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एक क्रिकेटर का गैंगेस्टर बेटा

by Praarabdh Desk
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जब पहली बार मुख्तार अंसारी को सजा सुनाई, तो उसकी टिप्पणी कुछ यूं थी, ‘मुख्तार अंसारी का गिरोह देश का सबसे खूंखार आपराधिक गिरोह है। यह बेहद परेशान करने वाली बात है कि गवाहों के मुकर जाने के कारण खूंखार अपराधी गंभीर मुकदमों में बरी हो जाते हैं।’

यूपी के माफिया मुख्तार अंसारी और उसके गिरोह पर ऐसी टिप्पणी पहली बार नहीं आई। बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड का केस हो या फिर गाजीपुर में एमपी एमएलए कोर्ट द्वारा मुख्तार और उसके सांसद भाई अफजाल अंसारी को हुई सजा का मामला, इस तरह की टिप्पणी हर आदेश का हिस्सा हैं।

जब मुख्तार ने अपराध की सीढ़ियों पर सत्ता और सियासत की अंगुलियों को थामकर चढ़ना शुरू किया, तो उसके क़दम रुके नहीं। वारदात दर वारदात उसका गिरोह इस कदर खूंखार होता गया कि लोग उसके मुकाबिल खड़े होने में खौफ खाते रहे। सरकारें उसके सियासी प्रभाव के आगे नतमस्तक रहीं।

मुख्तार जिस परिवार से आता है, उसका अपराध से दूर तक नाता नहीं। उसके पूर्वज आज़ादी की लड़ाई लड़े, तो नाना ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध मे देश का सिर ऊंचा किया। मुख्तार के पिता सुहान अल्लाह अंसारी नामी सेंट स्टीफेंस कॉलेज के पढ़े थे और क्रिकेट उनका शौक था। वह कॉलेज की टीम के कप्तान भी रहे।

इन सब के उलट मुख्तार शुरू से ही दबंगई और गुंडई की तरफ मुड़ गया। उसके ख़िलाफ़ पहला मामला 1978 में एक एनसीआर के रूप में दर्ज हुआ। इसके बाद वर्ष 1986 से 1988 के बीच उसके विरुद्ध एक के बाद एक हत्या के मामले दर्ज हुए। जिस केस से मुख्तार चर्चा में आया, वह मोहम्मदाबाद के सच्चिदानंद राय की हत्या से जुड़ा था। दरअसल मुख्तार के पिता मोहम्मदाबाद नगर पंचायत के चेयरमैन भी थे। किसी वजह से मुख्तार के पिता और सच्चिदानंद के बीच विवाद हुआ। आरोप लगा की मुख्तार ने उसका ही बदला लेने के लिए सच्चिदानंद की हत्या कर दी। इस हत्याकांड में साधू सिंह और मकनू सिंह उसके मददगार बने। मुख्तार ने इन दोनों को अपराध जगत में अपना गुरु मान लिया।

इसी दौरान साधू और मकनू के लिए मुख्तार ने कई वारदात कीं। इसमें बृजेश सिंह के करीबी त्रिभुवन सिंह के भाई कॉन्स्टेबल राजेंद्र सिंह की हत्या भी शामिल है। पुलिस लाइन में दिनदहाड़े सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में इस हत्या के बाद मुख्तार के चर्चे पूरे पूर्वांचल में शुरू हो गए। इसके साथ ही शुरू हो गई मुख्तार गैंग और बृजेश गैंग के बीच कभी ख़त्म ना होने वाली अदावत।

ठेके, पट्टों से लेकर कोयले के कारोबार में अपना-अपना सिक्का जमाने के लिए दोनों के बीच होड़ शुरू हो गई। कभी बृजेश गैंग भारी पड़ा, तो कभी मुख्तार। हालांकि कोयले के कारोबार में बृजेश गैंग का वर्चस्व बरकरार रहा। इसके चलते मुख्तार को उस कारोबार के लिए गुजरात में ज़मीन बनानी पड़ी। इस बीच वाराणसी में अवधेश राय की हत्या हुई और इसमें भी मुख्तार और उसके गैंग का नाम सामने आया।

1991 में मुख्तार अंसारी चंदौली पुलिस के हाथ लग लग गया। लेकिन, पुलिस उसे पकड़ पाती, इससे पहले ही वह दो सिपाहियों को गोली मारकर फरार हो गया और बन गया पुलिस के लिए मोस्ट वॉन्टेड। अपराध जगत में नाम बना रहे मुख्तार को इस बीच यह समझ आ गया था कि अगर लंबी और सुरक्षित पारी खेलनी है, तो राजनीति की ज़मीन तैयार करनी होगी। उसके इस क़दम ने पूर्वांचल के आधा दर्जन ज़िलों के राजनीतिक समीकरणों को बदलने का मंच तैयार कर दिया।

