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प्रायः यह एक आम भ्रांति है कि जिसने भारत में गाड़ी चला ली

by Nitin Tripathi
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प्रायः यह एक आम भ्रांति है कि जिसने भारत में गाड़ी चला ली वह कहीं भी चला लेगा. हक़ीक़त में इसका उल्टा है. आपने यदि भारत में गाड़ी चलाई है तो अमेरिका में जाकर ज़्यादा समय लगेगा गाड़ी चलाना सीखने में. सबसे पहले तो भारत में जो सीखा उसे भूलना पड़ेगा, फ़िर सभ्य तरीक़े से नियम पालन  करते हुवे गाड़ी चलाना सीखना पड़ेगा.

अमेरिका में ट्रैफ़िक का फ़ाइनल नियम है राइट ओफ़ वे. जहां कोई नियम न काम करे वहाँ राइट ओफ़ वे. खुद समझो किसका अधिकार है पहले जाने का उसे जाने दो – यही नियम है. चौराहे पर ट्रैफ़िक लाइट फेल है / नहीं लगी है. रुको. सब रुकेंगे. फ़िर देखो कौन पहले से रुका था उसका अधिकार है जाने का. उसे पहले जाने दो फ़िर जिस नम्बर पर तुम रुके थे उस नम्बर पर ही अपने आप गाड़ी बढ़ा कर निकल लो. भारत में जहां चौराहे पर सिग्नल भी होता है वहाँ भी इसका उल्टा ही नियम चलता है. बिल्कुल मत रुको. किसी को न निकलने दो. अपनी गाड़ी जो निकाल पाए निकाल ले जाए.
एक स्मार्ट आधुनिक शहर में अनुशासन बहुत मायने रखता है.और यह अनुशासन सजा से ही आता है. सजा भी ऐसी कि सबको बराबर मिले वह चाहे जो हो. लखनऊ शहर में स्मार्ट सिटी योजना में सारे सिग्नल और चालान व्यवस्था ऑटमैटिक हो गए हैं. मैं अपने ड्राइवर को ही कितनी बार लिमिट में चलने को समझाया उसे न समझ आता. ट्रैफ़िक पुलिस वाला रोक ले तो उससे बहस कर लेते थे. भैय्या के चाचा विधायक हैं. par अभी अस्सी लिमिट वाली रोड पर 93 की स्पीड पर चलने का दो हज़ार जुर्माने का sms आया, अपने आप अगले दिन से ट्रैफ़िक नियम समझ आने लगे.
वही नहीं, इस तीस लाख आबादी के शहर लखनऊ में पिछले छः महीनों में एक करोड़ से ज़्यादा वाहनों के चालान कटे. आरम्भ में रियायत बरती जा रही थी पर धीमे धीमे जैसे जैसे चौराहों पर ऑटमेशन बढ़ा चालान भी बढ़ने लगे. अभी भी ढेरों लोग चालान पे नहीं कर रहे पर जब गाड़ी बेंचने का नम्बर आएगा तो अंततः सूद सहित पे करना पड़ेगा. जिन्होंने एक बार दो चार हज़ार रुपया जुर्माना भरा अपने आप ट्रैफ़िक नियम समझ आने लगे.
स्मार्ट सिटी में सिग्नल ऑटमेशन और ऑटमैटिक चालान बहुत अच्छी पहल है. थोड़ी बहुत ख़ामियाँ हर सिस्टम में मिलेंगी पर यह तय है कि यह व्यवस्था चली तो शहर का ट्रैफ़िक सुधर जाएगा.

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