Home राजनीति सामान नागरिक संहिता – क्या इसे लागू करने के नाम पर मुसलमानो को डराने की हो रही कोशिश

सामान नागरिक संहिता – क्या इसे लागू करने के नाम पर मुसलमानो को डराने की हो रही कोशिश

by Faiyaz Ahmad
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इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि कॉमन सिविल कोड को लेकर कुछ मुसलमान नेता ठीक उसी प्रकार भ्रम फैला रहे हैं जैसा उन्होंने तीन तलाक के मामले में फैलाया था। लेकिन उनका विश्वास है कि जब कॉमन सिविल कोड का कानून लागू होगा तो उसका स्वागत भी ठीक उसी तरह किया जाएगा जिस तरह तीन तलाक के कानून के लागू होने के बाद किया गया था।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कॉमन सिविल कोड किसी मुसलमान या हिंदू या किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने, पूजा-पाठ करने से नहीं रोकता है। यह इन मूल धार्मिक विषयों से संबंधित ही नहीं है। यह केवल महिला अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए, तलाक होने की स्थिति में महिलाओं-बच्चों को भरण पोषण का अधिकार देने से संबंधित है। यह किसी भी तरह एंटी-इस्लामिक नहीं है, लिहाजा इसका विरोध करना पूरी तरह गलत है।
डॉ. फैयाज अहमद फैजी समान नागरिक संहिता के विरोध की व्याख्या बिल्कुल अलग दृष्टिकोण से करते हैं। उन्होंने कहा कि वे मुसलमान जो पहले हिंदू थे, और बाद में मुसलमान बन गए, उन्हें पसमांदा मुसलमान कहा जाता है। ये मुसलमान अलग धर्म अपनाने के बाद भी हिंदुओं के जैसा व्यवहार करते हैं। पति-पत्नी के संबंध और उसके भरण-पोषण के मामले में भी व्यवहार में वे पूरी तरह हिंदू परिवारों के जैसा बर्ताव करते हैं। इन परिवारों में एक पत्नी के रहते दूसरी शादी करना, या बच्चों को भरण-पोषण न देने जैसी बातें न के बराबर ही पाई जा सकती हैं। इस समुदाय में समान नागरिक संहिता का कोई विरोध नहीं है।
जबकि मुस्लिमों का दूसरा वर्ग अशराफ मुसलमान कहा जाता है, वह अरबी ईरानी संस्कृति का पालन करता है और उसे ही श्रेष्ठ समझता है। इन समाजों में पुरूषों को महिलाओं पर बहुत ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं, उनका आरोप है कि यह वर्ग महिलाओं पर अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता, लिहाजा वह समान नागरिक संहिता का विरोध कर रहा है।

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