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अध्यापक हूं। इसलिए कुछ अध्यापकीय अनुभव भी संजो कर रखता हूं

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अध्यापक हूं। इसलिए कुछ अध्यापकीय अनुभव भी संजो कर रखता हूं। इस क्षेत्र में मेरे तमाम अनुभवों में से एक महत्वपूर्ण अनुभव-

 

कुछ अभिभावक अपने बच्चों को.. उनके वर्तमान कक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भी उन्हें पुनः उसी कक्षा में प्रवेश दिलाने की ज़िद करते हैं। उसके कुछ मुख्य कारण हैं जो निम्नवत हैं-

 

1- कुछ बच्चे बहुत कुशाग्र होते हैं…जो कम उम्र में ही बड़ी कक्षा में पहुंच जाते हैं, आपको मालूम कि हाईस्कूल परीक्षा फार्म भरने की एक न्यूनतम उम्र निर्धारित है। ऐसे में उक्त बच्चे हाईस्कूल तक उस न्यूनतम उम्र को नहीं छू पाते इसलिए ऐसे मेधावी और कुशाग्र बच्चों को उनके अभिभावक छोटी कक्षा में ही दुबारा प्रवेश दिलवाकर उन्हें हाईस्कूल की परीक्षा में प्रवेश की न्यूनतम उम्र की अहर्ता पूरी कराते हैं।

 

2- हमारे यूपी में पुलिस और फौज में नौकरी करने वालों नवयुवकों की एक बड़ी तादाद है…जो आठवी-नौवीं से ही अपनी दौड़ बनाने लग जाते हैं। यह भी सच है कि बहुत से नवयुवक अपनी लाख तैयारियों के बावजूद भर्ती में छंट जाते हैं। लेकिन उम्र को कौन पकड़ पायेगा वो तो अपने गति से दौड़गी। भले नवयुवक भर्ती में न दौड़ पायें। ऐसे में बहुत से नवयुवक दुबारा- तिबारा हाईस्कूल का फार्म (उम्र घटाकर) भरते हैं.. कि उन्हें आगे की भर्ती में भाग लेने का मौका मिल जाये… भले बाल-दाढ़ी में मेंहदी- खिजाब क्यों न लगाना पड़े।

 

 

3- कुछ ऐसे भी अविभावक जिनके बच्चे बारहवीं के हिन्दी के प्रश्न पत्र में यह मुहावरा ” न रहेगा सांप और न बजेगा बांसुरी” लिखकर अपने पिता को गर्व से बताते हैं कि “पापा हम हिन्दी में 100 में 90 नम्बर लेकर आयेंगे”

 

ऐसे ही योग्य छात्रों के अभिभावक अपने उन कुशाग्र बच्चों को उनके द्वारा बारहवीं पास करने के बावजूद उन्हें इंटर में एडमिशन करवाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

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