दिक्क़त यह थी कि वह कोई काम छुपा कर नहीं करता था। खुला खेल फर्रुख़ाबादी वाला मामला था उस का। जो काम मनमोहन कमल या उन जैसे लोग एक परदेदारी में करते थे, थोड़ी शालीनता और सोफ़िस्टिकेटेड ढंग से करते, डिप्लोमेटिक ढंग से करते यह सब सूर्य प्रताप को नहीं आता था। वह कहता कि आप मर रहे होते हैं और डॉक्टर के पास जाते हैं पर डॉक्टर बिना फ़ीस लिए आप को छूता भी नहीं है। वकील के पास न्याय की लड़ाई लड़ने जाते हैं बिना फ़ीस लिए एक क़दम भी वह नहीं चलता है। पूरी फ़ीस ले कर भी वह आप का केस जीत ही जाए, कोई गारंटी नहीं। डॉक्टर फ़ीस दवाई के पैसे ले कर भी आप की जान को बचा ले इस की कोई गारंटी नहीं। वहां आप फिर भी चुपचाप पैसा दे आते हैं। उ़फ़ भी नहीं करते। सरकारी दफ्तरों में अफ़सरों, बाबुओं को बात बेबात पैसा दे आते हैं, लेकिन आप हमारे पास आते हैं तो चाहते हैं कि बिना कुछ ख़र्च किए काम चल जाए। चलिए जो हम आप से कोई ख़बर लिखने का पैसा मांगें तो आप हम को दस जूता मारिए। पर आप चाहते हैं कि जहां लाखों का रेट खुला है, वहां आप का ट्रांसफ़र मु़त में करवा दें? करोड़ों का ठेका आप को मु़त दिलवा दें? क्यों भाई क्यों? वह कहता कि बताइए पचीस साल से ऊपर हो गया पत्रकारिता में कलम घसीटते पर खटारा स्कूटर पर चल रहे हैं। अरे कुचीपुड़ी या भरतनाट्यम डांस भी किए होते पांच साल तो राष्ट्रीय स्तर के डांसर हो गए होते। पर यहां क्या? भइया की पिछाड़ी धो रहे हैं। भइया मतलब शहर के नंबर वन अख़बार के संपादक। सूर्य प्रताप उन दिनों उसी अख़बार में शरण लिए बेहतरीन मौके़ की तलाश में था। मास कम्युनिकेशन की डिग्री से लैस सूर्य प्रताप ख़बरों के मामले में बड़ों-बड़ों के कान काटता था। पहले वह कविताएं लिखता था। अब कविताएं बंद थीं। पुराने मित्र पूछते कि, ‘सूर्य प्रताप जी अब कविताएं क्यों नहीं लिखते?’ सूर्य प्रताप कहता, ‘मेरी ख़बरें पढ़ते हो?’ लोग कहते कि, ‘हां।’ तो सूर्य प्रताप कहता कि, ‘अरे मूर्खों यह ख़बरें नहीं, मेरी कविताएं हैं। फिर से पढ़ कर बताना अगर कविता सी तकलीफ़ न हो मेरी ख़बरें पढ़ कर तो बताना!’ तो ख़बरों को कविता की सी मुहब्बत से लिखने वाला सूर्य प्रताप भी अभावों में जीते जीते कब लायज़निंग करने लगा यह उस को भी नहीं पता चला। हां, शुरुआत शराब से हुई यह उसे पता था। फिर कब रात हो गई यह वह नहीं जानता था। वह एक फ़िल्मी गाना गुनगुना कर प्रतीकों में ही बताता, ‘तूने काजल लगाया दिन में रात हो गई/छुप गए तारे नज़ारे ओये क्या बात हो गई।’ सूर्य प्रताप का यह रूपक, यह प्रतीक समझने वाले समझते। नहीं समझने वाले गाने का आनंद ले लेते। तो जिस दिन मनमोहन कमल की नियुक्ति आज़ाद भारत के प्रधान संपादक पद पर हुई, सूर्य प्रताप को तुरंत पता चल गई। सूर्य प्रताप को यह ख़बर मनमोहन कमल ने ही फ़ोन पर बताई। क्यों कि भइया से परेशान सूर्य प्रताप अकसर मनमोहन कमल को दिल्ली फ़ोन करता और कहता, ‘कमल जी कुछ कीजिए। अब यहां भइया को बर्दाश्त करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।’ सो उस दिन भी सूर्य प्रताप ने मनमोहन कमल को फ़ोन किया था। और मनमोहन कमल ने सूर्य प्रताप को आज़ाद भारत में अपनी नियुक्ति के बाबत बताया था। शाम का समय था। सूर्य प्रताप से रहा नहीं गया। ख़ुशी सेलीब्रेट करने की गरज से दो तीन पेग एक मित्र के साथ ले लिया। फिर अचानक जाने क्या हुआ कि उस ने स्कूटर स्टार्ट की और पहुंच गया आज़ाद भारत के दफ्तर। सीधे संपादकीय विभाग में पहुंचा। ब्यूरो के रिपोर्टरों से कहा, ‘अब आज से मैं यहां का ब्यूरो चीफ़ अब मुझे सलाम करो!’

