Home हमारे लेखकरिवेश प्रताप सिंह रम्पत बैंड वाले का एक छोटा सा किस्सा

रम्पत बैंड वाले का एक छोटा सा किस्सा

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पत्रकार- क्या नाम है आपका??
ग्रामीण- रम्पत..
पत्रकार- रम्पत क्या??
ग्रामीण- रम्पत बैंड वाले।
पत्रकार- यार..तुम बैंड बजाने वाले हो… वो तो तुम्हारा काम है लेकिन रम्पत के आगे क्या लिखते हो….
ग्रामीण- साहब! हमरी दुकान के बोर्ड पर भी यही लिखा है”
पत्रकार- “क्या”
ग्रामीण- “रम्पत बैंड वाले”
पत्रकार- वो तो दुकान पर लिखा है…लेकिन तुम्हारे आधार कार्ड पर क्या छपा है।
ग्रामीण- ‘रम्पत’
पत्रकार- यार! किसी के घर पैदा हुए थे या कोई तुम्हें अस्पताल के बाहर छोड़ गया था.
ग्रामीण- क्या बात कर रहें हैं साहब! हम तो अपने घर पर पुरानी कोठरी में पैदा हुए थे।
पत्रकार- अबे! जब घर की पैदाइश है तो यही बता दो कि किसके घर पैदा हुए थे..
ग्रामीण- साहब आप हमरे बप्पा का नाम पूछ रहें हैं??
पत्रकार- हां सरकार! तुम्हारे बप्पा का…लेकिन नाम भी बताना और नाम के आगे भी!!
ग्रामीण- ” बाबूलाल टेढ़े…
पत्रकार- टेढ़े! यह कौन सी जाति है..
ग्रामीण- साहब यह जाति नाहीं… दरअसल हमरे बाबू जी बचपन से लोहा पीटते थे…लोहा पीटते-पीटते उनकी कमर झुककर टेढ़ी हो गयी इसलिए गांव के लोग प्यार से उन्हें टेढ़े कहते हैं..अब तो दस साल से वो ‘टेढ़ई चाचा’ हो गये।
पत्रकार- यार बहुत बेहुदे हो… आज मेरा पूरा दिन और दिमाग दोनों खराब कर दिया..
ग्रामीण- साहब! हम रम्पत हैं..रम्पत बैंड वाले!! लेकिन ‘रम्पत हरामी’ नहीं…. कि तुम्हारे बहकावे में आकर अपनी लुंगी खोल दें।

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