Home विषयसाहित्य लेख रोजी-रोटी के चाक-चिक्य में से वक्त निकाल मैं….

रोजी-रोटी के चाक-चिक्य में से वक्त निकाल मैं….

by Pranjay Kumar
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रोजी-रोटी के चाक-चिक्य में से वक्त निकाल मैं भी यदा-कदा लिख लेता हूँ। लिख क्या लेता हूँ, कागज़ पर स्याही फैला लेता हूँ या कीबोर्ड पर उँगलियाँ फिरा लेता हूँ!
एक लेखक अपने लेखन में निर्भीक, ईमानदार एवं पारदर्शी रहे तो अच्छा है। सच्चा मैंने इसलिए नहीं कहा क्योंकि सच्चा होने का दावा तो रवीश कुमार जी, राजदीप सरदेसाई जी, आशुतोष जी, पुण्यप्रसून वाजपेयी जी, अभिसार शर्मा जी जैसे तमाम पत्रकार भी करते हैं।
किसमें कितना सच है, किसमें कितना पक्ष यह वक्त और श्रोता-पाठक ही तय करते हैं! मैंने अपना पक्ष कभी आपसे छिपाया नहीं। मैंने कभी नहीं कहा कि मैं निष्पक्ष हूँ। मेरा अपना पक्ष है। और वह पक्ष है भारत और भारतीयता, राष्ट्र और संस्कृति, सनातन और सनातन जीवन-मूल्य। उसकी रक्षा, उसका प्रश्रय-प्रोत्साहन मेरा जीवन-ध्येय है। उसे ही ध्यान में रखकर मैं लेखन की ओर प्रवृत्त भी हुआ हूँ।

कल हिंदी पत्रकारिता दिवस था। मैंने न किसी को

बधाई

दी, न

बधाई

ली। अव्वल तो हिंदी में लिखने-पढ़ने वाले को हिंदी पट्टी वाले ही ढेला भर का भाव नहीं देते। अंग्रेजी में गिटियाने वाले उनके गौरव-ध्वज होते हैं।

हिंदी पट्टी की इस दुरावस्था के कारण हमारे कई मित्र हिंदी के स्थापित अख़बारों में प्रतिष्ठा पा जाने के पश्चात अंग्रेजी के दोयम दर्जे के अख़बारों में लिखकर नाम चमकाना चाहते हैं। क्या करें, उनकी मज़बूरी है।
कुल मिलाकर अपुन स्वांतः सुखाय लिखकर संतुष्ट हूँ। आपको बदलने का दावा मैंने कभी नहीं किया। मेरे लिखे को पढ़कर यदि आप दूसरे पक्ष को भी सोचने को प्रेरित होते हों तो वही मेरे लेख का प्रतिसाद है। मेरे लेख मेरे निजी विचार हैं। आपकी सहमति-असहमति मुझसे हो! विरोध-आलोचना मेरे विचारों की हो! आपका मन न माने तो मेरी जी भर लानत-मलामत कर लें। पर सोशल मीडिया के इस प्लेटफॉर्म पर बहस के दौरान मेरी संस्था, मेरे प्रोफेसन को बीच में न लाएं। मेरे विचारों की जिम्मेदारी मेरी है।
समय मिले तो कृपया पढ़ें और संपूर्ण संदर्भ में अर्थ ग्रहण करें। किसी भी लिंक पर क्लिक कर आप इसे आसानी से पढ़ सकते हैं। नया इंडिया के लिंक पर आपको पूरा लेख पढ़ने को मिलेगा

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