‘क्या?’ दो तीन रिपोर्टर एक साथ अचकचा पड़े।

‘हां।’ सूर्य प्रताप बोला, ‘आज से भाजपाई राशन पानी बंद! यह संपादक गया। अब मनमोहन कमल तुम्हारे एडीटर इन चीफ और मैं ब्यूरो चीफ!’

सूर्य प्रताप चलते-चलते बोला, ‘सब मिल कर मुझे सलाम करो।’

बाद में वहां का ब्यूरो चीफ बोला, ‘ससुरे को चढ़ गई है। नादान है।’

पर भाजपाई संपादक के गुर्गों ने सूर्य प्रताप की बात में वज़न ढूंढ लिया था। जा कर संपादक को सूर्य प्रताप की बात और सूर्य प्रताप का तेवर बताया। यह भी बताया कि मनमोहन कमल एडीटर इन चीफ़ बन गए हैं। अपने गुर्गों की बात सुन कर भाजपाई संपादक का चेहरा तनाव में आ गया। हवाइयां उड़ने लगीं। धीरे से बोला, ‘हां केसरी जी के यहां इधर मनमोहन कमल आ जा तो रहे थे। फिर भी पता करता हूं।’

पता क्या करना था दूसरे दिन मनमोहन कमल के प्रधान संपादक बनने की सूचना नोटिस बोर्ड पर लग गई थी।

भाजपाई संपादक छुट्टी पर चला गया। फिर वाया केसरी बहुत संपर्क साधा उस ने पर उस की दाल नहीं गली।

मनमोहन कमल का ए.सी. चैम्बर जब बन कर तैयार हो गया तभी वह आए। उन दिनों संपादक का ए.सी. चैम्बर बड़ी बात माना जाता था। आते ही मनमोहन कमल ने कुछ पढ़े लिखे पत्रकारों की नियुक्तियां कीं। कुछ लायज़नर्स पत्रकारों को भी अख़बार से जोड़ा। कुछ ऐसे लोगों को भी जोड़ा जो दोनों ही कलाओं में पारंगत थे। डिप्टी रेज़ीडेंट एडीटर मानवेंद्र शर्मा और ब्यूरो चीफ़ सूर्य प्रताप तथा कुमारेंद्र भदौरिया जैसे ऐसे ही लोगों में शुमार थे। मनमोहन कमल ने अपनी आदत के मुताबिक़ एक सुंदर सी स्टेनो भी नियुक्त की और कुछ सुंदर महिला पत्रकारों को भी। कुछ बेरोज़गार पर बेहतरीन पत्रकारों का शोषण करते हुए कम पैसों पर रखा। कुल मिला कर जैसे कोई प्राइम मिनिस्टर या कोई चीफ़ मिनिस्टर अपनी कैबिनेट क्षेत्रीय, जातीय तथा अन्य समीकरण बैलेंस कर के बनाता है, मनमोहन कमल ने भी यही किया। यही नहीं कि सिर्फ़ नए लोगों को ही अपनी कैबिनेट में रखा बल्कि कई पुरानों को भी इस में जोड़ा। नतीजा सामने था। अख़बार का रंग रूप निखर गया था। बिलकुल उस विज्ञापन के लहजे में जो कहें कि रूप निखर आया गुणकारी हल्दी और चंदन से! तो अख़बार कंटेंट और ले आऊट दोनों में ही बेहतर हो गया था। पृष्ठ संख्या भी बढ़ गई थी। कई अच्छे लिखने वाले जुड़ गए थे। और कि भाजपाई संपादक के ज़माने में जो फ़र्जी और प्रायोजित ख़बरों की बाढ़ आई हुई थी, अख़बार में, वह बाढ़ विदा हो गई थी। हां, अब चुनी हुई प्रायोजित ख़बरें ही छपती थीं और इस सलीक़े से कि दाल में नमक लगे। नमक में दाल नहीं। कुल मिला कर यह कि आज़ाद भारत अब अपने सहयोगी अंगरेज़ी अख़बार से किसी भी मामले में उन्नीस नहीं था। बराबरी पर आ गया था। अब बारी अन्य यूनिटों और ब्यूरो की थी। तो मनमोहन कमल ने अपनी पसंद के लोग वहां भी बिठाए। दिल्ली आफ़िस में भी बाक़ायदा ब्यूरो चीफ़ और फ़ीचर एडीटर रखे। दिल्ली में बैठ रही फ़ीचर एडीटर लखनऊ की ही थी, उन के साथ लखनऊ के संध्या दैनिक और दिल्ली के साप्ताहिक में काम कर चुकी थी और जो अब लगभग उन की हमसफ़र थी। सुंदर नयन नक्श, सलीक़ा और नफ़ासत। जीवन में भी, लिखने-पढ़ने में भी और बाक़ी काम काज में भी।