मुख्तार अंसारी के दोनों बड़े भाई, शिगबतउल्ला और अफजाल अंसारी पहले से ही राजनीति में सक्रिय थे। वर्ष 1996 में मुख्तार पहली बार बीएसपी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरा और मैदान चुना घोसी लोकसभा सीट का। सामने थे पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय। दोनों ही गंभीर अपराधों के आरोपी थे। मुख्तार पर एनएसए लगा था और कल्पनाथ राय दाऊद इब्राहिम की मदद के आरोप में जेल में थे। मुख्तार दूसरे नंबर पर रहा, लेकिन उसकी राजनीतिक ज़मीन तैयार हो गई। वह मऊ से इसी साल विधायक बन गया।

माननीय बनने के साथ ही उसने अपने माफिया राज को और मजबूती देना शुरू कर दिया। पहले उस पर एक पुलिस अफ़सर पर हमला करने का आरोप लगा और फिर विश्व हिंदू परिषद के नेता और कोयला कारोबारी नंद किशोर रूंगटा के अपहरण का। राजनीति में आने के साथ ही मुख्तार ने बृजेश गैंग को अलग तरीके से चोट देनी शुरू कर दी। ठेकों में उसका दबदबा बढ़ने लगा। देखते ही देखते उसने पूर्वांचल के मछली के कारोबार, रियल स्टेट और अन्य सरकारी ठेकों पर क़ब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया।

मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी वर्ष 1985 से 2002 तक मोहम्मदाबाद सीट से विधायक बनकर विधानसभा पहुंचते रहे। लेकिन, वर्ष 2002 में माफिया बृजेश सिंह के करीबी कृष्णानंद राय ने उन्हें पटखनी देकर बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की। कहा जाता है कि इस हार से मुख्तार अंसारी ऐसे बौखलाया कि उसने कृष्णानंद राय को रास्ते से हटाने की ठान ली।

साल 2003 में लखनऊ के कैंट इलाके़ में मुख्तार अंसारी और कृष्णानंद राय गैंग का आमना-सामना हुआ। मुख्तार अपने परिवार के साथ वाराणसी की ओर से लखनऊ में एंट्री कर रहा था और कृष्णानंद राय का काफिला लखनऊ से वाराणसी की ओर जा रहा था। काफिले की गाड़ियां आमने-सामने आते ही दोनों ओर से फायरिंग शुरू हो गई। हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन राजधानी में हुई इस वारदात ने सरकार को हिला दिया।

एसटीएफ को दोनों गैंग की निगरानी में लगा दिया गया। इस बीच एसटीएफ को पता चला कि कृष्णानंद राय की हत्या के लिए मुख्तार सेना के एक भगोड़े से एक करोड़ रुपये में एलएमजी खरीदने जा रहा है। इससे बुलेटप्रूफ गाड़ी को भी भेदा जा सकता है। एसटीएफ ने केस का खुलासा कर दिया। मुख्तार के ख़िलाफ़ पोटा के तहत मामला भी दर्ज हो गया। लेकिन, मामला मुख्तार से जुड़ा था, इसलिए पुलिस अफ़सरों को जल्द ही अंदाज़ा हो गया कि यह कार्रवाई उन पर ही भारी पड़ने वाली है।

तत्कालीन सरकार की तरफ से पुलिस अफ़सरों पर पोटा हटाने के लिए दबाव बनने लगा। लेकिन, डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने झुकने से मना कर दिया। सरकार भी पीछे नहीं हटी और पुलिस अफ़सरों पर कार्रवाई का मन बना लिया। डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह को निलंबित कर दिया गया और करीब 12 अफ़सरों के इसके चलते तबादले हो गए। इस बात से नाराज़ शैलेंद्र सिंह ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

मुख्तार पर कार्रवाई के चलते एक पुलिस अफ़सर के इस्तीफे ने प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी। लेकिन, तत्कालीन सरकार मुख्तार के पक्ष में खड़ी रही और टस से मस नहीं हुई। इस बीच मऊ दंगे की आग में झुलसने लगा। इस दौरान खुली जीप में असलहों के साथ दंगाग्रस्त इलाक़ों में मुख्तार के घूमने के विडियो खूब चर्चा में आए। मुख्तार को मऊ दंगों के आरोप में जेल भी भेज दिया गया।

