Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय अखिलेश ने मुझे धोखा दे दिया

अखिलेश ने मुझे धोखा दे दिया

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साधना गुप्ता यादव ने शतरंज के खेल की तरह मोहरे की तरह अमर सिंह और शिवपाल को आगे किया। अखिलेश यादव का इलाज करने के लिए। मुलायम ने भी अमर सिंह और शिवपाल को अखिलेश को चेक करने के लिए लगाया। यहां तक कि अखिलेश यादव के मुख्य मंत्री कार्यालय में एक महिला आई ए एस अफसर अनीता सिंह को अखिलेश का सचिव बना कर तैनात करवाया। जो अखिलेश सरकार की पल-पल की ख़बर मुलायम को देती रहती थीं। ठीक वैसे ही जैसे कभी कांशीराम ने मुलायम के मुख्य मंत्री कार्यालय में पी एल पुनिया को मुलायम का सचिव बनवा कर तैनात करवाया था। पुनिया मुलायम सरकार की पल-पल की खबर कांशीराम और मायावती को दिया करते थे। पुनिया बाद में मायावती के भी सचिव रहे थे। पुनिया ही थे जिन्हों ने मायावती के खिलाफ भी व्यूह रचा और उन्हें भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में फंसा दिया। कि मायावती आज तक कराहती हैं। पुनिया रिटायर होने के बाद अब बरसों से कांग्रेस में हैं। मनमोहन सरकार में खूब मलाई काटी पुनिया ने। सांसद तो हुए ही , कैबिनेट मंत्री पद की एक कुर्सी का भी
इंतज़ाम कर लिया था बतौर चेयरमैन अनुसूचित आयोग के ।
बहरहाल याद कीजिए जब एक समय अखिलेश यादव सरकार में कई सुपर चीफ़ मिनिस्टर बताए जाते थे। पैरलेल चीफ़ मिनिस्टर बताए जाते थे। शैडो चीफ मिनिस्टर भी। जैसा जिस का मन , वैसा मन। शिवपाल सिंह यादव , आज़म ख़ान , रामगोपाल यादव आदि इन सुपर चीफ़ मिनिस्टरों में थे । उन में एक नाम अनीता सिंह का भी लिया जाता था। मुलायम इन सब से ऊपर। कहा जाता है कि समय रहते साधना गुप्ता ने ध्यान नहीं दिया होता , हस्तक्षेप नहीं किया होता तो अखिलेश यादव को एक और सौतेली मां से परिचित होना पड़ता। अखिलेश को प्रशासनिक अनुभव नहीं था। डिम्पल से विवाह के बावजूद अखिलेश की अपनी भी कुछ निजी कथाएं थीं सो वह अनीता सिंह की मुट्ठी में थे। पर धीरे-धीरे अखिलेश यादव मुग़लिया सल्तनत वाली पारिवारिक चालों से परिचित होते गए और उस की काट भी करते गए। यह वही दिन थे जब टाइम्स आफ इंडिया अखबार ने अखिलेश यादव को औरंगज़ेब शब्द से अलंकृत कर रहा था। औरंगज़ेब मतलब अखिलेश और शाहजहां मतलब मुलायम।
गरज यह कि टाइम्स आफ इंडिया की इस ख़बर की कुल ध्वनि यह थी कि अखिलेश यादव ने मुलायम को क़ैदी बना कर सत्ता-विहीन कर दिया था। यह ख़बर अमर सिंह ने टाइम्स आफ इंडिया में प्लांट करवाई थी। वह सर्दियों के दिन थे। अब मुलायम अखिलेश यादव को हटा कर ख़ुद मुख्य मंत्री बनना चाहते थे। सार्वजनिक मंचों पर अखिलेश को लौंडों की तरह डांटने लगे थे। फिर वह डरे कि कहीं पार्टी टूट न जाए और ज़्यादा विधायक कहीं अखिलेश की तरफ चले गए तो कहीं भद न पिट जाए। फिर उन्हों ने शिवपाल सिंह यादव को आगे किया। अखिलेश अंतत: साधना गुप्ता यादव और पिता मुलायम की लगातार चालों से आजिज आ कर चाचा रामगोपाल यादव की शरण में गए। कुछ लोग कहते हैं कि मुलायम के मौसेरे भाई रामगोपाल यादव ने अखिलेश यादव को खुद ही बरगलाया। और अखिलेश को भड़काया। जितने मुंह , उतनी बातें हैं। बहरहाल पार्टी की एक मीटिंग लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में बुलाई गई। और मुलायम सिंह को हटा कर अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया।\