अब हो यह गया था कि लगभग हर यूनिट और ब्यूरो में किसी सुदर्शना का होना ज़रूरी था। कि जब कभी मनमोहन कमल वहां जाएं तो उन का सौंदर्यबोध तृप्त हो और उन्हें कामकाज में आसानी हो। लखनऊ में तो तमाम पुरुष साथी महिला साथियों की बढ़ती गति से लाचार हो कर कहते, ‘यार हम लोग भी अब आपरेशन करवा कर अपना जेंडर चेंज करवा लें, सफलता, प्रमोशन, पैसा तभी मिलेगा।’

जो भी हो आज़ाद भारत अख़बार में अब कहीं कोई कमी नहीं थी। बिलकुल पूर्णमासी का चांद था। भरापुरा। कि तभी वह जो कहते हैं न कि हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा!

तारा टूट गया।

लोग पहले ही से कहते थे कि मनमोहन कमल तो वो गिद्ध हैं जो जिस भी किसी की मुंडेर पर बैठा उस का देहावसान तय है। अख़बारों के बंद कराने का लांछन उन के आगे-आगे चलता था। लांछन पहले आता, वह बाद में आते।

दिल्ली में फ़ीचर एडीटर को ले कर सी.ई.ओ. और मनमोहन कमल में ठन गई। कहा जाता है का जो सहारा ले कर कहें तो सी.ई.ओ. की नज़र भी फ़ीचर एडीटर पर गई। पर फ़ीचर एडीटर ने सी.ई.ओ. को घास नहीं डाली। उलटे मनमोहन कमल को बता दिया। मनमोहन कमल ने सी.ई.ओ. के कुछ गड़े मुर्दे उखाड़े। उस की अनियमितताओं, वित्तीय घपलों की फ़ेहरिस्त तैयार की और सीधे चेयरमैन को दे दी। चेयरमैन सी.ई.ओ. और आज़ाद भारत के प्रधान संपादक के इस झगड़े से चिंतित हुए और ख़फ़ा भी। इतना कि लखनऊ में जब वह इस कंपनी के शेयर होल्डर्स की बैठक में पहली बार आए तो एयरपोर्ट से सीधे होटल पहुंचे जहां शेयर होल्डर्स की मीटिंग थी। मीटिंग की और होटल से सीधे एयरपोर्ट चले गए चेयरमैन। पर रास्ते में ही पड़ने वाले अपने अख़बार के दफ्तर की ओर झांका भी नहीं चेयरमैन ने। तब जब कि तमाम कर्मचारी पलक पांवड़े बिछाए खड़े रहे कि चेयरमैन आएंगे। पर बात वहीं ठहर गई कि वो आए भी नहीं और तमाशा भी न हुआ। लखन अपनी हारमोनियम साफ़ वाफ़ कर के तैयार था कि नहीं कुछ तो जय हिंद का नारा और एक मुर्दाबाद का गीत तो वह गा ही देगा। कि बता देगा कि बाहर से आ रहे लोगों को मोटी-मोटी तनख़्वाह दे कर उन का पेट फुला रहे हो। और पुराने लोगों के पेट की हवा निकाल रहे हो? ठीक-ठाक यूनियन को ‘पत्रकार’ बना दिए हो। आखि़र क्या चाहते हो। पर सुना था कि वो आएंगे अंजुमन में ये बात होगी वो बात होगी…..यहीं सुबह होगी यहीं रात होगी! ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। और वो गा रहा था कि जो निकले थे घर से तो क्या जानते थे कि भरी धूप में यों बरसात होगी।

[ हारमोनियम के हज़ार टुकड़े से। पूरा उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बॉक्स में दिए गए लिंक को क्लिक कर सकते हैं। ]

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