मुख्तार के जेल जाने के एक महीने बाद ही बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय समेत सात लोगों की सनसनीखेज हत्या हो गई। आरोप लगते हैं कि इस हत्याकांड को अंजाम दिलाने के लिए मुख्तार अंसारी जेल गया ताकि उस पर अपराध साबित ना हो सके। इस हत्याकांड ने मुख्तार की दहशत को पूरे प्रदेश में कायम कर दिया। मुख्तार का एक ऑडियो काफी वायरल हुआ, जिसमें इस हत्याकांड को लेकर ही बात हो रही थी। तमाम और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मिले, लेकिन गवाहों के पक्षद्रोही होने और दो गवाहों की संदिग्ध स्थिति में मौत के चलते मुख्तार और सभी आरोपित इस केस से बाइज्जत बरी हो गए।

सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी को ठिकाने लगाने के बाद मुख्तार का जरायम की दुनिया में तो सिक्का कायम ही हुआ, उसकी राजनीतिक ज़मीन भी और मजबूत हो गई। सपा के साथ चल रहा मुख्तार इस हत्याकांड के बाद बीएसपी के फिर से करीब हो गया। वर्ष 2007 में मायावती की सरकार आई, तो उन्होंने मुख्तार और उसके परिवार को बीएसपी में शामिल कर लिया।

2009 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी ने मुख्तार अंसारी को वाराणसी से मुरली मनोहर जोशी के ख़िलाफ़ टिकट दिया। इतना ही नहीं, कभी मुख्तार को माफिया बताने वाली बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने वाराणसी की एक जनसभा में मुख्तार अंसारी को रॉबिनहुड और ग़रीबों का मसीहा तक बता डाला। दरअसल मायावती ने माफिया मुख्तार की मंच से तारीफ यूं ही नहीं की थी। इसके पीछे वजह थे पूर्वांचल के लगभग 10 ज़िले, जहां की राजनीति को मुख्तार प्रभावित कर सकता था। मुख्तार ने मुरली मनोहर जोशी को जबरदस्त टक्कर दी, लेकिन फिर भी वह 17 हज़ार वोटों से हार गया।

इस हार के बाद माया और मुख्तार का साथ भी लंबा नहीं चला। वर्ष 2010 में मायावती ने फिर मुख्तार और उसके परिवार से किनारा कर लिया। लोगों को लगा कि मुख्तार अंसारी जेल में है और किसी बड़े दल का साथ नहीं है, तो राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्तार ने अपनी ख़ुद की पार्टी बना ली, कौमी एकता दल। वह मऊ से चुनाव लड़ा और जीत गया।

इस बीच सपा सरकार सत्ता में आ गई। मुख्तार और उसके दल के सपा में शामिल होने की अटकलें चलती रहीं। उधर, मुख्तार के ख़िलाफ़ मुकदमों की संख्या भी बढ़ते-बढ़ते 61 पर पहुंच गई। इनमें से आठ मामले हत्या के थे। लेकिन, मुख्तार सजा से काफी दूर था। 2016 में सपा के शिवपाल यादव ने मुख्तार को पार्टी में शामिल करने की कवायद शुरू कर दी। मुलाकातों का दौर शुरू हुआ, लेकिन अखिलेश यादव इसके लिए तैयार नहीं हुए। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इसी वजह से अखिलेश और शिवपाल के बीच दूरियां बढ़ीं और बाद में पार्टी दो हिस्सों में बंट गई।

2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा सुप्रीमो मायावती को फिर मुख्तार की याद आई। मायावती ने मुख्तार पर कोर्ट में आरोप सिद्ध ना होने का हवाला देकर कौमी एकता दल का बसपा में विलय कर लिया। बसपा उम्मीदवार के रूप में मुख्तार ने पांचवीं बार मऊ सीट से जीत हासिल की। लगभग 12 बरसों से जेल में रहते हुए भी मुख्तार अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो रहा था।

लेकिन, समय ने करवट ली। वर्ष 2017 में बीजेपी की सरकार बनी। योगी आदित्यनाथ के कुर्सी संभालते ही माफिया मुख्तार के बुरे दिन शुरू हो गए। यह भी एक संयोग है कि वर्ष 2005 में सांसद योगी आदित्यनाथ के काफिले पर आजमगढ़ में हुए हमले के तार भी मुख्तार से जोड़े गए। यह दौर था, जब योगी की हिंदू युवा वाहिनी का विस्तार पूर्वांचल में हो रहा था। हिंदुत्व के मुद्दे और तुष्टिकरण की राजनीति को आवाज़ दे रहे योगी के सुर मुख्तार से टकराने लगे।

2005 में मऊ दंगे के बाद हिंदू युवा वाहिनी ने आजमगढ़, मऊ और आसपास के अन्य ज़िलों में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी थीं, जो मुख्तार को नागवार गुजरने लगा था। इस बीच देश में कई जगह आतंकी हमले हुए। इनमें से अहमदाबाद धमाकों के मामले में गुजरात पुलिस ने आजमगढ़ से हमले के एक आरोपी अबू बशीर को पकड़ा। इस मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया। इसके तहत ही आजमगढ़ में 7 सितंबर 2008 को डीएवी कॉलेज के मैदान में एक रैली का आयोजन हुआ, योगी उसमें मुख्य वक्ता थे।