अब मुलायम सिंह यादव ने रामगोपाल यादव पर हमला बोल दिया। कहा कि रामगोपाल ने अखिलेश का कैरियर खत्म कर दिया। और जाने क्या-क्या। मुलायम ने तब ठीक ही कहा था। मुलायम यहां तक कहने लगे कि अभी तक किसी ने अपने बेटे को मुख्य मंत्री नहीं बनाया पर मैं ने अपने बेटे को मुख्य मंत्री बनाया। पर अखिलेश ने मुझे धोखा दे दिया। मुलायम कहते , जो अपने बाप का नहीं हो सकता , किसी का नहीं हो सकता। वह कहते बताइए कि अपने चाचा को मंत्रिमंडल से निकाल दिया। संयोग से मुलायम के इस भाषण का वीडियो इन दिनों फिर वायरल है। बहरहाल बात चुनाव आयोग तक गई। अमर सिंह और शिवपाल खुल कर अखिलेश के खिलाफ़ खड़े हो गए। मुलायम भी। मुलायम ने चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखी। चुनाव आयुक्त से मिले भी यह कहते हुए कि असली अध्यक्ष मैं हूं। चुनाव आयोग ने मुलायम सिंह से यही बात शपथ पत्र पर लिख कर देने को कहा। मुलायम चुप लगा गए। शपथ पत्र नहीं दिया तो नहीं दिया। शिवपाल और अमर सिंह ने सारा जोर लगा लिया। पर मुलायम टाल गए।
अगर शपथ पत्र दे देते मुलायम चुनाव आयोग को तो सपा का चुनाव चिन्ह साइकिल ज़ब्त हो जाता। चुनाव सिर पर था। अखिलेश , क्या पार्टी भी समाप्त हो जाती। मुलायम अनुभवी राजनीतिक हैं। अखिलेश के आगे सरेंडर कर गए। लोगों ने इसे मुलायम का पुत्र-मोह भी कहा। अभी भी कहते हैं। पर इस सब में शिवपाल सिंह यादव पलिहर के बानर बन गए। न घर के रहे , न घाट के। धोबी का कुत्ता बन गए। आज तक बने हुए हैं। अब कहते हैं कि अखिलेश ही हमारे नेता जी हैं ! अलग बात है कि भाजपा अभी भी जसवंत नगर सीट पर शिवपाल की प्रतीक्षा कर रही है। और शिवपाल कह रहे हैं नहीं , बिलकुल नहीं। बहरहाल घर में सब से लड़ते हुए 2017 के विधान सभा चुनाव में राहुल की कांग्रेस के साथ मिल कर अखिलेश लड़े। सौ सीट कांग्रेस को दे बैठे। नतीज़ा आया तो ख़ुद सिमट कर 47 सीट पर रह गए। शिवपाल की गति को प्राप्त हो गए। अखिलेश यादव अब तक पलिहर का बानर बने हुए हैं। धोबी का कुत्ता बन कर न घर के रह गए हैं , न घाट के। 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती से गठबंधन कर फिर लुढ़क गए।
पर इतनी मार खाने के बाद भी अखिलेश को अभी तक समझ नहीं आई। अब ओमप्रकाश राजभर जैसे उठल्लों , स्वामी प्रसाद मौर्य , दारा सिंह चौहान जैसे दगे कारतूसों के बूते कूद रहे हैं। मनबढ़ई भरी बातों से चुनाव नहीं जीते जाते। मीडिया मैनेजमेंट और बिना विजय के विजय यात्रा से भी चुनाव नहीं जीते जाते। पिता की बद्दुआ साथ ले कर भी चुनाव नहीं जीते जाते। पैसा खर्च कर अगर चुनाव जीते जाते तो कांग्रेस या मायावती कभी चुनाव नहीं हारते। सर्वदा सत्ता में बने रहते। मुस्लिम वोट बैंक का मिथ टूट चुका है। भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग कर मंडल , कमंडल की दूरी मिटा दी है। शौचालय , पक्का मकान , गैस , मुफ्त राशन , जनधन में पैसा दे कर लाभार्थी नाम की एक नई जाति खड़ी कर दी है भाजपा ने। पर अखिलेश यादव हैं कि पुराने औजारों से ही चुनाव जीत लेना चाहते हैं। मेहनत बहुत कर रहे हैं , इस में कोई शक़ नहीं। पर मेहनत तो एक रिक्शा वाला , एक मज़दूर भी बहुत करता है। मेहनत भी बुद्धि के साथ करनी होती है। तब उस का अपेक्षित परिणाम मिलता है। पर आस्ट्रेलिया से एम टेक करने वाले अखिलेश यादव वर्चुअल रैली का मतलब ही अभी तक नहीं जान पाए हैं। ढाई हज़ार लोगों को पार्टी कार्यालय में इकट्ठा कर वर्चुअल रैली करते हैं। अकेले विकास यात्रा निकालने की बात करते हैं।

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