रैली की सुबह गोरखनाथ मंदिर से करीब 40 वाहनों का काफिला निकला। उन्हें आजमगढ़ में विरोध की पहले से आशंका थी। आजमगढ़ के करीब पहुंचने तक काफिले में करीब 100 चार पहिया और सैकड़ों की संख्या में मोटरसाइकिल जुड़ चुकी थीं। खुफिया विभाग की सूचना को देखते हुए पीएसी की एक इकाई भी काफिले के पीछे चल रही थी।

दोपहर बाद करीब 1.20 बजे काफिला आजमगढ़ शहर से थोड़ा पहले तकिया करने से गुजर रहा था। तभी एक पत्थर काफिले में मौजूद सातवीं गाड़ी पर लगा। इसके बाद हर दिशा से पत्थर चलने लगे। पेट्रोल बम फेंके जाने लगे। योगी के काफिले पर हमला हो चुका था। इस अचानक हमले ने योगी समर्थकों को तितर-बितर कर दिया। काफिला तीन हिस्सों में बंट गया। इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। लेकिन, योगी आदित्यनाथ ने रैली में हिस्सा लिया और अपने ऊपर हुए हमले का ज़िक्र नहीं किया। इस घटना के तार मुख्तार से जोड़े गए।

योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद मुख्तार और उसके परिवार पर कार्रवाई का सिलसिला शुरू हो गया। पहले उसके अर्थतंत्र को तोड़ा गया और फिर उसके करीबियों पर कार्रवाई शुरू हुई। बरसों से जेल से अपनी सरकार चला रहे मुख्तार को सलाखों के पीछे पहली बार डर तब लगा, जब 10 जुलाई 2018 को उसके करीबी माफिया मुन्ना बजरंगी की बागपत जेल में हत्या हो गई। इससे दहले मुख्तार ने ख़ुद को यूपी से बाहर निकालने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उसे कामयाबी तब मिली, जब पंजाब पुलिस वहां दर्ज एक मुकदमे के सिलसिले में यूपी से ले गई। इसके बाद वह पंजाब की जेल में ही जम गया।

यूपी की योगी सरकार और पंजाब की तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मुख्तार को रखने और लाने को लेकर ठन गई। यूपी पुलिस ने 26 बार प्रोडक्शन वारंट लगाया, लेकिन मुख्तार को वापस नहीं ला सकी। आखिरकार, यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। दो साल तीन महीने की अथक मेहनत के बाद यूपी पुलिस मुख्तार की घर वापसी करा पाई।

मुख्तार के आपराधिक और राजनीतिक साम्राज्य को तोड़ने के लिए असली चोट तब हुई, जब उसे 40 साल में पहली बार पिछले साल 21 सितंबर को सात साल की सजा हुई। इसके बाद पांच दिन के अंदर उसे दो और मामलों में सजा हुई। इसके चलते वह अब चुनाव लड़ ही नहीं पाएगा। इस बीच उसके बड़े बेटे और सुभासपा के टिकट पर मऊ से विधायक बने अब्बास अंसारी को भी ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। वर्तमान में उसके ख़िलाफ़ आठ आपराधिक मामले चल रहे हैं।

वहीं, शनिवार को बड़े भाई अफजाल अंसारी को सजा होने के बाद उनकी सांसदी जाना भी तय है। सबसे बड़े भाई शिगबतउल्ला पहले ही राजनीति से संन्यास ले चुके हैं। मुख्तार की पत्नी अफशां अंसारी के ख़िलाफ़ भी 11 आपराधिक मामले दर्ज हैं और वह गाजीपुर से 50 और मऊ से 25 हज़ार की इनामी हैं। ईडी उन्हें अलग से तलाश रहा है। मुख्तार के छोटे बेटे उमर के ख़िलाफ़ भी वारंट जारी हो गया है। पुलिस उसे भी तलाश रही है।

मुख्तार पर दर्ज 61 मामलों में से नौ में आरोप तय हो चुके हैं और चार में सजा हो चुकी है। करीब आधा दर्जन मामले ऐसे हैं, जिनमें उसे सजा कराए जाने की तैयारी है। इससे जाहिर है कि आने वाले दिन मुख्तार और उसके परिवार पर और भारी होने वाले हैं। उनकी राजनीतिक ज़मीन तो पूरी तरह से खिसकेगी ही, अपराध से बनाया आर्थिक साम्राज्य भी मिट्टी में मिल सकता है।

 

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